रक्षक-भक्षक

हम मंदिर के प्रांगण में प्रवेश कर चुके थे । चढ़ावे का सामान बेचने वालों की नजर हम पर पड़ चुकी थी । वे बाकड़ों से लगभग लटक-लटककर पूजा की सामग्री अपनी-अपनी दुकान से खरीदने को हमें आमंत्रित कर रहे थे । मैंने पाया कि उनकी हांकों और आमंत्रणों से बेखबर मम्मी की दृष्टि प्रांगण में कुछ और ही खोज रही है ।

“अरे पुष्पा, भिखारी यहां कहीं नजर ही नहीं आ रहे…लगता है आज की सारी मेहनत बेकार जाएगी ।”

मेरी नजर प्रांगण के कोने-कोने में दौड़ती, ऊपर टटोलती, मंदिर तक जाती सीढ़ियों की चढ़ान घूम आयी । वाकई भिखारी नजर नहीं आ रहे थे । बेचारी मम्मी उन पर तरस हो आया । कितनी श्रद्धा और मन से वे पचासेक गरीबों को जिमाने का संकल्प पूरा करने मंदिर आयी हैं । यही सोचकर कि आज गुरुवार है । महालक्ष्मी मैया का दिन । दर्शन भी कर लेंगी और पचासेक गरीबों को जिमा भी लेंगी । मानता मानी थी उन्होंने कि स्कूटर दुर्घटना में आहत भैया जिस दिन स्वस्थ होकर अस्पताल से घर लौटेंगे, वे आते गुरुवार को मानता पूरी करेंगी । तड़के उठ मम्मी पड़ोसन मेहता के साथ पूरी, सब्जी और हलवा बनाने में जुट गयीं । बड़े जतन से उन्होंने पोलीथिन की थैलियों में खाने के पूड़े बनाए थे, लेकिन यहां तो…

“चलो, पूजा की सामग्री खरीद लें, “खिन्न स्वर में मम्मी ने कहा तो हम एक बाकड़े के पास आकर खड़े हो गये । दुकान वाली प्रसन्न मन से पूजा की थाली सजाने लगी । बाकड़े के नीचे बैठी हुई छोकरी को हमने अपनी चप्पलें और खाने के पूड़ों से भरा झोला सौंप दिया ।

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“आज भिखारी क्यों नहीं दिख रहे? क्या बात है?” मम्मी पूछे बिना न रह सकीं ।

“जाएंगे किदर…दुप्पर का टैम है न बाई! पूजा को कोई आता नई…इदर गल्ली-बिल्ली में सोते पड़े होएंगे…आप पूजा दे के आव…मैं बुला के रखती…बाई! मेरी छोकरी को पन एक पूडा होना ।” दुकान वाली के चेहरे से लार टपकी । जो मम्मी को बुरी नहीं लगी ।

पूजा की थाली हाथ में लेती हुई मम्मी के चेहरे पर ढाढ़स की चमक दौड़ गयी । हम मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने लगे । पीछे से दुकान वाली का स्वर सुनाई दिया । वह चप्पल-जूते संभालती छोकरी को हिदायत दे रही थी, “लवकर पड़ पोरगी सांग त्याना…” (दौड़ और बोल उनको कि…)

पूजा करके हम जैसे ही थाली लौटाने उस बाकड़े पर पहुंचे, दुकान वाली ने आंखें नचाकर सीढ़ियों की ओर संकेत किया । सीढ़ियों के नीचे भिखारियों का हुजूम नजर आया और हमारे थैला लेकर करीब पहुंचते-न-पहुंचते छेड़ी गई मधुमक्खियों-सा हम पर टूट पड़ा । एक-दूसरे को धकियाते-मुकियाते उनकी कोशिश यही थी कि वे खाने का पूड़ा सबसे पहले प्राप्त कर लें । कहीं ऐसा न हो कि उनका नम्बर ही न आए । तभी पूड़ा पकड़ाती मम्मी का हाथ अचानक ठिठक गया । एक फटेहाल चीकट छोकरे पर वे अनायास भड़क उठीं ।

“हाथ-पांव टूटे हैं तुम्हारे? शर्म नहीं आती भीख मांगते…जाओ जाकर मेहनत मजदूरी करो…तुम जैसे को मैं भीख नहीं देती…लूले-लंगड़े लाचारों को दूंगी-हटो परे…”

जैसे भूखे के सामने से परसी हुई थाली हटा ली गई हो, वैसे ही वह छोकरा आगबबूला हो उठा । लपककर उसने मम्मी के हाथ से खाने का पूड़ा झपट लिया और चीखते हुए बोला, “तुम्हीच लोग गरीब लाचार का हाथ-पांव तुड़वाता हय…उसको अंधा-जुला-लंगड़ा बनवाता हय…दादा लोगों को मालूम हय, साबुत अंग वाले को कोई भीख नहीं देता…उनपे दया नई करता…तुम्हारा दया पे थू …!” घृणा से थूककर व भीड़ को चीरता आंख से ओझल हो गया ।

स्तब्ध मम्मी का एक हाथ अपने गाल पर जा टिका… ।

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