रिश्ता मिलाकर देखने से वनमाली और हिमांशुमाली दोनों ममेरे-फुफेरे भाई हैं; वह भी बहुत हिसाब करने पर मिला। लेकिन ये दोनों ही परिवार काफ़ी समय से पड़ोसी हैं, बीच में केवल एक बग़ीचे का व्यवधान है, इसलिए इनका रिश्ता बहुत पास का न होने पर भी इनमें घनिष्ठता का अभाव नहीं है।
वनमाली हिमांशु से बहुत बड़ा है। हिमांशु के जब दाँत भी नहीं निकले थे और न बोली ही फूटी थी, तभी से वनमाली ने उसे गोद में लेकर साँझ-सवेरे बग़ीचे की खुली हवा में घुमाया है, खिलाया है, चुप कराया है, सुलाया है; और शिशु का मनोरंजन करने के लिए परिणत बुद्धि-वयस्क लोगों के जल्दी-जल्दी सिर हिलाने और ऊँचे स्वर में बातचीत करने की जो सारी अवस्थानुचित चपलताएँ और भारी उछल-कूद दिखानी होती है, वनमाली ने उन सबको करने में भी कोई कमी नहीं की।
वनमाली ने कुछ विशेष पढ़ाई-लिखाई नहीं की। उसे बग़ीचे का शौक़ था और दूर के रिश्ते का यह छोटा भाई, जिसे एक दुर्लभ दुर्मूल्य लता के समान वनमाली अपने हृदय के संपूर्ण स्नेह-सिंचन से पाल रहा था, फिर जब वह उसके भीतर-बाहर को आच्छन्न करती पल्लवित होने लगी, तब वनमाली ने अपने को धन्य माना।
अकसर ऐसा देखने में नहीं आता, लेकिन कोई-कोई ऐसे स्वभाव के होते हैं, जो किसी छोटी सनक या छोटे शिशु अथवा किसी अकृतज्ञ मित्र के लिए अपने को सहज ही पूर्णरूप से विसर्जित कर देते हैं और इस विराट धरा पर एकमात्र छोटे स्नेह के कारोबार में जीवन का सारा मूलधन समर्पण कर निश्चिन्त बने रहते हैं, फिर शायद सामान्य स्वल्प अधिकार में ही परम संतोष के साथ दिन काट लेते हैं या तो सहसा किसी सवेरे सारा घर-बार बेच कंगाल हो रास्ते पर जा खड़े होते हैं।
हिमांशु की अवस्था जब कुछ और बढ़ी, तब उम्र और रिश्ते के अनेक अंतर के बावजूद वनमाली के साथ एक मैत्री बंधन में बँधा। दोनों के बीच मानो छोटा-बड़ा कुछ भी नहीं रहा।
ऐसा होने के कुछ कारण भी थे। हिमांशु पढ़ता-लिखता और स्वभावतः उसकी ज्ञान-स्पृहा अत्यंत प्रबल थी। किताब मिलते ही पढ़ने लगता, इससे बहुत-सी व्यर्थ की किताबें भी अवश्य पढ़ी गईं, पर जैसे भी हो, इससे सब ओर से उसके मन की एक विशेष परिणति साधित हुई। वनमाली एक विशेष श्रद्धा के साथ उसकी बातें सुनता, उससे परामर्श लेता, उसके साथ छोटी-बड़ी सभी प्रकार की बातों की आलोचना करता, किसी विषय में ही उसे छोटा बालक मान अग्रहणीय नहीं समझता। हृदय के सर्वप्रथम स्नेह-रस से जिसे पाला-पोसा है, बड़ी उम्र में यदि वह ज्ञान-बुद्धि एवं उन्नत स्वभाव के लिए श्रद्धा का अधिकारी हो, तो उसके समान परम प्रिय वस्तु जगत् में दूसरी नहीं।
हिमांशु को बग़ीचे का भी शौक़ था, लेकिन इस विषय में दोनों मित्रों में अंतर था। वनमाली का शौक़ हृदय का था, तो हिमांशु में था बुद्धि का शौक़। संसार के ये कोमल पेड़-पौधे, या अचेतन जीवन-राशि, जो सार-सँभाल की कोई लालसा नहीं रखते, लेकिन सार-सँभाल होने पर घर के बाल-बच्चों के समान बढ़ उठते, जो मानव शिशु से भी अधिक शिशु हैं, उन्हें यत्नपूर्वक पालने-पोसने की वनमाली की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति थी। लेकिन हिमांशु की पेड़-पौधों के प्रति एक जिज्ञासु दृष्टि थी। अंकुर उगते, कोंपलें फूटतीं, कलियाँ लगतीं, फूल खिलते, इनमें उसका एकांतिक मनोयोग आकर्षित होता।
