satyaagrah by munshi premchand
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लोगों के जाने के बाद मोटेराम ने पुलिस वालों से पूछा- तुम यहाँ क्यों खड़े हो?

सिपाहियों जे कहा- साहब का हुक्म है, क्या करें?

मोटेराम- यहाँ से चले जाओ।

सिपाही- आपके कहने से चले जाएँ? कल नौकरी छूट जाएगी, तो आप खाने को देंगे?

मोटेराम- हम कहते हैं, चले जाओ, नहीं तो हम ही यहाँ से चले जाएँगे। हम कोई कैदी हैं, जो तुम घेरे खड़े हो?

सिपाही- चले क्यों जाइएगा, मजाल है।

मोटेराम- मजाल क्यों नहीं है बे! कोई जुर्म किया है?

सिपाही- अच्छा जाओ तो देखें?

पंडितजी ब्रह्मतेज में आकर उठे और एक सिपाही को इतनी जोर से धक्का दिया कि वह कई कदम पर जा गिरा। दूसरे सिपाहियों की हिम्मत छूट गई। पंडितजी को उन सबने थल-थल समझ लिया था, पराक्रम देखा, तो चुपके से सटक गये।

मोटेराम अब लगे इधर-उधर नजरें दौड़ाने कि कोई खोमचेवाला नजर आ जाए, उससे कुछ लें। किन्तु ध्यान आ गया, कहीं उसने किसी से कह दिया, तो लोग तालियाँ बजाने लगेंगे। नहीं, ऐसी चतुराई से काम करना चाहिए कि किसी को कानों कान खबर न हो। ऐसे ही संकटों में तो बुद्धिबल का परिचय मिलता है। एक क्षण में उन्होंने इस कठिन प्रश्न को हल कर लिया।

दैवयोग से उसी समय एक खोमचेवाला जाता दिखाई दिया। 11 बज चुके थे, चारों तरफ सन्नाटा छा गया था। पंडितजी ने बुलाया- खोमचे वाले, ओ खोमचे वाले!

खोमचेवाला- कहिए क्या दूँ? भूख लग आयी न। अन्न-जल छोड़ना साधुओं का काम है, हमारा-आपका नहीं।

मोटेराम- अबे क्या कहता है? यहाँ क्या किसी साधु से कम हैं? चाहे, तो महीनों पड़े रहे और भूख-प्यास न लगे। तुझे तो केवल इसलिए बुलाया है कि जरा अपनी कुप्पी मुझे दे। देखूँ तो वहाँ क्या रेंग रहा है। मुझे भय होता है कि साँप न हो।

खोमचे वाले ने उतारकर दे दी। पंडितजी उसे लेकर इधर-उधर जमीन पर कुछ खोजने लगे। इतने में कुप्पी उनके हाथ से छूटकर गिर पड़ी और बुझ गई। सारा तेल बह गया। पंडितजी ने उसमें एक ठोकर और लगाई कि बचा-खुचा तेल भी बह जाए ।

खोमचेवाला-(कुप्पी को हिलाकर) महाराज, इसमें तो जरा भी तेल नहीं बचा। अब तक चार पैसे का सौदा बेचता, आपने यह खटराग बढ़ा दिया।

मोटेराम- भैया, हाथ ही तो है, कुप्पी गिरी, तो अब क्या हाथ काट डालूँ? यह लो पैसे, जाकर कहीं से तेल भरा लो।

खोमचेवाला-(पैसे लेकर) तो अब तेल भरवा कर मैं यहाँ थोड़े ही आऊंगा।

मोटेराम- खोमचा रखे जाओ, लपक कर थोड़ा तेल ले लो, कहीं कोई साँप काट लेगा तो तुम्हीं पर हत्या पड़ेगी। कोई जानवर है जरूर। वह रेंगता है। गायब हो गया। दौड़ जाओ पकड़े, तेल लेके आओ, मैं तुम्हारा खोमचा देखता रहूँगा। डरते हो तो अपने रुपए लेते जाओ।

