कैलास कुमारी की सेवा-प्रवृत्ति दिनोंदिन तीव्र होने लगी। दिन भर लड़कियों को लिये रहती, कभी पढ़ाती, कभी उनके साथ खेलती, कभी सीना-पिरोना सिखाती। पाठशाला ने परिवार का रूप धारण कर लिया। कोई लड़की बीमार हो जाती, तो तुरंत उसके घर जाती, उसकी सेवासुश्रूषा करती, गाकर या कहानियाँ सुनाकर उसका दिल बहलाती।
पाठशाला को खुले हुए साल-भर हुआ था। एक लड़की को, जिससे वह बहुत प्रेम करती थी, चेचक निकल आई। कैलासी उसे देखने गई। माँ-बाप ने बहुत मना किया, पर उसने न माना। कहा, तुरन्त लौट आऊंगी। लड़की की हालत खराब थी। कहां तो रोते-रोते तालू सूखता था, वहीं कैलासी को देखते ही मानो सारे कष्ट भाग गए। कैलासी एक घण्टे तक वहाँ रही। लड़की बराबर उससे बातें करती रही। लेकिन जब वह चलने को उठी, तो लड़की ने रोना शुरू किया। कैलासी मजबूर होकर बैठ गई। थोड़ी देर के बाद जब वह फिर उठी, तो फिर लड़की की यही दशा हो गई। लड़की उसे किसी तरह छोड़ती ही न थी। सारा दिन गुजर गया। रात को भी लड़की ने न आने दिया। हृदयनाथ उसे बुलाने को बार-बार आदमी भेजते, पर वह लड़की को छोड़कर न जा सकती। उसे ऐसी शंका होती थी कि मैं यहाँ से चली और लड़की हाथ से गई। उसकी माँ विमाता थी। इससे- कैलासी को उसके ममत्व पर विश्वास न होता था। इस प्रकार वह तीन दिन तक वहाँ रही। आठों पहर बालिका के सिरहाने बैठी पंखा झलती रहती। बहुत थक जाती तो दीवार से पीठ टेक लेती। चौथे दिन लड़की की हालत कुछ संभलती हुई मालूम हुई तो वह अपने घर आयी, मगर अभी स्नान भी न करने पायी थी कि आदमी पहुँचा- जल्द चलिए, लड़की रो-रोकर जान दे रही है।
हृदयनाथ ने कहा- कह दो, अस्पताल से कोई नर्स बुला लें।
कैलास कुमारी- दादा, आप व्यर्थ में झुँझलाते हैं। उस बेचारी की जान बच जाये, मैं तीन दिन नहीं, तीन महीने उसकी सेवा करने को तैयार हूँ। आखिर यह देह किस दिन काम आएगी?
हृदयनाथ- तो कन्याएँ कैसे पढ़ेगीं ?
कैलासी- दो एक दिन में वह अच्छी हो जायेगी, दाने मुरझाने लगे हैं, तब तक आप जरा लड़कियों की देखभाल करते रहें।
हृदयनाथ- यह बीमारी छूत से फैलती है।
कैलासी-(हँसकर) मर जाऊंगी तो आपके सिर से एक विपत्ति टल जायेगी। यह कहकर उसने उधर की राह ली। भोजन की थाली परसी रह गई।
तब हृदयनाथ ने जागेश्वरी से कहा- जान पड़ता है, बहुत जल्द यह पाठशाला भी बंद करनी पड़ेगी।
जागेश्वरी- बिना माँझी के नाव पार लगाना कठिन है। जिधर हवा पाती है, उधर ही बह जाती है।
हृदयनाथ- जो रास्ता निकालता हूँ वही कुछ दिनों के बाद किसी दलदल में फंसा देता है। अब फिर बदनामी के सामान होते नजर आ रहे है। लोग कहेंगे, लड़की दूसरों के घर जाती है और कई-कई दिन पड़ी रहती है। क्या करूँ? कह दूं लड़कियों को न पढ़ाया करो?
जागेश्वरी- इसके सिवा और हो ही क्या सकता है?
