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ममता – मुंशी प्रेमचंद

बाबू रामरक्षादास दिल्ली के एक ऐश्वर्यशाली खत्री थे, बहुत ही ठाठ-बाट से रहने वाले। बड़े-बड़े अमीर उनके यहां नित्य आते-जाते थे। वे आए हुओं का आदर-सत्कार ऐसे अच्छे ढंग से करते थे कि इस बात की धूम सारे मुहल्ले में थी। नित्य उनके दरवाजे पर किसी-न-किसी बहाने से इष्ट-मित्र एकत्र हो जाते। टेनिस खेलते, ताश […]

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ईश्वरीय न्याय – मुंशी प्रेमचंद

कानपुर जिले में पंडित भृगुदत्त नामक एक बड़े जमींदार थे। मुंशी सत्यनारायण उनके कारिंदा थे। वह बड़े स्वामिभक्त और सच्चरित्र मनुष्य थे। लाखों रुपये की तहसील और हजारों मन अनाज का लेन-देन उनके हाथों में था, पर कभी उनकी नीयत डावांडोल न होती। उनके सुप्रबन्ध से रियासत दिलों-दिल उन्नति करती जाती थी। ऐसे कर्तव्यपरायण सेवक […]

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ऐक्ट्रेस – मुंशी प्रेमचंद

रंगमंच का परदा गिर गया। तारादेवी शकुंतला का पार्ट खेलकर दुष्यंत के सम्मुख खड़ी, ग्लानि, वेदना और तिरस्कार से उत्तेजित भावों को आग्नेय शब्दों में प्रकट कर रही थी, दर्शक-वृंद शिष्टता के नियमों की उपेक्षा करके मंच की ओर उन्मत्तों की भांति दौड़ पड़े थे और तारादेवी के चरणों पर गिर पड़े। सारा स्टेज फूलों […]

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आत्मसंगीत – मुंशी प्रेमचंद

आधी रात थी। नदी का किनारा था। आकाश के तारे स्थिर थे और नदी में उनका प्रतिबिम्ब लहरों के साथ चंचल। एक स्वर्गीय संगीत की मनोहर और जीवनदायिनी, प्राणदायिनी ध्वनि इस निस्तब्ध और तमोमय दृश्य पर इस प्रकार छा रही थी, जैसे हृदय आशाएं छायी रहती हैं, या मुख-मंडल पर शोक। रानी मनोरमा ने आज […]

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सोहाग का शव – मुंशी प्रेमचंद

मध्यप्रदेश के एक पहाड़ी गांव में एक छोटे-से घर की छत पर एक युवक मानो संध्या की निस्तब्धता में लीन बैठा था। सामने चंद्रमा के मलिन प्रकाश में ऊंची पर्वतमालाएं अनन्त के स्वप्न की भांति गम्भीर, रहस्यमय, संगीतमय, मनोहर मालूम होती थीं, उन पहाड़ियों के नीचे जलधारा की रौप्य रेखा ऐसी मालूम होती थी, मानो […]

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पिसनहारी का कुआँ – मुंशी प्रेमचंद

गोमती ने मृत्यु-शय्या पर पड़े हुए चौधरी विनायकसिंह से कहा -चौधरी, मेरे जीवन की यही लालसा थी। चौधरी ने गम्भीर हो कर कहा -इसकी कुछ चिंता न करो काकी; तुम्हारी लालसा भगवान् पूरी करेंगे। मैं आज ही से मजूरों को बुला कर काम पर लगाये देता हूँ। दैव ने चाहा, तो तुम अपने कुएँ का […]

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सुजान भगत – मुंशी प्रेमचंद

सीधे-सादे किसान धन हाथ आते ही धर्म और कीर्ति की ओर झुकते हैं।दिव्य समाज की भाँति वे पहले अपने भोग-विलास की ओर नहीं दौड़ते। सुजान की खेती में कई साल से कंचन बरस रहा था। मेहनत तो गाँव के सभी किसान करते थे, पर सुजान के चंद्रमा बली थे, ऊसर में भी दाना छींट आता […]

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अग्नि समाधि – मुंशी प्रेमचंद

साधु-संतों के सत्संग से बुरे भी अच्छे हो जाते हैं, किन्तु प्रयाग का दुर्भाग्य था कि उस पर सत्संग का उलटा ही असर हुआ। उसे गांजे, चरस और भंग का चस्का पड़ गया, जिसका फल यह हुआ कि एक मेहनती, उद्यमशील युवक आलस्य का उपासक बन बैठा। जीवन-संग्राम में यह आनंद कहां। किसी वट-वृक्ष के […]

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आँसुओं की होली – मुंशी प्रेमचंद

नामों को बिगाड़ने की प्रथा-जाने कब चली और कहां शुरू हुई। कोई इस संसार-व्यापी रोग का पता लगाए तो ऐतिहासिक संसार में अवश्य ही अपना नाम छेड़ जाय। पंडित का नाम तो श्रीविलास था पर मित्र लोग सिलबिल कहा करते थे। नामों का असर चरित्र पर कुछ-न-कुछ पड़ जाता है। बेचारे सिलबिल सचमुच ही सिलबिल […]

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कजाकी – मुंशी प्रेमचंद

मेरी बाल-स्मृतियों में ‘कजाकी’ एक न मिटने वाला व्यक्ति है। आज चालीस साल गुजर गये; कजाकी की मूर्ति अभी तक आँखों के सामने नाच रही है। मैं उन दिनों अपने पिता के साथ आजमगढ़ की एक तहसील में था। कजाकी जाति का पासी था, बड़ा ही हँसमुख, बड़ा ही साहसी, बड़ा ही जिंदादिल। वह रोज […]

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