nimantran by munshi premchand
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चिंता – इसमें अपमान की तो कोई बात नहीं है, भाई।

मोटे – अब हम इस द्वार पर कभी न आयेंगे। यहां सत्पुरुषों का अपमान किया जाता है।

अलगू – कहिए तो मैं चिंतामणि को एक पटकन दूं।

मोटे – नहीं बेटा, दुष्टों को परमात्मा स्वयं दंड देता है। चलो, यहां से चलें। अब भूलकर यहां न आयेंगे। खिलाना न पिलाना, द्वार पर आकर ब्राह्मणों का अपमान करना। तभी तो देश में आग लगी हुई है।

चिंता – मोटेराम, महारानी के सामने तुम्हें इतनी कटु बातें न करनी चाहिए।

मोटे – बस चुप रहना, नहीं तो तारा क्रोध तुम्हारे ही सिर जायेगा। माता-पिता का पता नहीं, ब्राह्मण बनने चले हैं। तुम्हें कौन कहता है ब्राह्मण?

चिंता – जो कुछ मन चाहे, कह लो। चंद्रमा पर थूकने से थूक अपने ही मुंह पर पड़ता है। जब तुम धर्म का एक लक्षण नहीं जानते, तब तुमसे क्यों बातें करूं? ब्राह्मण को धैर्य रखवा चाहिए।

मोटे – पेट के गुलाम हो। ठकुरसोहाती कर रहे हो कि एकाध पत्तल मिल जाये। यहां मर्यादा का पालन करते हैं।

चिंता – कह तो दिया भाई कि तुम बड़े, मैं छोटा, अब और क्या कहूं। तुम सत्य कहते होंगे, मैं ब्राह्मण नहीं, शूद्र हूं।

रानी – ऐसा न कहिए चिंतामणि जी।

‘इसका बदला न लिया तो कहना!’ यह कहते हुए पण्डित मोटेराम बालक-वृंद के साथ बाहर चले आये और भाग्य को कोसते हुए घर को चले। बार-बार पछता रहे थे कि दुष्ट चिंतामणि को क्यों बुला लाया।

सोना ने कहा – भंडा फूटत-फूटत बच गया। फेंकुआ नाव बताय देता। काहे रे, अपने बाप के नाव बताय देते।

फेंकू – और क्या। वे तो सच-सच पूछती थीं।

मोटे – चिंतामणि ने रंग जमा लिया, अब आनंद से भोजन करेगा।

सोना – तुम्हार एको विद्या काम न कोई। ऊँ तौन बाजी मार लेगा।

मोटे – मैं तो जानता हूं रानी ने जान-बूझकर कुत्ते को बुला लिया।

सोना – मैं तो ओका मुंह देखत ताड़ गई कि हमका पहचान गईं।

इधर तो ये लोग पछताते चले जाते थे, उधर चिंतामणि की पांचों अंगुली घी में थी। आसन मारे भोजन कर रहे थे। रानी अपने हाथों से मिठाइयां परोस रही थी, वार्तालाप भी होता जाता था।

रानी – बड़ा धूर्त है? मैं बालकों को देखते ही समझ गई। अपनी स्त्री को भेष बदलकर लाते उसे लज्जा न आई।

चिंता – मुझे कोस रहे होंगे।

रानी – मुझसे उड़ने चला था। मैंने भी कहा था – बचा, तुमको ऐसे शिक्षा दूंगी कि उम्र भर याद करोगे। टॉमी को बुला लिया।

चिंता – सरकार की बुद्धि को धन्य है।