चित्तौड़ के रंग-महल में प्रभा उदास बैठी सामने के सुन्दर पौधों की पत्तियां गिन रही थी। संध्या का समय था। रंग-बिरंगे पक्षी वृक्षों पर बैठे कलरव कर रहे थे। इतने में राणा ने कमरे में प्रवेश किया। प्रभा उठकर खड़ी हो गयी।
राणा बोले – ‘प्रभा, मैं तुम्हारा अपराधी हूं। मैं बलपूर्वक तुम्हें माता-पिता की गोद से छीन लाया, पर यदि मैं तुमसे कहूं कि यह सब तुम्हारे प्रेम से विवश होकर मैंने किया, तो तुम मन में हंसोगी और कहोगी कि यह निराले, अनूठे ढंग की प्रीति है, पर वास्तव में यही बात है। जब से मैंने रणछोड़जी के मंदिर में तुमको देखा है, तब से एक क्षण भी ऐसा नहीं बीता कि मैं तुम्हारी सुधि में विकल न रहा होऊं। तुम्हें अपनाने का अन्य कोई उपाय होता तो मैं कदापि इस पाशविक ढंग से काम न लेता। मैंने राव साहब की सेवा में बार-बार संदेश भेजे, पर उन्होंने हमेशा मेरी उपेक्षा की। अन्त में जब तुम्हारे विवाह की अवधि आ गयी और मैंने देखा कि एक ही दिन में तुम दूसरे की प्रेम-पात्री हो जाओगी और तुम्हारा ध्यान करना भी मेरी आत्मा को दूषित करेगा, तो लाचार होकर मुझे यह अनीति करनी पड़ी। मैं जानता हूं कि यह सर्वथा मेरी स्वार्थांधता है, मैंने अपने प्रेम के सामने तुम्हारे मनोगत भावों को कुछ न समझा, पर प्रेम स्वयं एक बड़ी हुई स्वार्थपरता है, जब मनुष्य को अपने प्रियतम के सिवाय और कुछ नहीं सूझता। मुझे पूरा विश्वास था कि मैं अपने विनीत भाव और प्रेम से तुमको अपना लूंगा। प्रभा, प्यास से मरता हुआ मनुष्य यदि किसी गड्ढे में मुंह डाल दे, तो वह दंड का भागी नहीं है। मैं प्रेम का प्यासा हूं। मीरा मेरी सहधर्मिणी है। उसका हृदय प्रेम का अगाध सागर है। उसका एक चुल्लू भी मुझे उन्मत्त करने के लिए काफी था, पर जिस हृदय में ईश्वर का वास हो, वहां मेरे लिए स्थान कहां? तुम शायद कहोगी कि यदि तुम्हारे सिर पर प्रेम का भूत सवार था तो क्या सारे राजपूताने में स्त्रियां न थी। निःसंदेह राजपूताने में बात-चीत किसी के अनादर का कारण हो सकती है, पर इसका जवाब तुम आप ही हो। इसका दोष तुम्हारे ही ऊपर है। राजस्थान में एक ही चित्तौड़ है, एक ही राणा और एक ही प्रभा। सम्भव है मेरे भाग में प्रेमानंद भोगना न लिखा हो। यह मैं अपने कर्म-लेख को मिटाने का थोड़ा-सा प्रयत्न कर रहा हूं परन्तु भाग्य के अधीन बैठे रहना पुरुषों का काम नहीं है। मुझे इसमें सफलता होगी या नहीं, इसका फैसला तुम्हारे हाथ है।
प्रभा की आंखें जमीन की तरफ थी। मन फुदकने वाली चिड़िया की भांति इधर-उधर उड़ता फिरता था। वह झालावाड़ को मारकाट से बचाने के लिए राणा के साथ आयी थी, मगर राणा के प्रति उसके हृदय में क्रोध की तरंगें उठ रही थीं। उसने सोचा था कि वे यहां आयेंगे तो उन्हें राजपूत कुल-कलंक, अन्यायी, दुराचारी, दुरात्मा, कायर कहकर उनका गर्व चूक-चूर कर दूंगी। उसको विश्वास था कि यह अपमान उनसे न सहा