Hindi Kahani: कल सड़क से गुजरते तुम्हें उदास देखा, तब से बस तुम ही आंखो के आगे घूम रहे हो । क्या मैं तुम्हारा दुख साझा कर सकती हूँ? कहते हैं कि दुख बांटने से मन हल्का हो जाता है।
हाँ मैं इतना तो समझती हूँ कि अकेलापन तुम्हें कचोटता होगा । कुछ बरस पहले तक तुम्हारे आस पास खूब पेड़ पौधे, लताएँ, बेलें हुआ करती थी पर निष्ठुर इंसानों ने जगह की लालच में उन्हें काट दिया और रह गये तुम निपट अकेले!
आसपास सब अपने हो तो कठिन से कठिन दुख से भी उबरा जा सकता है पर अकेलापन… सचमुच तोड़ कर रख देता है । इस अकेलेपन की पीड़ा व उदासी तुम्हारे चेहरे पर साफ जाहिर होती है ।
अरे! क्या तुम्हारे मन में ये डर है कि कहीं तुम्हें भी… ! न न प्रिय तरु मैं ऐसा न होने दूँगी । पहले जाने अनजाने जो गलती मुझसे हो गई वह दुबारा न दोहराऊँगी । तुम चिंता न करो… मैं हूँ न! मैं तुम्हे गले लगा लूंगी, डटकर खड़ी हो जाऊंगी तुम्हें बचाने को… तुम ये डर मन से सदा के लिए निकाल दो ।
कहीं ऐसा न हो कि हमारी आने वाली पीढ़ी तुम्हें सिर्फ किताबों में देखे और बैठ कर हमें कोसे । नहीं!मैं ऐसा कदापि नही होने दूँगी । निश्चिंत रहो प्रिय, मैं स्वयं घर घर जागरुकता का संदेश लेकर जाऊंगी ।
अरे ! तुम मुस्कराए! कितने प्यारे लगते हो यूँ मुस्कुराते! सदा यूँ ही खिलखिलाते रहना! तुम्हारी हँसी में ही हम सबकी खुशी है ।
ढेर सारे स्नेह के साथ,
