Sadgati by Munshi Premchand
Sadgati by Munshi Premchand

दुक्खी सोचने लगा, बाबा ने यह गाँठ कहां रख छोड़ी थी कि फाड़े नहीं फटती। कहीं दरार तो पड़ती नहीं। मैं कब तक इसे चीरता रहूंगा? अभी घर पर सौ काम पड़े हैं। कार-परोजन का घर है, एक-न-एक चीज घटी ही रहती है, पर इन्हें इसकी क्या चिंता? चलूं जब तक भूसा ही उठा लाऊँ। कह दूंगा, बाबा। आज तो लकड़ी नहीं फटी, कल आकर फाड़ दूंगा।

उसने झौवा उठाया और भूसा ढोने लगा। खलिहान यहाँ से दो फलांग से कम न था। अगर झौवा भर-भरकर लाता तो काम जल्द खत्म हो आता, लेकिन फिर झौवे को उठता कौन? अकेला भरा हुआ झौवा उससे न उठ सकता था। इसलिए थोड़ा-थोड़ा लाता था। चार बजे भूसा कहीं खत्म हुआ। पंडित की नींद भी खुली। मुंह-हाथ धोया, पान खाया और बाहर निकले। देखा, तो दुक्खी झौवे पर सिर रखे सो रहा है। जोर से बोले- अरे, दुखिया, तू सो रहा है? लकड़ी तो अभी ज्यों-का-त्यों पड़ी हुई है। इतनी देर तू करता क्या रहा? मुट्ठी भर भूसा ढोने में सांझ कर दी। उस पर सो रहा है। उठा, ले कुल्हाड़ी और लकड़ी फाड़ डाल। तुझसे जरा-सी लकड़ी नहीं फटती फिर सायत भी वैसी निकलेगी, मुझे दोष मत देना। इसी से कहा है कि बीच के घर में खाने को हुआ और उसकी आंख बदली।

दुक्खी ने फिर कुल्हाड़ी उठायी। जो बातें पहले से सोच रखी थी, यह सब भूल गई। पेट-पीठ में धँसा जाता था, आज सवेरे जलपान तक न किया था। अवकाश ही न मिला। उठना भी पहाड़ मालूम होता था। जी डूबा जाता था, पर दिल को समझाकर उठा। पंडित हैं, कहीं सायत ठीक न विचारें तो फिर सत्यानाश ही हो जाए। तभी तो संसार में इतना मान है। सायत ही का तो सब खेल है। जिसे चाहे बिगाड़ दें। पंडितजी गाँठ के पास आकर खड़े हो गये और बढ़ावा देने लगे-जोर मार कसके, और मार-कसके मार-अबे जोर से मार-तेरे हाथ में तो जैसे दम ही नहीं है-लगा कसके खड़ा सोचने क्या लगता है-हाँ-बस, फटी जाती है! दे उसी दरार में।

दुक्खी अपने होश में न था। न-जाने कौन-सी गुप्त शक्ति उसके हाथों को चला रही थी। वह थकन, भूख, कमजोरी सब मानो भाग गई। उसे अपने बाहुबल पर स्वयं आश्चर्य हो रहा था। एक-एक चोट वज्र की तरह पड़ती थी। आध घंटे तक यह इसी तरह उन्माद की दशा में हाथ चलाता रहा, यहाँ तक कि लकड़ी बीच से चीर गई और दुक्खी के हाथ से कुल्हाड़ी छूटकर गिर पड़ी। इसके साथ वह भी चक्कर खाकर गिर पड़ा। भूखा, प्यासा, थका हुआ शरीर जवाब दे गया।

पंडितजी ने पुकारा-अबे दो-चार हाथ और लगा दे। पतली-पतली चैलियां हो जाएँ।

दुक्खी न उठा। उन्होंने भी अब उसे दिक करना उचित न समझा। पंडितजी ने भीतर जाकर बूटी छानी, शौच गये, स्नान किया और पंडिताई बाना पहनकर बाहर निकले। दुक्खी अभी तक वहीं पड़ा हुआ था। जोर से पुकारा- अरे, क्या पड़े ही रहोगे दुक्खी? चलो तुम्हारे ही घर चल रहा हूँ। सब सामान ठीक-ठीक है न? दुक्खी फिर न उठा।

अब पंडितजी को कुछ शंका हुई। पास जाकर देखा, तो दुक्खी अकड़ा पड़ा हुआ था। बदहवास होकर भागे और पंडिताइन से बोले- दुखिया तो जैसे मर गया।

पंडिताइन हकबकाकर बोलीं- यह तो अभी लकड़ी चीर रहा था?

पंडित- हाँ लकड़ी चीरते-चीरते मर गया। अब क्या होगा?

पंडिताइन ने शांत होकर कहा- होगा क्या, चमरौटे में कहला भेजों, मुर्दा उठा ले जाएँ।

एक क्षण में गाँव भर में खबर हो गई। पूरे में ब्राह्मनों की ही बस्ती थी। केवल एक घर गोंड़ का था। लोगों ने उधर का रास्ता छोड़ दिया। कुएं रास्ता उधर ही से था, पानी कैसे भरा जाए। चमार की लाश के पास से पानी भरने कौन जाए। एक बुढ़िया ने पंडितजी से कहा- अब मुर्दा फेंकवाते क्यों नहीं? कोई गाँव में पानी पीएगा या नहीं?

इधर, गोंड़ जे चमरौटे में जाकर सबसे कह दिया- खबरदार, मुर्दा उठाने मत जाना। अभी तहकीकात होगी। दिल्लणी है कि एक गरीब की जान ले ली । पंडित तो अपने घर के होंगे। लाश उठाओगे तो तुम भी पकड़े जाओगे।

इसके बाद ही पंडितजी पहुँचे, पर चमरौने का कोई आदमी लाश उठा लाने को तैयार न हुआ। हाँ, दुक्खी की स्त्री और कन्या, दोनों हाय-हाथ करती वहाँ चलीं और पंडितजी के द्वार पर आकर सिर पीट-पीटकर रोने लगीं। उसके साथ दस-पाँच और चमारिनें थी। कोई रोती थी, कोई समझाती थी, पर चमार एक भी न था। पंडितजी ने चमारों को बहुत धमकाया, समझाया, मिन्नत की, पर चमारों के दिल पर पुलिस का रोब छाया हुआ था, एक भी न मिनका। आखिर निराश होकर लौट आए।

आधी रात तक रोना-पीटना जारी रहा। देवताओं का सोना मुश्किल हो गया, पर लाश लेने कोई चमार न आया, और ब्राह्मण चमार की लाश कैसे उठाते। भला, ऐसा किसी शास्त्र-पुराण में लिखा है? कहीं कोई दिखा दे।

पंडिताइन में झुँझला कर कहा- इन डायनों ने तो खोपड़ी चाट डाली। सभों का गला भी नहीं थकता।

पंडित ने कहा- रोने दो चुडैलों को, कब तक रोएंगी? जीता था तो कोई बात न पूछता था। मर गया, तो कोलाहल मचाने के लिए सबकी-सब आ पहुँचीं।

पंडिताइन- चमार का रोना मनहूस है।

पंडित- हाँ बहुत मनहूस।

पंडिताइन-अभी से दुर्गंध उठने लगी।

पंडित- चमार था ससुरा कि नहीं। साध-असाध किसी का विचार है क्या सबों को?

पंडिताइन- इन सबों को घिन भी नहीं लगती।

पंडित- भ्रष्ट हैं सब।