जायेगा। और वे मुझे बलात् अपने काबू में लाना चाहेंगे। इस अंतिम समय के लिए उसने अपने हृदय को खूब मजबूत और और कटार को खूब तेज कर रखा था। उसने निश्चय कर लिया था कि इसका एक वार उन पर होगा, दूसरा अपने कलेजे पर और इस प्रकार यह पाप-कांड समाप्त हो जाएगा। लेकिन राणा की नम्रता, उनकी करुणात्मक विवेचना और उनके विनीत भाव ने प्रभा को शांत कर दिया। आग पानी से बुझ जाती है। राणा कुछ देर वहां बैठे, फिर उठकर चले गये।
प्रभा को चित्तौड़ में रहते दो महीने गुजर चुके हैं। राणा उसके पास फिर न आए। इस बीच में उनके विचारों में कुछ अंतर हो गया है। झालावाड़ पर आक्रमण होने के पहले मीराबाई को इसकी बिलकुल खबर न थी। राणा ने इस प्रस्ताव को गुप्त रखा था। किंतु अब मीराबाई प्रायः उन्हें इस दुराग्रह पर लज्जित किया करती हैं और धीरे-धीरे राणा को भी विश्वास होने लगा है कि प्रभा इस तक काबू में नहीं आ सकती। उन्होंने उसके सुख-विलास की सामग्री एकत्र करने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी थी। लेकिन प्रभा उनकी तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखती। राणा प्रभा की लौंडियों से नित्य का समाचार पूछा करते हैं। और उन्हें रोज वही निराशपूर्ण वृत्तांत सुनाई देता है। मुरझायी हुई कली किसी भांति नहीं खिलती। अतएव उनको कभी-कभी अपने इस दुस्साहस पर पश्चाताप होता है। वे पछताते हैं कि मैंने व्यर्थ ही यह अन्याय किया। लेकिन फिर प्रभा का अनुपम सौंदर्य नेत्रों के सामने आ जाता है। वह अपने मन को इस विचार से समझा लेते हैं कि एक सगर्वा सुंदरी का प्रेम इतनी जल्दी परिवर्तन नहीं हो सकता। निस्संदेह मेरा मृदु व्यवहार कभी-न-कभी अपना प्रभाव खिलायेगा।
प्रभा सारे दिन अकेले बैठे-बैठे उकताती और झुंझलाती थी। उसके विनोद के निमित्त कई गाने वाली स्त्रियां नियुक्त थी? किंतु राग-रंग से उसे अरुचि हो गयी थी। वह प्रतिक्षण चिंताओं में डूबी रहती थी।
राणा के नम्र भाषण का प्रभाव अब मिट चुका था और उनकी अमानुषिक वृत्ति अब फिर अपने यथार्थ रूप में दिखायी देने लगी थी। वाक्चतुरता शांतिकारक नहीं होती। वह केवल निरुत्तर कर देती है! प्रभात को अब अपने अवाक् हो जाने पर आश्चर्य होता है। उसे राणा की बातों के उत्तर भी सूझने लगे हैं। वह कभी-कभी उनसे लड़कर अपनी किस्मत का फैसला करने के लिए विकल हो जाती है।
मगर अब वाद-विवाद किस काम का? वह सोचती है कि मैं राव साहब की कन्या हूं पर संसार की दृष्टि में राणा की रानी हो चुकी। अब यदि मैं इस कैद से छूट भी जाऊं तो मेरे लिए कहां ठिकाना है? मैं कैसे मुंह दिखाऊंगी? इससे केवल मेरे वंश का ही नहीं, वरन् समस्त राजपूत-जाति का नाम डूब जायगा। मंदार-कुमार मेरे सच्चे प्रेमी हैं। मगर क्या वे मुझे अंगीकार करेगें और यदि वे निंदा की परवाह न करके मुझे ग्रहण भी कर लें तो उनका मस्तक सदा के लिए नीचा हो जायगा और कभी न कभी