पेड़ के बीज बोने, क़लम लगाने, खाद डालने, मचान तैयार करने के विषय में विभिन्न सलाह-मशविरे की बात हिमांशु के मन में आती रहती और वनमाली उन्हें अत्यंत आनंदपूर्वक ग्रहण करता। इस उद्यान-खंड को लेकर आकृति-प्रकृति में जितने प्रकार की संयोग-वियोग की संभावनाएँ होतीं, वे दोनों मिलकर पूरा करते।
द्वार के सामने बग़ीचे के ऊपर ही एक पक्की वेदी जैसी थी। चार बजते ही एक पतला-सा कुरता पहने एक चुन्नटोंवाली चादर कंधे पर डाल, हुक़्का हाथ में लिये वनमाली वहाँ छाया में जा बैठता। वह बैठा-बैठा उदासीन कनखियों से कभी बाएँ दृष्टि डालता कभी दाएं। इसी तरह उसका समय हुक़्के की वाष्प-कुंडली के समान धीरे-धीरे अत्यंत हलके भाव से उड़ता जाता, विलीन होता जाता और फिर कहीं कोई निशान तक नहीं रख जाता।
आख़िर में जब हिमांशु स्कूल से लौटकर जलपान कर हाथ-मुँह धोकर दिखाई देता, तब वनमाली जल्दी से हुक़्क़े की नली एक ओर को कर खड़ा होता। तभी उसके आग्रह को देखकर समझ में आया कि अब तक धैर्य के साथ वह किसकी प्रत्याशा में बैठा था।
फिर बग़ीचे में घूमते-घूमते दोनों की बातचीत होती, अँधेरा हो जाने पर दोनों बेंच पर जा बैठते-दक्षिण पवन पत्तों को मर्मरित करता वह जाता; किसी दिन नहीं भी बहता, पेड़-पौधे चित्रवत् स्थिर खड़े रहते, सिर के ऊपर आकाश को भरे हुए तारे जगमगाते रहते।
हिमांशु बातें करता, वनमाली चुपचाप सुनता। जो न समझ में आता, वह भी उसे अच्छा लगता; जो सब बातें दूसरों से सुनने में अत्यंत खीझ पैदा करनेवाली होती, वहीं बातें हिमांशु के मुँह से बड़ी मजेदार लगतीं, ऐसे श्रद्धावान वयस्क श्रोता को पाकर हिमांशु की भाषण-शक्ति, स्मृति-शक्ति, कल्पना-शक्ति की विशेष परितृप्ति होती। वह कुछ बातें पढ़कर कहता, कुछ सोचकर कहता, कुछ बातें तभी दिमाग़ में उदित होतीं और बहुत बार कल्पना के सहारे से ज्ञान के अभाव को ढक देतीं। वह बहुत-सी बातें ठीक कहता, बहुत-सी बेतुकी, लेकिन वनमाली गंभीरतापूर्वक सुनता, बीच-बीच में दो-एक बात कहता, हिमांशु उसका प्रतिवाद करके जो उसे समझाता, वह वही समझता, फिर दूसरे दिन छाया में बैठा हुआ हुक़्क़े से कश खींचते-खींचते उन सब बातों के विषय में बहुत देर तक आश्चर्य के साथ सोचता रहता।
इसी बीच एक गड़बड़ी हो गई। वनमाली के बगीचे और हिमांशु के घर के बीच से पानी निकलने का एक नाला था। उसी नाले पर कहीं एक नींबू का पेड़ उग आया था। उस पेड़ में जब नींबू लगते, तब वनमाली का नौकर उसे तोड़ने की कोशिश करता और हिमांशु का नौकर उसे मना करता, इसके चलते दोनों में जो गाली-गलौज़ की झड़ी लगती, वह यदि कोई ठोस वस्तु होती तो उससे सारा नाला भर जाता।
बीच से वनमाली के पिता हरचंद्र और हिमांशु माली के पिता गोकुलचंद्र में उस नींबू के पेड़ को लेकर भारी झगड़ा मच गया। दोनों पक्ष नाले के दख़ल के लिए अदालत में जा पहुँचे।
वकील-बैरिस्टरों में जितने महारथी थे, सभी ने दूसरे पक्ष का अवलंबन लेकर बड़ा लंबा वाक्-युद्ध आरंभ किया। दोनों पक्षों का जितना पैसा ख़र्च हो गया, उतना पानी तो भादो की बाढ़ में भी उस नाले से कभी नहीं बहा होगा।
आख़िर में हरचंद्र की जीत हुई, प्रमाणित हुआ, नाला उसी का है और नींबू के पेड़ पर दूसरे किसी का कोई हक़ नहीं। अपील हुई, पर नाला और नींबू हरचंद्र के ही रहे।
