रात तो किसी तरह कटी, मगर सवेरे भी कोई चमार न आया। चमारिनें भी रो-पीटकर चली गई। दुर्गन्ध -कुछ फैलने लगी।
पंडितजी ने एक रस्सी निकाली। उसका फन्दा बनाकर मुर्दे के पैर में डाला, और फंदे को खींचकर कस दिया। अभी कुछ-कुछ धुंधलका था। पंडितजी ने रस्सी पकड़कर लाश को घसीटना शुरू किया और गाँव के बाहर घसीट ले गये। वहाँ से आकर तुरंत स्नान किया, दुर्गा पाठ पढ़ा और घर में गंगाजल छिड़का ।
उधर दुक्खी की लाश को खेत में गीदड़ और गिद्ध, कुत्ते और कौए नोंच रहे थे। यही जीवन-पर्यन्त की भक्ति, सेवा और निष्ठा का पुरस्कार था।
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