उनका मन मेरी तरफ से फिर जायगा। वे मुझे अपने कुल का कलंक समझने लगेंगे। या यहाँ से किसी तरह भाग जाऊँ लेकिन भाग कर जाऊँ कहाँ बाप के घर वहाँ अब मेरी पैठ नहीं। मंदार-कुमार के पास इसमें उनका अपमान है और मेरा भी। तो क्या भिखारिणी बन जाऊँ इसमें भी जग-हँसाई होगी और न जाने प्रबल भावी किस मार्ग पर ले जाय। एक अबला स्त्री के लिए सुंदरता प्राणघातक यंत्र से कम नहीं। ईश्वर वह दिन न आये कि मैं क्षत्रिय-जाति का कलंक बनूँ। क्षत्रिय-जाति ने मर्यादा के लिए पानी की तरह रक्त बहाया है। उनकी हजारों देवियां पर-पुरुष का मुंह देखने के भय से सूखी लकड़ी के समान जल मरी हैं। ईश्वर, वह घड़ी न आये कि मेरे कारण किसी राजपूत का सिर लज्जा से नीचा हो। नहीं, मैं इसी कैद में मर जाऊंगी। राणा के अन्याय सहूंगी, जलूंगी, मरूंगी पर इसी घर में। विवाह जिससे होना था हो गया। हृदय में उसकी उपासना करूंगी, पर कंठ के बाहर उसका नाम न निकालूंगी।
एक दिन झुंझलाकर उसने राणा को बुला भेजा। वे आये, उनका चेहरा उतरा था। वे कुछ चिंतित से थे। प्रभा कुछ कहना चाहती थी पर उनकी सूरत देखकर उसे उन पर दया आ गयी। उन्होंने उसे बात करने का अक्सर न देकर स्वयं कहना शुरू किया।
‘प्रभा, तुमने आज मुझे बुलाया है। यह मेरा सौभाग्य है। तुमने मेरी सुधि तो ली मगर यह मत समझो कि मैं मृदु-वाणी सुनने की आशा लेकर आया हूं। नहीं, मैं जानता हूं जिसके लिए तुमने मुझे बुलाया है। यह लो, तुम्हारा अपराधी तुम्हारे सामने खड़ा है। उसे जो दंड देना चाहो, दो। मुझे अब तक आने का साहस न हुआ। इसका कारण यही दंड भय था। तुम क्षत्राणी हो और क्षत्राणियां क्षमा करना नहीं जानती। झालावाड़ में जब तुम मेरे साथ आने पर स्वयं उद्यत हो गयी, तो मैंने उसी क्षण तुम्हारे जौहर परख लिए। मुझे मालूम हो गया कि तुम्हारा हृदय बल और विश्वास से भरा हुआ है। उसे काबू में लाना सहज नहीं। तुम नहीं जानती कि यह एक मास मैंने किस तरह काटा है। तड़प-तड़प कर मर रहा हूं पर जिस तरह शिकारी बफरी हुई सिंहनी के सम्मुख जाने से डरता है, वही दशा मेरी थी। मैं कई बार आया। यहां तुमको उदास त्यौरियां चढ़ाएं बैठे देखा। मुझे अंदर पैर रखने का साहस न हुआ, मगर आज मैं बिना बुलाया मेहमान नहीं हूं। तुमने मुझे बुलाया है और तुम्हें अपने मेहमान का स्वागत करना चाहिए। हृदयता से न सही – जहां अग्नि प्रज्ज्वलित हो, वहां ठंडक कहां? – बातों ही से सही, अपने भावों को दबाकर ही सही, मेहमान का स्वागत करो। संसार में शत्रु का आदर मित्रों से भी अधिक किया जाता है।
