Posted inमुंशी प्रेमचंद की कहानियां, हिंदी कहानियाँ

लांछन – मुंशी प्रेमचंद

अगर संसार में ऐसा प्राणी होता, जिसकी आंखें लोगों के हृदयों के भीतर घुस सकती, तो ऐसे बहुत कम स्त्री या पुरुष होंगे, जो उसके सामने सीधी आंखें करके ताक सकते। महिला आश्रम की जुगनूबाई के विषय में लोगों की धारणा कुछ- ऐसी ही हो गयी थी। यह बेपढ़ी-लिखी, गरीब, बूढ़ी औरत थीं; देखने में […]

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चोरी – मुंशी प्रेमचंद

हाय बचपन! तेरी याद नहीं भूलती! वह कच्चा, टूटा घर, वह पुआल का बिछौना, वह नंगे बदन, नंगे पांव खेतों में घूमना, आम के पेड़ों पर चढ़ना – सारी बातें आंखों के सामने फिर रही हैं। चमरौधे जूते पहनकर उस वक्त कितनी खुशी होती थी, अब ‘फ्लेक्स’ के बूटों से भी नहीं होती। गरम पनुए […]

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बहिष्कार – मुंशी प्रेमचंद

पंडित ज्ञानचंद्र ने गोविंदी की ओर सतृष्ण नेत्रों से देखकर कहा – मुझे ऐसे निर्दयी प्राणियों से जरा भी सहानुभूति नहीं है। इस बर्बरता की कोई हद है कि जिसके साथ तीन वर्ष जीवन के सुख भोगे, उसे एक जरा-सी बात पर घर से निकाल दिया। गोविंदी ने आंखें नीची करके पूछा – ‘आखिर क्या […]

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हिंसा परमो धर्म: – मुंशी प्रेमचंद

दुनिया में कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जो किसी के नौकर न होते हुए सबके नौकर होते हैं, जिन्हें कुछ अपना खास काम न होने पर भी सिर उठाने की फुरसत नहीं होती। जामिद इसी श्रेणी के मनुष्यों में था। बिलकुल बेफिक्र, न किसी से दोस्ती, न किसी से दुश्मनी। जो जरा हंसकर बोला, […]

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सती – मुंशी प्रेमचंद

मुलिया को देखते हुए उसका पति कल्लू कुछ भी नहीं है। फिर क्या कारण है मुलिया संतुष्ट और प्रसन्न है, और कल्लू सशंकित और चिंतित। मुलिया को, कौड़ी मिली है, उसे दूसरा कौन पूछेगा? कल्लू, को रत्न मिला है, उसके सैकड़ों ग्राहक हो सकते हैं। खासकर उसे अपने चचेरे भाई राजा से बहुत खटका रहता […]

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कामना-तरु – मुंशी प्रेमचंद

राजा इंद्रनाथ का देहांत हो जाने के बाद कुंवर राजनाथ को शत्रुओं ने चारों ओर से ऐसा दबाया, कि उन्हें प्राण लेकर एक पुराने सेवक की शरण जाना पड़ा, जो एक छोटे से गांव का जागीरदार था। कुंवर स्वभाव ही से शांतिप्रिय, रसिक, हंस-खेलकर समय काटने वाले युवक थे। रण-क्षेत्र की अपेक्षा कवित्व के क्षेत्र […]

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मंत्र (1) – मुंशी प्रेमचंद

पंडित लीलाधर चौबे की जबान में जादू था। जिस वक्त वह मंच पर खड़े हो कर अपनी वाणी की सुधावृष्टि करने लगते थे; श्रोताओं की आत्माएँ तृप्त हो जाती थीं, लोगों पर अनुराग का नशा छा जाता था। चौबेजी के व्याख्यानों में तत्तव तो बहुत कम होता था, शब्द-योजना भी बहुत सुन्दर न होती थी; […]

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रामलीला – मुंशी प्रेमचंद

इधर एक मुद्दत से रामलीला देखने नहीं गया। बंदरों के भद्दे चेहरे लगाये,आधी टाँगों का पाजामा और काले रंग का ऊँचा कुरता पहने आदमियों को दौड़ते, हू-हू करते देख कर अब हँसी आती है; मजा नहीं आता। काशी की लीला जगद्विख्यात है। सुना है, लोग दूर-दूर से देखने आते हैं। मैं भी बड़े शौक से […]

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निमंत्रण – मुंशी प्रेमचंद

पंडित मोटेराम शास्त्री ने अंदर जाकर अपने विशाल उदर पर हाथ फेरते हुए यह पद पंचम स्वर में गाया – ‘अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम, दाम मलूका कह गये, सबके दाता राम’ सोना ने प्रफुल्लित होकर पूछा – कोई मीठी ताजी खबर है क्या? शास्त्री जी ने पैंतरे बदलकर कहा – मार […]

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मंदिर – मुंशी प्रेमचंद

मातृ प्रेम, तुझे धन्य है! संसार में और जो कुछ है, मिथ्या है, निस्सार है। मातृ-प्रेम ही सत्य है, अक्षय है, अनश्वर है। तीन दिन से सुखिया के मुंह में न अन्न का एक दाना गया था, न पानी की एक बूंद। सामने पुआल पर माता का नन्हा-सा लाल पड़ा कराह रहा था। आज तीन […]

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