खोमचे वाला बड़े धर्मसंकट में पड़ा। खोमचे से पैसे निकालता है तो भय है कि पंडितजी अपने दिल में बुरा न मानें। सोचें, मुझे बेईमान समझ रहा है। छोड़कर जाता है तो कौन जाने, इनकी नीयत क्या हो। किसी की नीयत सदा ठीक नहीं रहती। अंत को उसने यही निश्चय किया कि खोमचा यहीं छोड़ दूँ जो कुछ तकदीर में होगा, वह होगा। यह उधर बाजार की तरफ चला, इधर पंडितजी ने खोमचे पर निगाह दौड़ाई, तो बहुत हताश हुए। मिठाई बहुत कम बच रही थी। पाँच-छह चीजें थीं, मगर किसी में दो अंदद से ज्यादा निकालने की गुंजाइश न थी। भांडा फूट जाने का खटका था। पंडितजी जे सोचा- इतने से क्या होगा? केवल क्षुधा और प्रबल हो जाएगी, शेर के मुँह खून लग जाएगा। गुनाह बेलज्जत है। अपनी जगह पर जा बैठे। लेकिन दम-भर के बाद प्यास ने फिर जोर किया। सोचा, कुछ तो ढाढस हो ही जाएगा। आहार कितना ही सूक्ष्म हो, फिर भी आहार ही है। उठ, मिठाई निकाली, पर पहला ही लड्डू मुँह में रखा था कि देखा, खोमचेवाला तेल की कुप्पी जलाए कदम बढ़ाता चला आ रहा है। उसके पहुँचने के पहले मिठाई का समाप्त हो जाना अनिवार्य था। एक साथ दो चीजें मुँह में रखीं। अभी चुबला ही रहे थे कि वह निशाचर दस कदम और आगे बढ़ आया। एक साथ चार चीजें मुँह में डालीं और अधकुचली ही निगल गए। अभी छह अदद और थीं, और खोमचे वाला फाटक तक आ चुका था। सारी-की-सारी मिठाई मुँह में डाल ली। अब न चबाते बनता है, न उगलते। वह शैतान मोटरकार की तरह कुप्पी चमकाता हुआ चला ही आता था। जब वह बिलकुल सामने आ गया, तो पंडितजी ने जल्दी से सारी मिठाई निगल ली। मगर आखिर आदमी ही थे, कोई मगर तो थे नहीं। आँखों में पानी भर आया, गला रुंध गया शरीर में रोमांच हो आया, जोर से खाँसने लगे। खोमचे वाले ने तेल की कुप्पी बढ़ाते हुए कहा- यह लीजिए, देख लीजिए, चले तो हैं आप उपवास करने, पर प्राणों का मन में डर है। आपको क्या चिन्ता, प्राण भी निकल जाएंगे, तो सरकार बाल-बच्चों की परवस्ती करेगी।

पंडितजी को क्रोध तो ऐसा आया कि इस पाजी को खोटी-खरी सुनाते, लेकिन गले से आवाज न निकली। कुप्पी चुपके से ले ली और झूठ-मूठ कुछ इधर-उधर देखकर लौटा दी।

खोमचे वाला- आपको क्या पड़ी, जो चले सरकार का पच्छ करने? कहीं कल दिन-भर पंचायत होगी, तो रात तक कुछ तय होगा। तब तक तो आपकी आँखों में तितलियाँ उड़ने लगेगी।

यह कहकर वह चला गया और पंडितजी भी थोड़ी देर तक खाँसने के बाद सो रहे।

दूसरे दिन सवेरे ही व्यापारियों ने मिसकोट करनी शुरू की। उधर कांग्रेस वालों में भी हलचल मची। अमन-सभा के अधिकारियों ने भी काज खड़े किए। यह तो इन भोले-भाले बनियों को धमकाने की अच्छी तरकीब हाथ आयी। पंडित-समाज ने अलग एक सभा की और उसमें यह निश्चय किया कि पंडित मोटेराम को राजनीतिक मामलों में पड़ने का कोई अधिकार नहीं। हमारा राजनीति से क्या संबंध? गरज, सारा दिन इसी वाद-विवाद में कट गया और किसी ने पंडितजी की खबर न ली। लोग खुल्लमखुल्ला कहते थे कि पंडितजी ने एक हजार रुपये सरकार से लेकर यह अनुष्ठान किया है।

बेचारे पंडितजी ने रात तो लोट-पोट कर काटी, पर उठे तो शरीर मुरदा-सा जान पड़ता था। खड़े होते थे, तो आँखें तिलमिलाने लगती थीं, सिर में चक्कर आ जाता था। पेट में जैसे कोई बैठा हुआ कुरेद रहा हो। सड़क की तरफ आँखें लगी हुई थीं कि लोग मनाने तो नहीं आ रहे हैं। संध्यावंदन का समय इसी प्रतीक्षा में गया। इस समय अब के पश्चात् नित्य नाश्ता किया करते थे। आज अभी मुँह में पानी भी न गया था। न जाने वह शुभ घड़ी कब आएगी? फिर पंडितानी पर बड़ा क्रोध आने लगा। आप तो रात को भर-पेट खाकर सोयी होंगी, इस वक्त भी जलपान कर ही चुकी होंगी, पर इधर भूलकर भी न झांका कि मरे या जीते हैं। कुछ बात करने ही के बहाने से क्या थोड़ा-सा मोहनभोग बनाकर न ला सकती थीं? पर किसे इतनी चिंता है? रुपये लेकर रख लिये, फिर जो कुछ मिलेगा, वह भी रख लेंगी। मुझे अच्छा उल्लू बनाया।!

किस्सा-कौताह पंडितजी ने दिन-भर इंतजार किया, पर कोई मनाने वाला नजर न आया। लोगों के दिल में जो यह सन्देह पैदा हुआ था कि पंडितजी ने कुछ ले-देकर यह स्वाँग रचा है, स्वार्थ के वशीभूत होकर यह पाखंड खड़ा किया है, यही उनको मनाने में बाधक होता था।