भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
लकड़ी का गठ्ठर उसके सामने बँधा था, किन्तु उसे उठाकर सर पर रखना उसके वश में न था, वह बिलकुल थक गया था, शाम तेजी से गहराती जा रही थी, किसी तरह गठ्ठर को उठाने की फिर उसने कोशिश की, पर गठ्ठर टस से मस नहीं हुआ। उफ्! कौन मेरी मदद करेगा। कौन इस गठ्ठर को मेरे सिर पर रखेगा-वह बुदबुदाया, कोई नहीं-कोई नहीं-जैसे शाम के घिरते साये उसे चिढ़ा रहे थे।
हे भगवान! सुना था बारह बरस के बाद तो घूरे के भी भाग जाग जाते हैं, पर मेरे भाग कभी नहीं जागेंगे, मेरा वक्त कभी नहीं बदलेगा।
बदलेगा क्यों नहीं, तुम इतने निराश क्यों होते हो? उठो! गठ्ठर उठाओ, देखो रात घिरने को है, इस जंगल में ही भटकते रह जाओगे-उठो।
“कौन, कौन हो तुम! मेरे सर पर गठ्ठर तो रख दो” -उसने कहा।
“लो, अभी लो” -कहकर एक सुन्दर युवक आगे बढ़ा।
“अरे, तुम कौन हो? कहाँ रहते हो?”
“इससे तुम्हें क्या लेना-देना। तुम उठो।”
“बता दो ना-उसने अनुनय करते हुए कहा।”
“मैं समय हूँ, सबके लिए हूँ, सबके पास रहता हूँ।”
समय! हुंह-मेरे पास तो तुम कभी नहीं आए। मैंने जब से होश सँभाला है, ये जंगल, ये लकड़ियाँ, गठ्ठर और मैं- उठो तो। मैं तुम्हारे पास भी किसी सुबह आऊँगा, बहुत जल्दी तुम्हारे द्वार पर दस्तक दूँगा। तुम मेरी दस्तक की प्रतीक्षा करना। चलो गठ्ठर उठाओ और घर जाओ। समय ने उसके सर पर गठ्ठर रख दिया।
गठ्ठर को उठाए वह तेज कदमों से अपने घर की ओर बढ़ने लगा। उसके कानों में किसी के बोल गूँज रहे थे। उसके होंठ यह गीत गुनगुनाने लगे थे-
समय मेरे द्वार पर आएगा,
मेरी जिन्दगी बदल जाएगा।
गीत की यह पंक्तियाँ गुनगुनाता वह आँगन में पहुँचा। उसने गठ्ठर एक कोने में पटक दिया और दरवाजे को देखकर मुस्कराया। देखो! तुम्हें खटखटाने समय आएगा। तुम मुझे बता देना फिर हँसा- तुम भला कैसे बताओगे, तुम तो बोल ही नहीं सकते। चलो, मैं ही सुन लूँगा। उस रात वह चैन से सोया।
सुबह खिड़की से धूप ने झाँका तो वह हड़बड़ा कर उठा। अरे, इतनी दोपहर-उफ्फ! उसने जल्दी-जल्दी सब काम निपटाए और जंगल की ओर चल पड़ा।
जंगल में लकडियाँ बीनता, काटता वह गीत गुनगुनाता रहा-
समय मेरे द्वार पर आएगा
मेरी जिन्दगी बदल जाएगा।
उसका मन हर बोल पर प्रसन्न हो उठता। उसके हाथ तेजी से काम करते और उसका गठ्ठर बढ़ता चला जाता। आज जल्दी ही उसका गठ्ठर बन गया। गठ्ठर उठाते हुए उसे कल के युवक की याद आ गयी तो वह बोला- क्या तुम आज मेरा गठ्ठर नहीं उठाओगे? देखो कितना बड़ा है? अरे, तुम भला यहाँ कहाँ ठहरे होंगे? तुम तो समय हो। चलो मैं ही उठा लेता हूँ- और उसने गठ्ठर उठा लिया।
आज वह थका नहीं था। वह सीधे बाजार जा पहुँचा। लकड़ी का मोल-भाव करके उसने पैसे गिने। अरे! इतने तो मेरी दो दिन की लकड़ियों से बनते हैं। तो क्या मैंने दुगुनी लकड़ियाँ बटोरी हैं आज। उसने हैरानी से खरीददार की ओर ताका-हाँ भाई! सचमुच तुम्हारी लकड़ियाँ दुगुनी हैं और आज तुम प्रसन्न भी नजर आ रहे हो।
मैं-हाँ-जानते हो क्यों?