कैलास कुमारी दो दिन के बाद लौटी, तो हृदयनाथ ने पाठशाला बंद कर देने की समस्या उसके सामने रखी। कैलासी ने तीव्र स्वर से कहा- अगर आपको बदनामी का इतना भय है, तो मुझे विष दे दीजिए। इसके सिवा बदनामी से बचने का और कोई उपाय नहीं है।
हृदयनाथ- बेटी, संसार में रहकर तो संसार की-सी करनी ही पड़ेगी।
कैलासी- तो कुछ मालूम भी तो हो कि संसार मुझसे क्या चाहता है! मुझमें जीव है, चेतना है, जड़ क्यों कर बन जाऊँ! मुझसे यह नहीं हो सकता कि अपने को अभागिनी, दुखिया, समझूँ और एक टुकड़ा रोटी खाकर पड़ी रहूँ। ऐसा क्यों करूँ? संसार मुझे जो चाहे समझे, मैं अपने को अभागिनी नहीं समझती। मैं अपने आत्म-सम्मान की रक्षा आप ही कर सकती हूँ। मैं इसे अपना घोर अपमान समझती हूँ कि पग-पग पर मुझ पर शंका की जाये, नित्य कोई चरवाहा की भांति मेरे पीछे लाठी लिये घूमता रहे कि किसी खेत में न जा पड़े। यह दशा मेरे लिए असह्य है।
यह कहकर कैलास कुमारी वहाँ से चली गयी कि कहीं मुँह से अनर्गल शब्द न निकल पड़ें। इधर कुछ दिनों से उसे अपनी बेकसी का यथार्थ ज्ञान होने लगा था। स्त्री पुरुष की कितनी अधीन है, मानो स्त्री को विधाता ने इसीलिए बनाया है कि वह पुरुषों के अधीन रहे। यह सोचकर यह समाज के अत्याचार पर दाँत पीसने लगती थी।
पाठशाला तो दूसरे ही दिन से बंद हो गई, किन्तु उसी दिन से कैलास कुमारी को पुस्तकों से जलन होने लगी। जिस सुख-भोग से प्रारब्ध हमें वंचित कर देता है, उससे हमें द्वेष हो जाता है। गरीब आदमी इसीलिए तो अमीरों से जलता है और धन की निन्दा करता है। कैलासी बार-बार झुँझलाती कि स्त्री क्यों पुरुष पर इतनी अवलम्बित है? पुरुष क्यों स्त्री के भाग्य का विधायक है? स्त्री क्यों नित्य पुरुषों का आश्रय चाहे, उनका मुँह ताके? इसीलिए न कि स्त्रियों में अभिमान नहीं है, आत्मसम्मान नहीं है। नारी-हृदय के कोमल भाव, उसे कुत्ते का दुम हिलाना मालूम होने लगे। प्रेम कैसा? यह सब ढोंग है, स्त्री पुरुष के अधीन है। उसकी खुशामद न करे, सेवा न करे, तो उसका निर्वाह कैसे हो?
एक दिन उसने अपने बाल गूंथे और जूड़ा में एक गुलाब का फूल लगा लिया। माँ ने देखा तो होंठ से जीभ दबा ली। महरियों ने छाती पर हाथ रखे।
इसी दिन उसने एक रंगीन रेशमी साड़ी पहन ली। पड़ोसियों में इस पर खूब आलोचनाएँ हुईं।
उसने एकादशी का व्रत रखना छोड़ दिया, जो पिछले आठ वर्षों से रखती आयी थी। कंघी और आईने को यह अब त्याज्य न समझती थी।
सहालग के दिन आये। नित्य प्रति उसके द्वार पर से बारात निकलती। मुहल्ले की स्त्रियाँ अपनी-अपनी अटारियों पर खड़ी होकर देखतीं। वर के ढंग-रूप, आकार- प्रकार पर टीकाएँ होतीं, जागेश्वरी से भी बिना एक आंख देखे न रहा जाता। लेकिन कैलास कुमारी कभी भूलकर भी इन जलसों को न देखती। कोई बारात या विवाह की बात चलाता तो यह मुँह फेर लेती। उसकी दृष्टि में वह विवाह नहीं, भोली- भाली कन्याओं का शिकार था। बारातियों को वह शिकारियों के कुत्ते समझती। यह विवाह नहीं है स्त्री का बलिदान है।
तीज का व्रत आया। घरों में सफाई होने लगी। रमणियाँ इस व्रत को रखने की तैयारियाँ करने लगी। जागेश्वरी ने भी व्रत का सामान किया। नई-नई साड़ियाँ मंगायी। कैलास कुमारी की ससुराल से इस अवसर पर कपड़े, मिठाइयाँ और खिलौने आया करते थे। अबकी भी आये। यह विवाहिता स्त्रियों का व्रत है। इसका फल है, पति का कल्याण। विधवाएँ भी इस व्रत का यथोचित रीति से पालन करती हैं। पति से उनका सम्बन्ध शारीरिक नहीं वरन् आत्मिक होता है। उसका इस जीवन के साथ अंत नहीं होता, अनन्त काल तक जीवित रहता है। कैलास कुमारी अब तक वह व्रत रहती आई थी। अबकी उसने निश्चय किया, मैं व्रत न रखूँगी। माँ ने सुना तो माथा ठोक लिया। बोली- बेटी, यह व्रत रखना तुम्हारा धर्म है।
कैलास कुमारी- पुरुष भी स्त्रियों के लिए कोई व्रत रखते हैं?
जागेश्वरी- मर्दों में इसकी प्रथा नहीं है।
