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A Holi in Barsana: रंग का त्योहार होली तो अपने आप में ही अनूठा और खास होता है और उसमें भी खास है ब्रज की होली, जहां एक तरफ रंग बरसते हैं, दूसरी तरफ लाठियां भी चलती हैं और सभी रंग जाते हैं प्रेम और भक्ति के रंग में। यहां तक कि मंदिरों की छटा भी निराली हो जाती है।ï पूरे ब्रजमंडल में बसंत पंचमी से लेकर चैत्र कृष्ण दशमी तक होली का रंग छाया रहता है। चैत्र कृष्ण द्वितीया से चैत्र कृष्ण पंचमी तक यहां होली अपने उत्सर्ग पर रहती है, जिसे देखने के लिए हजारों देशी-विदेशी पर्यटक यहां आते हैं।

ब्रज के मंदिरों में बसंत पंचमी से ही ठाकुर जी के दैनिक शृंगार में गुलाल का प्रयोग प्रारंभ हो जाता है। साथ ही, इन मंदिरों में राजभोग के बाद नित्य प्रसाद के रूप में भक्तों पर गुलाल की वर्षा की जाने लगती है। शिवरात्रि से ढोल के साथ रसिया गान प्रारंभ हो जाता है। भक्त भांग और ठंडाई की मस्ती में नाचने-झूमने लगते हैं। ब्रज में होली की विधिवत शुरुआत फाल्गुन कृष्ण एकादशी को मथुरा से 18 किलोमीटर दूर मानसरोवर गांव में लगने वाले राधारानी के मेले से होती है। यहां श्रीराधारानी का भव्य मंदिर भी है। कहा जाता है कि यहां पर भगवान श्रीकृष्ण ने राधारानी के साथ रासलीला की थी। साथ ही श्रीराधारानी ने यहां स्थित प्राचीन कुण्ड में से प्रकट होकर श्रीहरिवंश जी को दर्शन दिए थे। बाद में गोस्वामी वनमाली दास ने यहां होली का उत्सव मनाना प्रारंभ किया था, जो आज भी अपनी सनातन परंपराओं को निभा रहा है।

बरसाने की होली सबसे निराली

मानसरोवर गांव में लगने वाले राधारानी के मेले के 15 दिनों बाद फाल्गुन शुक्ल नवमी को राधारानी की बाललीला स्थली और राधारानी की प्रणय स्थली बरसाने में नंदगांव के हुरियारों (पुरुष) और बरसाने की गोपिकाओं के मध्य ल_मार होली होती है क्योंकि कृष्ण नंदगांव के थे और राधारानी बरसाना की। बरसाने की लट्ठमार होली में अन्य स्थानों की होली के अनुरुप रंग-गुलाल एवं नृत्य संगीत के अलावा लाठियों से होली खेलने की जो विशिष्टता है, वह इस बात की परिचायक है कि राधा-कृष्ण की लीला भूमि के कण-कण में आज भी इतना प्रेम व्याप्त है कि यहां लाठियां चलने के बावजूद प्रेम-रस बरसता है। इसी प्रकार नंद गांव की गोपिकाओं और बरसाने के हुरियारों के बीच फाल्गुन शुक्ल दशमी को लट्ठमार होली होती है।

मंदिरों पर भी चढ़ता होली का रंग

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A Holi in Barsana:चलो बरसाने खेलैं होली... 4

जग प्रसिद्ध नंदगांव-बरसाने की ल_मार होली के पश्चात् ब्रज में फाल्गुन शुक्ल की एकादशी का पर्व बड़ी ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस दिन ब्रज के प्राय: सभी मंदिरों में ठाकुर जी के सम्मुख रंग-गुलाल, इत्र, केवड़ा, गुलाब-जल आदि की होली होती है। कुछ मंदिरों में राधा-कृष्ण स्वरूपों की मनोहारी शोभा यात्राएं निकलती हैं। इन शोभा यात्राओं में अबीर, गुलाल और रंग प्रसाद के रूप में डाला जाता है, जिनके उलीचने और उड़ाने से सारा वातावरण रंग-बिरंगा हो जाता है। मंदिर के गोसाइयों द्वारा बिहारी जी के भक्तों पर रंगों की बरसात की जाती है, जिसे लोग राधाकृष्ण का प्रसाद मानकर सहर्ष स्वीकार करते हैं। कुछ लोग तो रंग डलवाने को बड़े ही ललायित रहते हैं। 

होली में ‘होली लीला’ का बड़ा ही मनमोहक मंचन किया जाता है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण और राधाजी का रूप धारण किए पात्र परस्पर विविध प्रकार के फूलों से होली खेलते हैं। मथुरा से करीब 53 किलोमीटर की दूरी पर फालैन नामक एक छोटा-सा गांव है। होलिका की पौराणिक कथा में इस गांव का नाम प्रह्लादपुरी बताया जाता है। इस गांव में भक्त प्रह्लाद और नृसिंह के विग्रह प्रतिस्थापित हैं। मंदिर के निकट ही प्रह्लाद कुंड है। फाल्गुन पूर्णिमा को यहां विशाल मेला लगता है। साथ ही यहां पर एक बड़े चैराहे पर एक विशालकाय ऊंची होली सजाई जाती है। इस होली को प्रह्लाद मंदिर पर पंडा आधी रात को प्रह्लाद कुंड में स्नान करने के बाद प्रज्वलित करता है।