‘समय मेरे द्वार पर आएगा, मेरी जिन्दगी बदल जाएगा।’ वह गाता-गाता चल दिया।
जल्दी ही उसने रात की रोटियाँ सेकीं और जल्दी ही सो गया। सुबह जल्दी ही उसकी नींद टूट गयी। ठंडी हवा में साँस भरता वह उठा। जल्दी-जल्दी काम निबटाए और जंगल की ओर चल पड़ा। उसके होठों पर वही गीत लहरा रहा था।
वह चुस्ती से लकड़ियाँ चुनता, गठ्ठर उठाता और बाजार ज
ाता। दिन-ब-दिन उसकी आमदनी बढ़ती गयी। उसके चेहरे की रंगत बढ़ती गयी। उसका मन बढ़ता गया।
उस दिन भी उसने गठ्ठर खरीददार के आगे पटका। खरीददार ने कहा- क्यों भाई तुम्हारी कमाई तो अब तगड़ी होने लगी है। क्यों न एक गधा खरीद लो, अधिक लकड़ियाँ ला सकोगे।
अरे वाह! अच्छा ख़्याल है, क्या तुम मुझे गधा दिला सकोगे?
हाँ-हाँ-क्यों नहीं, चलो मेरे साथ पास ही कुम्हारों की बस्ती है। तुम्हें तुम्हारी पसन्द का गधा दिला दूँगा।
गधा खरीद कर जब वह घर की ओर बढ़ रहा था। अहा-मैं भी किसी का मालिक हूँ-मेरा गधा-रस्सी पकड़ कर फिर वह गीत गुनगुनाने लगा।
दिन बीतते गये। वह हर सुबह जल्दी से जल्दी उठता। उसे लगता कि वह कहीं देर तक सोता रहा और समय आकर लौट गया तो सुबह उठने से उसके काम जल्दी छँटते। वह जल्दी जंगल चला जाता। यहाँ तक कि गधे की पीठ पर लकड़ियों की दो-दो खेपें भी करने लगा। उसकी जेब का वजन बढ़ता जा रहा था।
उस शाम बाजार से कुछ फल, कुछ सब्जियाँ खरीद कर जब वह घर लौटा, बादल घुमड़ने लगे। बूँदाबाँदी होने लगी। घर पहुँचते-पहुँचते मूसलाधार पानी बरसने लगा। घर के अन्दर उसने देखा-टप-टप टपकता पानी और हवा के झोंकों से हिचकोले खाता उसका दरवाजा।
ओह! अगर ऐसे में किसी सुबह समय मेरे द्वार पर आ गया तो मेरी काँपती हुई ये दीवारें गिर गयी तो। उस आवाज के नीचे दस्तक डूब गयी तो। नहीं-नहीं, मैं ऐसा नहीं होने दूँगा, उसने अपनी जेबें टटोली, काफी पैसा था। अब एक पल की भी देर किए बिना वह मिस्त्री के पास पहुँचा। फिर बढ़ई के पास पहुँचा। अरे भाई, तुम कल ही मेरा घर बना दो और मेरा दरवाजा पक्का कर दो। नहीं तो इस बरसात में समय की आवाज मैं कैसे सुनूँगा? समय देवता! जरा ठहर के आना। मेरा घर पक्का बन जाए, मेरा दरवाजा पक्का बन जाए। राजगीर और मिस्त्री दोनों ही सुबह उसके आँगन में पहुँच गये। सामान मँगवाया गया, राजगीर लगे और एक नन्हां-सा पक्का, भारी दरवाजे का घर बन गया।
पच्चीकारी वाले दरवाजे की ओर देखकर वह बुदबुदाया- अब तुम आओ ना। मैं तुम्हारा दिल खोलकर स्वागत करूँगा। देखो मैं तुम्हारे लिए खाना बनाऊँगा। खाना बनाते-बनाते उसे विचार आया। अरे नहीं, इतना काम-फिर खाना बनाना-घर के कामों में मैं वक्त बेकार कर रहा हूँ- कल ही कोई नौकर ढूँढ लाऊँगा। आखिर जंगल का काम भी तो मुझे करना है और वह नौकर ढूँढ लाया।
नौकर उसके घर का सभी काम करता। वह दिन में भी लकड़ियाँ काटता। उसे लगा, उसे एक गधा और खरीद लेना चाहिए। उसने एक गधा और खरीद लिया।
जंगल से दोनों गधों की पीठ पर लकड़ियाँ लादे जब वह बाजार पहुँचा, लकड़ी के टाल का मालिक मुस्कराया- भाई, तुम्हें जंगलात के साहब ने बुलाया है।
“मुझे! आखिर क्यों?”