प्रभा, एक क्षण के लिए क्रोध को शांत करो और मेरे अपराधों पर विचार करो। तुम मेरे ऊपर यही दोषारोपण कर सकती हो कि मैं तुम्हें माता-पिता की गोद से छीन लाया। तुम जानती हो, कृष्णा भगवान रुक्मिणी को हर लाये थे। राजपूतों में यह कोई नयी बात नहीं है। तुम कहोगी, इससे झालावाड़ वालों का अपमान हुआ, पर ऐसा कहना कदापि ठीक नहीं। झालावाड़ वालों ने वही किया, जो मर्दों का धर्म था। उनका पुरुषार्थ देखकर हम चकित रह गये। यदि वे कृतकार्य नहीं हुए तो यह उनका दोष नहीं। वीरों की सदैव जीत नहीं होती। हम इसलिए सफल हुए कि हमारी संख्या अधिक थी और इस काम के लिए तैयार होकर गये थे। वे निश्शंक थे, इस कारण उनकी हार हुई। यदि हम वहाँ से शीघ्र ही प्राण बचाकर भाग न आते तो हमारी गति वही होती जो राव साहब ने कही थी। एक भी चित्तौड़ी न बचता। लेकिन ईश्वर के लिए यह मत सोचो कि मैं अपने अपराध के दूषण को मिटाना चाहता हूं। नहीं, मुझसे अपराध हुआ है और मैं हृदय से उस पर लज्जित हूं। पर अब तो जो कुछ होना था, हो चुका था। इस बिगड़े हुए खेल को मैं तुम्हारे ऊपर छोड़ता हूं। यदि मुझे तुम्हारे हृदय में कोई स्थान मिले तो मैं उसे स्वर्ग समझूंगा। डूबते हुए को तिनके का सहारा भी बहुत है। क्या यह संभव है?’
प्रभा बोली – ‘नहीं।’
राणा – ‘झालावाड़ जाना चाहती हो?’
प्रभा – ‘नहीं।’
राणा – ‘मंदार के राजकुमार के पास भेज दूं?’
प्रभा – ‘कदापि नहीं।’
राणा – ‘लेकिन मुझसे यह तुम्हारा कुढ़ना देखा नहीं जाता।’
प्रभा – ‘आप इस कष्ट से शीघ्र ही मुक्त हो जायेंगे।’
राणा ने भयभीत दृष्टि से देखकर कहा, ‘जैसी तुम्हारी इच्छा, और वे वहां से उठकर चले गये।’
दस बजे रात का समय था। रणछोड़जी के मंदिर में कीर्तन समाप्त हो चुका था वैष्णव साधु बैठे हुए प्रसाद पा रहे थे। मीरा स्वयं अपने हाथों से थाल ला-लाकर उनके आगे रखती थी। साधुओं और अभ्यागतों के आदर-सत्कार में उस देवी को आत्मिक आनन्द प्राप्त होता था। साधुगण जिस प्रेम से भोजन करते थे, उससे यह शंका होती थी कि स्वादपूर्व वस्तुओं में कहीं भक्ति-भजन से भी अधिक सुख तो नहीं है। यह सिद्ध हो चुका है कि ईश्वर की दी हुई वस्तुओं का सदुपयोग ही ईश्वरोपासना की मुख्य रीति है। इसलिए ये महात्मा लोग उपासना के ऐसे अच्छे अवसरों को क्यों खोते, वे कभी पेट पर हाथ फेरते और कभी आसन बदलते थे। मुंह से ‘नहीं’ कहना तो वे घोर पाप के समान समझते थे। यह भी मानी हुई बात है कि जैसी वस्तुओं का हम सेवन करते हैं, वैसी ही आत्मा भी बनती है। इसलिए वे महात्मागण घी और खोये से उदर को खूब भर रहे थे।
पर उन्हीं में एक महात्मा ऐसे भी थे जो आंखें बंद किये ध्यान में मग्न थे। थाल की ओर ताकते भी न थे। इनका नाम प्रेमानंद था। ये आज ही आए थे। इनके चेहरे पर कांति झलकती थी। अन्य साधु खाकर उठ गए परन्तु उन्होंने थाल छुआ भी नहीं।
मीरा ने हाथ जोड़कर कहा – ‘महाराज, आपने प्रसाद को छुआ भी नहीं। दासी से कोई अपराध तो नहीं हुआ।’
साधु – ‘नहीं, इच्छा नहीं थी।’
मीरा – ‘पर मेरी विनय आपको माननी पड़ेगी।’
साधु – ‘मैं तुम्हारी आज्ञा का पालन करूंगा, तो तुमको भी मेरी एक बात माननी होगी।’
मीरा – ‘कहिए क्या आज्ञा है।’
साधु – ‘माननी पड़ेगी।’
मीरा – ‘मानूंगी।’
साधु – ‘वचन देती हो?’