जितने दिन मुक़दमा चलता रहा, दोनों भाइयों की मित्रता में कोई रुकावट नहीं आई। यहाँ तक कि कोई विवाद की छाया एक-दूसरे को स्पर्श न करे, इस आशंका से कातर हो वनमाली दुगुनी घनिष्टता से हिमांशु को हृदय के निकट आबद्ध कर रखने की चेष्टा करता और हिमांशु भी रंचमात्र विमुखता नहीं दिखाता।
जिस दिन अदालत में हरचंद्र की जीत हुई, उस दिन घर में, विशेष रूप से अंतःपुर में परम आनंद की धूम मच गई, केवल वनमाली की आँखों की नींद चली गई। उसके दूसरे दिन अपराह्न में ऐसे म्लान मुख से वह बगीचे की वेदी पर जा बैठा जैसे दुनिया में और किसी का कुछ नहीं हुआ, बस उसकी ही भारी हार हुई।
उस दिन समय निकल गया, छह बज गए, लेकिन हिमांशु नहीं आया। वनमाली ने एक गहरी दीर्घ निश्वास छोड़ हिमांशु के घर की ओर देखा, खुली खिड़की के भीतर जाने-पहचाने लक्षणों को मिलाकर देखा-हिमांशु घर में है। हुक़्के की नली फेंककर वह उदास मुख से घूमने लगा और सैकड़ों बार उस खिड़की की ओर देखा, लेकिन हिमांशु बग़ीचे में नहीं आया।
संध्या समय बत्ती जलने पर वनमाली धीरे-धीरे हिमांशु के घर गया।
गोकुलचंद्र द्वार पर बैठे देह पर हवा लग रहे थे। कौन है? उन्होंने पूछा।
वनमाली चौंक पड़ा, जैसे चोरी करने आ पकड़ लिया गया हो। काँपते हुए स्वर में बोला, मामा, मैं हूँ।
मामा ने कहा, किसे ढूँढ़ने आए हो? घर में कोई नहीं है।
वनमाली फिर बग़ीचे में आ चुप बैठा रहा।
जितनी रात बढ़ने लगी, देखा, हिमांशु के घर की खिड़कियाँ एक-एक करके बंद हो गए, वह केवल बाहर के अँधेरे में अकेला पड़ा रहा।
फिर उसके दूसरे दिन वह बग़ीचे में आ बैठा; सोचा, आज शायद आ भी सकता है। जो बहुत दिनों से रोज़ाना ही आता था, वह फिर एक दिन भी नहीं आएगा, यह बात वह कैसे भी नहीं सोच पाया। कभी मन में भी नहीं आया था कि यह बंधन किसी प्रकार कभी टूटेगा; ऐसे निश्चिन्त मन से रहता कि जीवन के सारे दुःख-सुख कब उस बंधन में बँध गए, यह वह जान ही नहीं पाया। आज सहसा पता चला कि वह बंधन टूट गया है; पर क्षण-भर में उसका जो सर्वनाश हो गया, इसका उसे कैसे भी विश्वास नहीं हुआ।
प्रतिदिन यथासमय वह बग़ीचे में आ बैठता कि कहीं अकस्मात् वह आए। लेकिन ऐसा दुर्भाग्य, जो नियम-क्रम से एक दिन भी नहीं घटा।
रविवार के दिन सोचा, पहले के नियमानुसार आज भी सुबह हिमांशु हमारे यहाँ खाने को आएगा। ठीक विश्वास हो ऐसी बात नहीं, लेकिन फिर भी आशा नहीं छोड़ी गई, सवेरा हुआ, वह नहीं आया।
तब वनमाली बोला, तो फिर भोजन करके ही आएगा जब वह भोजन करके भी नहीं आया, तब वनमाली ने सोचा, आज शायद भोजन करके सो रहा है। नींद खुलते ही आ जाएगा। नींद कब खुली, मालूम नहीं, पर वह आया नहीं।
फिर वही शाम हुई, रात आई, हिमांशु के घर के दरवाज़े एक-के-बाद-एक बंद हुए, बत्तियाँ एक-के-बाद एक बुझ गईं।
इसी प्रकार सोमवार से रविवार तक सप्ताह के सातों दिन जब दूरदृष्ट ने उसके हाथों से छीन लिए आशा को आसरा देने के लिए जब और एक दिन भी बाक़ी नहीं रहा, तब हिमांशु के रुद्ध द्वार अट्टालिका की ओर उसकी अश्रुपूर्ण दो कातर आँखों ने एक बड़ी मर्मभेदी मनोवेदना की फरियाद भेज दी और जीवन-भर की सारी वेदना को एकमात्र आर्त स्वर के बीच घनीभूत कर बोला, हे दयामय!