“मैं नहीं जानता तुम साथ चलो।”
चलो आखिर किस लिए, कहीं किसी ने मेरी शिकायत तो नहीं कर दी। इसी सोच में डूबा वह साहब के सामने पहुँचा। साहब बोले- बैठो। हमने तुम्हारे बारे में बहुत सुना है, तुम बड़े मेहनती हो।
हूं तो साहिब, डरते-डरते उसने साहब की बन्दूक की ओर देखा। साहब हँसा, हमें नदिया के पास उस जंगल को कटवाने का हुक्मनामा मिला है। हम किसी मेहनती ईमानदार आदमी को यह ठेका देना चाहते हैं।
ठेका! जी-जी-अब वह साहब की ओर मुस्कराया।
हाँ ठेका। तुम अपने आदमी लगाकर जंगल कटवाओ। हजारों का ठेका है। बोलो मंजूर है?
जी! लिखत-पढ़त, अँगूठा गोई के बाद, बात पक्की हुई और वह आनन-फानन में ठेकेदार बन गया। सैंकड़ों लोग जंगल में बिखरे हुए थे। कुल्हाडियाँ चारों ओर ठक-ठका रही थीं और छायादार पेड़ के नीचे सुस्ताता वह सोच रहा था, मुझे समय ने कैसा बुद्धू बनाया। पाँच वर्ष हो गये, अभी तक मेरे द्वार पर नहीं आया, हुंह! न आए, नहीं-नहीं उसके आने का एहसास कितना उन्मादक होता है, कितना सुन्दर, मैं एक बार उससे मिलना चाहता हूँ। अभी वह सोच ही रहा था कि वही युवक मुस्कराता हुआ सामने आ खड़ा हुआ।
अरे, तुम-तुम-समय!
हाँ मैं! क्यों?
तुमने तो कहा था, मैं तुम्हारे द्वार पर आकर दस्तक दूँगा। मगर आए नहीं, मैंने तुम्हारी प्रतीक्षा में घर द्वार बदल दिया, मैं सुबह जल्दी से जल्दी उठा। पर तुम आए तो यहाँ, भला तुम्हारी क्या खातिर करूँ?
समय हँसा, मेरी खातिर ही तो तुम दिन-रात प्रतीक्षा कर रहे थे।
लेकिन तुम मेरे दरवाजे पर कब आओगे समय?
मैं तो उसी दिन तुम्हारे द्वार पर आ गया था। जिस दिन तुम मेरे लिए पहली बार जल्दी उठे थे, मैंने ही तो शीतल झोंकों से तुम्हारा बदन सहलाया था, तुम स्वस्थ होने लगे। मैंने ही तो तुम्हारे हाथों में स्फूर्ति भर दी, तुम चुस्त और मेहनती हो गये।
हाँ-तो पर-तुमने तो द्वार पर दस्तक देने को कहा था। समय चलो, देखो मैंने झार के दरवाजे तुम्हारे लिए कितने नक्काशीदार बनाए हैं।
तुम भोले हो भाई, मैंने तो मन के द्वार पर दस्तक को कहा था।
मन के द्वार पर। अरे हाँ! तभी तो मेरा मन प्रसन्न रहता है।
“अच्छा मैं चला।”
“जरा ठहरो तो समय।”
मैं ठहरता नहीं हूँ भाई, मुझे हर एक के द्वार पर दस्तक देने जाना होता है, भला इतना बड़ा संसार, इतने अनन्त प्राणी और मैं ठहर गया तो…!
तो तुम सबके द्वार पर दस्तक देते हो?
हाँ! बस कोई सुनने के लिए तत्पर रहता है। कोई सुन नहीं पाता। कहता समय उड़ चला।
वह उठा, लकड़ी काटते कामगरों की ओर दौड़ा। समय सबके दरवाजे खट-खटाता है। सुनो-सुनते रहो-कहीं तुम्हारे द्वार तो नहीं खटखटा रहा है। आओ हम सब मिल कर गाएँ-
समय मेरे द्वार आएगा।
मेरी जिन्दगी बदल जाएगा।
और देखते ही देखते गीत चारों ओर गूँजने लगा। हाथ तेजी से चलने लगे।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
