Hindi Short Story: धुंधली सी कुहासे भरी सड़क पर रामलाल टॉर्च लेकर सड़क के एक छोर पर सन्नाटे में चल रहा था। सुबह के 3 बजे होंगे पर आज कुहासा उम्मीद से कुछ ज्यादा ही था। रामलाल टॉर्च हाथ में लिए जैसे उस कुहासे को चीरने का प्रयास कर रहा था।
राम लाल प्रत्येक रात एक बजे गाँव के छोर पर पहरा देने जाता था, ताकि कोई गाय या जानवर गाँव में घुसकर फसल बरबाद न कर सके। इसके बदले गाँव वाले उसे थोड़ा अनाज या पैसे दे देते थे। रामलाल की मेहनत अथक थी। उसके परिवार में खाने वाले दो और कमाने वाला सिर्फ एक वही था। रामलाल की बेटी और वह, जैसे तैसे रूखी – सूखी खाकर गुजारा हो भी जाया करता था। वैसे तो रामलाल सुबह तक रुकता पर आज वह जल्दी घर की और बढ़ चला था।
घर की और बढ़ा ही था कि उसके कदम एक आहट से ठिठक गए, उसे लगा जैसे उसके पीछे कोई है। रामलाल अब बेहद सतर्क हो गया, उसने अपने पीछे दूर तक टॉर्च के प्रकाश को फैलाने की कोशिश की पर कुहासे की वजह से वह भी काम न आ सका। अब रामलाल तेज़ कदमों से घर की तरफ लम्बे लम्बे डग भरने लगा।
पेड़ की सरसराहट हुई, और रामलाल के चेहरे पर डर क्योंकि रामलाल अपनी बंदूक जो वह पहरा देते वक्त इस्तेमाल करता है उसे वही ट्यूबवेल की एक दुछत्ती में छोड़ आया था यह सोचकर कि कल आते वक्त ले लेगा। अब रामलाल को डर लग रहा था। गाँव भी 2 किलोमीटर की दूरी पर रह गया था। रामलाल ने हिम्मत की और वहां लगे गन्ने के खेत में से एक ईंख खींच ली।
“अब रामलाल जोर से चिल्लाया, कौन है? बाहर निकलो!”
रामलाल ने जैसे ही यह शब्द कहा पत्तों की सरसराहट बढ़ गयी और रामलाल के चेहरे पर सर्दी के मौसम में भी पसीने की रेखाएं तैर गयी। पर यह क्या! पत्तों की सरसराहट रामलाल के करीब आने के बजाय दूर जाती हुई प्रतीत हो रही थी। रामलाल थोड़ा राहत की साँस लेने लगा।
पर फिर उसे लगा कि नही उसे उस सरसराहट का पीछा करना चाहिये कहीं ऐसा न हो कि वहां कोई जानवर हो और उसकी वजह से सब फसल बर्बाद हो जाये। अब रामलाल अपनी जान की परवाह न करते हुए ठहरो रुको और अलग— अलग तरह की जैसे गाय भैंस को भगाते हैं आवाज निकालता हुआ उस और भाग़ा। आवाज मानो थम गई, अब रामलाल की आवाज बुलंद थी।
“कौन है? देखो तुम जो कोई भी हो मुझसे नही बच पाओगे। भागो यहां से हुममम्म भरर्र थररर…..”
रामलाल साथ ही साथ टॉर्च का प्रकाश इधर उधर डाल रहा था। ताकि जो भी हो वह सामने आ जाये। ताकि उस पर काबू कर रामलाल उसे वहां से खदेड़ (भगा) सके।
अचानक रामलाल को महसूस हुआ कि उसके पीछे कुछ परछाई है, जैसे ही रामलाल मुड़ा उसके होश उड़ गए, रामलाल के पीछे कोई जानवर नही एक आदमी था जिसके हाथ में बड़ा सा चाकू और कंधे पर एक थैला लटका था। देखते ही देखते 3 या 4 हट्टे कट्टे लोग ईख में से बाहर निकल आये और रामलाल को घेरकर खड़े हो गए।
उनमें से एक ने दूसरे की तरफ देखते हुए बोला, “सरदार यह तो देखने में भी फक्कड़ लग रहा है इसके पास तो कुछ निकलेगा भी नही। बेफालतू में हम इसके सामने आ गए।“
दूसरा बोला, “हिम्मत तो देखो इसकी तेजी से पीछे कर रहा था हमारा, लगता है आज इसकी मौत खींच लाई है इसे।“
सब जोर से ठहाका मारकर हँसने लगते हैं।
उन सबका सरदार जो कद काठी में लम्बा और पगड़ी पहने था कहता है
“समय बर्बाद मत करो दिन निकल गया है, इसे मारकर यही छोड़ दो”
रामलाल उन सबको देखकर सोच रहा था कि कैसे जान बचाई जाए! अचानक उसे एक उपाय सुझा। उसने अपने मुँह को अपने गमछे से ढका हुआ था। जोर से पुलिस सायरन की आवाज निकालनी शुरू की। पुलिस सायरन की आवाज सुनकर जैसे चोरों के कान खड़े हो गए। कुहासे में कुछ ज्यादा दिखाई न देने की वजह से उन्हें लगा कि पुलिस की वैन आस पास ही हैं।
अब चोरों के हाथ में जो कुछ भी था। वह उसे छोड़ वहां से रफूचक्कर हो गए।
रामलाल अब गांव की तरफ बढ़ चला। वहां देखा तो रोना पीटना चल रहा था। पूछने पर पता लगा कि डाकू पंच की बेटी की शादी के जेवर उठा ले गए। रामलाल ने वह गठरी जो चोर छोड़ गए थे पंच के आगे रख दी व वह हथियार जो डाकू छोड़ गए थे सबको दिखाए और सारा किस्सा कह सुनाया। गांव के सब लोग अब रामलाल को कंधे पर बिठाकर नाच रहे थे। अब रामलाल को पंच ने अपनी सेवा में ले लिया था व रामलाल उसकी बेटी दोनों ही अब भरपूर खाते व सुखी जीवन व्यतीत करने लगे।