मीरा – ‘वचन देती हूं, आज प्रसाद पायें।’
मीराबाई ने समझा था कि साधु कोई मंदिर बनवाने या कोई यज्ञ पूर्ण करा देने की याचना करेगा। ऐसी बातें नित्य प्रति हुआ ही करती थी और मीरा का सर्वस्व साधु-सेवा के लिए अर्पित था, परन्तु उसके लिए साधु ने ऐसी कोई याचना न की। वह मीरा के कानों के पास मुंह ले लाकर बोला – ‘आज दो घंटे के बाद राज-भवन का चोर दरवाजा खोल देना।’
मीरा विस्मित होकर बोली – ‘आप कौन हैं?’
साधु – ‘मंदार का राजकुमार।’
मीरा ने राजकुमार को सिर से पांव तक देखा। नेत्रों में आदर की जगह घृणा थी। कहा – ‘राजपूत यों छल नहीं करते।’
राजकुमार – ‘यह नियम उस अवस्था के लिए जब दोनों पक्ष समान शक्ति रखते हों।’
मीरा – ‘ऐसा नहीं हो सकता।’
राजकुमार – ‘आपने वचन दिया है, उसका पालन करना होगा।’
मीरा – ‘महाराज की आज्ञा के सामने मेरे वचन का कोई महत्त्व नहीं।’
राजकुमार – ‘मैं यह, कुछ नहीं जानता। यदि आपको अपने वचन की कुछ भी मर्यादा रखनी है तो उसे पूरा कीजिए।’
मीरा – सोचकर, ‘महल में जाकर क्या करोगे?’
राजकुमार – ‘नयी रानी से दो-दो बातें।’
मीरा चिंता में विलीन हो नयी। एक तरफ राणा की कड़ी आज्ञा थी और दूसरी तरफ अपना वचन और उसका पालन करने का परिणाम। कितनी ही पौराणिक घटनाएं उसके सामने आ रही थी। दशरथ ने वचन पालने के लिए अपने प्रिय पुत्र को बनवास दे दिया। मैं वचन दे चुकी हूं? उसे पूरा करना मेरा परम धर्म है, लेकिन पति की आज्ञा को कैसे तोड़ू यदि उनकी आज्ञा के विरुद्ध करती हूं तो लोक और परलोक दोनों बिगड़ते हैं। क्यों न उनसे स्पष्ट कह दूं। क्या वे मेरी यह प्रार्थना स्वीकार न करेंगे? मैंने आज तक उनसे कुछ नहीं मांगा। आज उनसे यह दान मागूंगी। क्या वे मेरे वचन की मर्यादा की रक्षा न करेंगे? उनका हृदय कितना विशाल है! निस्संदेह वे मुझ पर वचन तोड़ने का दोष न लगने देंगे।
इस तरह मन में निश्चय करके वह बोली – ‘कब खोल दूं?’
राजकुमार ने उछलकर कहा – ‘आधी रात को।’
मीरा – ‘मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगी।’
राजकुमार – ‘क्यों?’
