nairaashy-leela by munshi premchand
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शनैः-शनैः यह विलासोन्माद शान्त होने लगा। वासना का तिरस्कार किया जाने लगा। पंडितजी संध्या समय ग्रामोफोन न बजाकर कोई धर्म-ग्रंथ पढ़कर सुनाते। स्वाध्याय, संयम, उपासना में माँ-बेटी रत रहने लगी। कैलासी को गुरुजी ने दीक्षा दी, मुहल्ले और बिरादरी की स्त्रियाँ आयीं, उत्सव मनाया गया।

माँ-बेटी अब किश्ती पर सैर करने के लिए गंगा न जातीं, बल्कि स्नान करने के लिए। मंदिरों में नित्य जातीं। दोनों एकादशी का निर्जल व्रत रखने लगीं। कैलासी को गुरुजी नित्य सच्चा-समय धर्मोपदेश करते। कुछ दिनों तक तो कैलासी को यह विचार-परिवर्तन बहुत कष्ट-जनक मालूम हुआ, पर धर्मनिष्ठा नारियों का स्वाभाविक गुण है, थोड़े ही दिनों में उसे धर्म से रुचि हो गई। अब उसे अपनी अवस्था का ज्ञान होने लगा था। विषय-वासना से चित्त अपने- ही-आप खिंचने लगा। ‘पति’ का यथार्थ आशय समझ में उगने लगा था। पति ही स्त्री का सखा मित्र, सच्चा पथ-प्रदर्शक और सच्चा सहायक है। पति-विहीन होना किसी घोर पाप का प्रायश्चित्त है। मैंने पूर्व जन्म में कोई अकर्म किया होगा। पतिदेव जीवित होते, तो मैं फिर माया में फंस जाती। प्रायश्चित्त का अवसर नहीं मिलता! गुरुजी का वचन सत्य है कि परमात्मा ने तुम्हें पूर्व-कर्मों के प्रायश्चित्त का यह अवसर दिया है। वैधव्य यातना नहीं है, जीवोद्धार का साधन है। मेरा उद्धार त्याग, विराग, भक्ति और उपासना ही से होगा।

कुछ दिनों के बाद उसकी धार्मिक वृत्ति इतनी प्रबल हो गई कि अन्य प्राणियों से यह पृथक् रहने लगी। किसी को न छूती, महरियों से दूर रहती, सहेलियों से गले तक न मिलती, दिन में दो-दो तीन-तीन बार स्नान करती, हमेशा कोई-न- कोई धर्म-ग्रंथ पढ़ा करती। साधु-महात्माओं के सेवा-सत्कार में उसे आत्मिक सुख प्राप्त होता। जहाँ किसी महात्मा के आने की खबर पाती, उनके दर्शनों के लिए विकल हो उठती। उनकी अमृतवाणी सुनने से जी न भरता। मन संसार से विरक्त होने लगा। तल्लीनता की अवस्था प्राप्त हो गई। हृदय स्वाधीनता के लिए लालायित हो गया, यहाँ तक कि तीन ही बरसों में उसने संन्यास ग्रहण करने का निश्चय कर लिया।

माँ-बाप को यह समाचार ज्ञात हुआ तो होश उड़ गए। माँ बोली- बेटी, अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है कि तुम ऐसी बातें सोचती हो।

कैलास कुमारी- माया-मोह से जितनी जल्दी निवृत्ति हो जाये, उतना ही अच्छा।

हृदयनाथ- क्या अपने घर में रहकर माया-मोह से मुक्त नहीं हो सकती हो? माया-मोह का स्थान मन है, घर नहीं।

जागेश्वरी- कितनी बदनामी होगी।

कैलास कुमारी- अपने को भगवान् के चरणों पर अर्पण कर चुकी, तो मुझे बदनामी की क्या चिंता?

जागेश्वरी- बेटी, तुम्हें न हो, हमको तो है। हमें तो तुम्हारा ही सहारा है। तुमने जो संन्यास ले लिया, तो हम किस आधार पर जिएँगे?

कैलास कुमारी- परमात्मा ही सबका आधार है। किसी दूसरे प्राणी का आश्रय लेना भूल है।

दूसरे दिन यह बात मुहल्ले वालों के कानों में पहुँच गई। जब कोई अवस्था असाध्य हो जाती है, तो हम उस पर व्यंग्य करने लगते हैं। यह तो होना ही था, नई बात क्या हुई? लड़कियों को इस तरह स्वच्छंद नहीं कर दिया जाता। फूले न समाते थे कि लड़की ने कुल का नाम उज्ज्वल कर दिया। पुराण पढ़ती है, उपनिषद और वेदान्त का पाठ करती है, धार्मिक समस्याओं पर ऐसी-ऐसी दलीलें करती है कि बड़े-बड़े विद्वानों की जबान बंद हो जाती है, तो अब क्यों पछताते हैं?’ भद्र पुरुषों में कई दिनों तक यही आलोचना होती रही। लेकिन जैसे अपने बच्चे के दौड़ते-दौड़ते धम्म से गिर पड़ने पर हम पहले क्रोध के आवेश में उसे झिड़कियाँ सुनाते हैं, इसके बाद गोद में बिठाकर आँसू पोंछने और फुसलाने लगते हैं, उसी तरह इन भद्र ने व्यंग्य के बाद इस गुत्थी के सुलझाने का उपाय सोचना शुरू किया। सभी हृदयनाथ के पास आये और सिर झुकाकर बैठ गए। विषय का आरम्भ कैसे हो?