होलिका दहन के दूसरे दिन अर्थात् धुलण्डी के दिन सारे ब्रज में रंग और अबीर-गुलाल की शानदार होली खेली जाती है। मथुरा के द्वारिकाधीश मंदिर से एक विशेष शोभा यात्रा निकाली जाती है। यह शोभा यात्रा विविध क्षेत्रों से होती हुई द्वारिकाधीश मंदिर पर ही आकर समाप्त होती है। 

धुलण्डी अर्थात् रंग खेलने वाले दिन लगभग सारे देश में होली का हुड़दंग समाप्त हो जाता है, किंतु ब्रजमंडल में इसके दस दिन बाद तक भी किसी न किसी रूप में होली चलती रहती है। धुलण्डी के दिन से चार दिनों तक समूचे ब्रज में ‘तानों’ के गायन चलते हैं। यह ब्रज की एक विशेष गायन शैली है। भारत में यह गायकी ब्रज के अलावा और कहीं नहीं सुनने को मिलती है।

चैत्र कृष्ण द्वितीया को मथुरा से 22 किलोमीटर दूर बलदेव नामक स्थान पर ठाकुर दाऊदयाल जी के मंदिर में ‘दाऊजी का हुरंगा’ होता है। इसे ‘बड़ा फाग’ भी कहा जाता है। दाऊजी भगवान् श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम थे। इस हुरंगे में शामिल होकर खेलने वाले पंडा समाज के सभी हुरियारे और महिलाएं गोपी-गोपिका स्वरूप में ही होली खेलती हैं। मंदिर प्रांगण में घुटनों तक भरे रंगीन पानी और अबीर-गुलाल की छटा होने वाले इस अनूठे हुरंगे में होली खेलने आई गोपिकाएं, हुरियारों के रंग से गीले वस्त्र फाड़ती हैं। तत्पश्चात् वे इन फटे हुए कपड़ों के कोड़े बनाकर गीले बदन हुरियारों की जमकर पिटाई करती हैं। इसके प्रत्युत्तर में हुरियारे मंदिर में बने हुए कुण्ड में से पिचकारियों, बाल्टियों आदि  में रंग जल- भरकर गाते हुए हुरियारों पर उड़ेल कर उन्हें रंगों से सराबोर कर देते हैं। 

हुरियारों का समूह भांग-ठंडाई की मस्ती में ढोलक-मंजीरों की ताल पर झूम-झूम कर नृत्य करते हैं। साथ ही हुरियारे अपना झंडा लेकर गायन-वादन के साथ मंदिर की परिक्रमा भी करते हैं। गोपिकाओं का झुंड हुरियारों के झंडे को गिराने का भरसक प्रयास करता है। उनके हाथों में झंडे पर लगे कदम्ब के पत्ते ही आते हैं, किंतु वे उसी में अपनी जीत समझती हैं।

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A Holi in Barsana:चलो बरसाने खेलैं होली... 5

चैत्र कृष्ण द्वितीया के ही दिन मथुरा से करीब 50 किलोमीटर दूर जाव गांव में भी अत्यंत रसपूर्ण अनूठा हुरंगा होता है। इस हुरंगे में समीप के गांव बैठन के पुरुष भगवान् श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम के रूप में जाव गांव की श्री राधा जी रूपी स्त्रियों से होली खेलने आते हैं। इस हुरंगे में जब गांव की स्त्रियां अपने जेठ के रूप में आए बैठन के पुरुषों से लाज मारकर उसी तरह होली खेलती हैं, जिस प्रकार की दाऊजी के हुरंगे में होली खेली जाती है, किंतु इस हुरंगे की यह खासियत है कि इसमें जाव गांव की किसी भी स्त्री का मुख बैठन का कोई पुरुष देख नहीं पाता है। चैत्र कृष्ण तृतीया को बैठन गांव में लट्ठमार हुरंगा होता है। यहां पर राधा रूपी हुरियाने बलराम रूपी हुरियारों पर लाठियों के प्रहार करती हैं, जिन्हें बलराम रूप हुरियारे अपनी गदाओं पर रोकते हैं। अंत में यह हुरंगा अनिर्णीत दोनों की जय- जयकार के साथ समाप्त होता है।

ब्रज में होली की मस्ती में धुलण्डी से लेकर चैत्रकृष्ण दशमी तक जगह-जगह चरकुला नृत्य, हल नृत्य एवं हुक्का नृत्य आदि भी होते हैं। भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला से संबंधित ‘चरकुला नृत्य’ ब्रज का पारंपरिक लोकनृत्य है। यद्यपि चरकुला नृत्य एकल नृत्य है, किंतु यह होली के अवसर पर ब्रज के विभिन्न गांवों में सामूहिक रूप से किया जाता है। यह नृत्य महिलाओं द्वारा किया जाता है। ‘हल नृत्य’ भी महिलाओं द्वारा किया जाता है। हल नृत्य लोहे की वजनी हल दांतों के बीच में दबाकर होता है। ब्रज की महिलाएं अपना मुंह ढंककर एवं सिर पर हुक्का रखकर ‘हुक्का नृत्य’ करती है। सभी नृत्यों में महिलाएं लम्बा घूंघट किए रहती हैं।

चैत्रकृष्ण तृतीया से लेकर चैत्रकृष्ण दशमी तक निरंतर सात दिनों तक ब्रज के सभी मंदिरों में ‘फूलडोल’ की घटा छाई रहती है। इस दौरान मंदिरों को विभिन्न प्रकार के फूलों से सजाया जाता है। इस अवसर पर होली गीतों का गायन भी होता है। और ब्रज के माहौल में गूंज उठती है-

चलो बरसाने खेलैं होरी

ऊंचे गांव बरसानो कहिए

तहां बसै राधा गोरी…