मीरा – ‘तुमने मेरे साथ छल किया है। मुझे तुम्हारा विश्वास नहीं है।’
राजकुमार ने लज्जित होकर कहा – ‘अच्छा तो आप वहीं पर खड़ी रहियेगा।’
मीरा – ‘यदि फिर कोई दगा किया तो जान से हाथ धोना पड़ेगा।’
राजकुमार – ‘मैं सब कुछ सहने के लिए तैयार हूं।’
मीरा यहां से राणा की सेवा में पहुंची। वे उसका बहुत आदर करते थे। वे खड़े हो गये। इस समय मीरा का आना एक असाधारण बात थी। उन्होंने पूछा – ‘बाई जी, क्या आज्ञा है?’
मीरा – ‘आपसे भिक्षा मांगने आयी हूं। निराश न कीजिएगा। मैंने आज तक आपसे कोई विनती नहीं की, पर आज एक ब्रह्म-फांस में फंस गयी हूं। इसमें से मुझे आप ही निकाल सकते हैं। मंदार के राजकुमार को तो आप जानते हैं?’
राजा – ‘हां, अच्छी तरह।’
मीरा – ‘आज उसने मुझे बड़ा धोखा दिया। एक वैष्णव महात्मा का रूप धारण कर रणछोड़जी के मंदिर में आया और उसने छल करके मुझसे वचन देने पर बाध्य किया। मेरा साहस नहीं होता कि उसकी कपट विनय आपसे कहूं।’
राणा – ‘प्रभा से मिला देने को तो नहीं कहा?’
मीरा – ‘जी हां उसका अभिप्राय वही है। लेकिन सवाल यह है कि मैं आधी रात को गुप्त द्वार खोल दूं। मैंने उसे बहुत समझाया, बहुत धमकाया, पर वह किसी भांति न माना। निदान विवश होकर जब मैंने कह दिया तब उसने प्रसाद पाया, अब मेरे वचन की लाज आपके हाथ है। आप चाहे उसे पूरा करके मेरा मान रखें, चाहे उसे तोड़कर मेरा मान तोड़ दें। आप मेरे ऊपर जो कृपादृष्टि रखते हैं, उसी के भरोसे मैंने वचन दिया। अब मुझे इस फंदे से उबारना आपका काम है।’
राणा कुछ देर सोचकर बोले – ‘तुमने वचन दिया है, उसका पालन करना मेरा कर्तव्य है। तुम देवी हो तुम्हारे वचन नहीं टल सकता। द्वार खोल दो। लेकिन यह उचित नहीं है कि वह अकेले प्रभा से मुलाकात करे। तुम स्वयं उसके साथ जाना। मेरी खातिर से इतना कष्ट उठाना। मुझे भय है कि वह उसकी जान लेने का इरादा करके न आया हो। ईर्ष्या में मनुष्य अंधा हो जाता है। बाई जी, मैं अपने हृदय की बात तुमसे कहता हूं। मुझे प्रभा को हर लाने का अत्यंत शोक है। मैंने समझा था कि यहां रहते-रहते यह हिल मिल जायेगी, लेकिन वह अनुमान गलत निकला। मुझे यह एक अबला की हत्या का अपराध लग जायेगा। मैंने उससे झालावाड़ जाने के लिए कहा, पर वह राजी न हुई। आज तुम इन दोनों की बातें सुनो। अगर यह मंदार-कुमार के साथ जाने पर राजी हो, तो मैं प्रसन्नतापूर्वक अनुमति दे दूंगा। मुझसे कुढ़ना नहीं देखा जाता। ईश्वर इस सुंदरी का हृदय मेरी ओर फेर देता तो मेरा जीवन सफल हो जाता। किंतु जब यह सुख भाग्य में लिखा ही नहीं है तो क्या वश है। मैंने तुमसे ये बातें कहीं, इसके लिए मुझे क्षमा करना। तुम्हारे पवित्र हृदय में ऐसे विषयों के लिए स्थान कहां?
मीरा ने आकाश की ओर संकोच से देखकर कहा – ‘तो मुझे आज्ञा है? मैं चोर-द्वार खोल दूं?’