कई मिनट के बाद एक सज्जन ने कहा- सुना है, डॉक्टर गौड़ का प्रस्ताव आज बहुमत से स्वीकृत हो गया।

दूसरे महाशय बोले- यह लोग हिंदू-धर्म का सर्वनाश करके छोड़ेंगे।

तीसरे महानुभाव ने फरमाया- सर्वनाश तो हो ही रहा है, अब और कोई क्या करेगा! जब हमारे साधु-महात्मा, जो हिन्दू, जाति के स्तम्भ हैं, इतने पतित हो गए हैं कि भोली-भाली युवतियों को बहकाने में संकोच नहीं करते, तो सर्वनाश होने में रह ही क्या गया।

हृदयनाथ- यह विपत्ति तो मेरे सिर ही यही हुई है। आप लोगों को तो मालूम होगा।

पहले महाशय- आप ही के सिर क्यों, हम सभी के सिर पड़ी हुई है।

दूसरे महाशय- समस्त जाति के सिर कहिए।

हृदयनाथ- उद्धार का कोई उपाय सोचिए।

पहले महाशय- आपने समझाया नहीं?

हृदयनाथ- समझा के हार गया। कुछ सुनती ही नहीं।

तीसरे महाशय- पहले ही भूल हो गई। उसे इस रास्ते पर डालना ही नहीं चाहिए था।

पहले महाशय- उस पर पछताने से क्या होगा? सिर पर जो पड़ी है उसका उपाय सोचना चाहिए। आपने समाचार पत्रों में देखा होगा, कुछ लोगों की सलाह है कि विधवाओं से अध्यापकों का काम लेना चाहिए। यद्यपि मैं इसे भी बहुत अच्छा नहीं समझता, पर संन्यासिनी बनने से तो कहीं अच्छा है। लड़की अपनी आँखों के सामने तो रहेगी। अभिप्राय केवल यही है कि कोई ऐसा काम होना चाहिए, जिसमें लड़की का मन लगे। किसी अवलम्ब के बिना मनुष्य को भटक जाने की शंका सदैव बनी रहती है। जिस घर में कोई नहीं रहता, उसमें चमगादड़ बसेरा लेते हैं।

दूसरे महाशय- सलाह तो अच्छी है। मुहल्ले की दस-पाँच कक्षाएँ पढ़ने के लिए बुला ली जाएँ। उन्हें किताबें, गुड़िया आदि इनाम मिलता रहे, तो बड़े शौक से आएँगी। लड़की का मन तो लग जायेगा।

हृदयनाथ- देखना चाहिए। भरसक समझाऊंगा।

ज्यों ही यह लोग विदा हुए, हृदयनाथ ने कैलास कुमारी के सामने यह तजवीज पेश की। कैलासी को संन्यस्त के उच्च पद के सामने अध्यापिका बनना अपमानजनक जान पड़ा था। कहाँ वह महात्माओं का सत्संग, यह पर्वतों की गुफा, वह सुरम्य प्राकृतिक दृश्य, वह हिमराशि की ज्ञानमय ज्योति, वह मानसरोवर और कैलास की शुभ्र छटा, वह आत्म-दर्शन की विशाल कल्पनाएँ और कहां बालिकाओं को चिड़ियों की भांति पढ़ाना। लेकिन हृदयनाथ कई दिनों तक लगातार सेवा-धर्म का बहाल उसके हृदय पर अंकित करते रहे। सेवा ही वास्तविक संन्यास है। संन्यासी केवल अपनी मुक्ति का रक्षक होता है, सेवा-व्रतधारी अपने को परमार्थ की वेदी पर बलि दे देता है। इसका गौरव कहीं अधिक है। देखो, ऋषियों में दधीचि का जो यश है, हरिश्चन्द्र की जो कीर्ति है, उसकी तुलना और कहीं की जा सकती है। संन्यास स्वार्थ है, सेवा त्याग है, आदि। उन्होंने इस कथन की उपनिषदों और वेद-मंत्रों से पुष्टि की। यहाँ तक कि धीरे-धीर कैलासी के विचारों में परिवर्तन होने लगा। पंडितजी ने मुहल्ले वालों की लड़कियों को एकत्र किया, पाठशाला का जन्म हो गया। नाना प्रकार के चित्र और खिलौने मँगाए। पंडितजी स्वयं कैलासी साथ लड़कियों को पढ़ाते। कन्याएँ शौक से आतीं। उन्हें यहाँ की पढ़ाई खेल मालूम होती। थोड़े ही दिनों में पाठशाला की धूम हो गई, अन्य मुहल्लों की कन्याएँ भी आने लगीं।