राणा – ‘तुम इस घर की स्वामिनी हो, मुझसे पूछने की जरूरत नहीं।’ मीरा राणा को प्रणाम कर चली गयी।
आधी रात बीत चुकी थी। प्रभा चुपचाप बैठी दीपक की ओर देख रही थी और सोचती थी, इसके घुलने से प्रकाश होता है, यह बत्ती अगर जलती है, तो दूसरों को लाभ पहुंचाती है। मेरे जलने से किसी को क्या लाभ? मैं क्यों घुलुं, मेरे जीने की क्या जरूरत है? उसने फिर खिड़की से सिर निकालकर आकाश की तरफ देखा। काले पट पर उज्ज्वल तारे जगमगा रहे थे। प्रभा ने सोचा, मेरे अंधकारमय भाग्य में ये दीप्तिमान तारे कहां हैं, मेरे लिए जीवन के सुख कहां हैं? क्या रोने के लिए जीऊं, ऐसे जीने से क्या लाभ? ऐसे जीने में उपहास भी तो है, मेरे मन का हाल कौन जानता है? संसार मेरी निंदा करता होगा। झालावाड़ की स्त्रियां मेरी मृत्यु के शुभ समाचार मिलने की प्रतीक्षा कर रही होंगी। मेरी प्रिय माता लज्जा से आंखें न उठ सकती होगी। लेकिन जिस समय मेरे मरने की खबर मिलेगी। गर्व से उनका मस्तक ऊंचा हो जायेगा। यह बेहयाई का जीना है। ऐसे जीने से मरना कहीं उत्तम है।
प्रभा ने तकिये के नीचे से एक चमकती हुई कटार निकाली। उसके हाथ कांप रहे थे। उसके कटार की तरफ आंखें जमायी। हृदय को उसके अभिवादन के लिए आश्वस्त किया। हाथ उठाया, किन्तु हाथ न उठा, आत्मा दृढ़ न थी। आंखें झपक गयी। सिर में चक्कर आ गया। कटार हाथ से छूटकर जमीन पर गिर पड़ी।
प्रभा कुद्ध होकर सोचने लगी – क्या मैं वास्तव में निर्लज्ज हूं? मैं राजपूतनी होकर मरने से डरती हूं? आज मर्यादा खोकर बेहया लोग ही जिया करते है। वह कौन-सी आकांक्षा है जिसने मेरी आत्मा को इतना निर्बल बना रखा है। क्या राणा की मीठी-मीठी बातें? राणा मेरे शत्रु हैं। उन्होंने मुझे पशु समझ रखा है, जिसे फंसाने के पश्चात् हम पिंजरे में बंद करके हिलाते हैं। उन्होंने मेरे मन को अपनी वाक्य मधुरता का पीड़ा-स्थल समझ लिया है। वे इस तरह घुमा-घुमाकर बातें करते हैं और मेरी तरफ से युक्तियां निकालकर उनका ऐसा उत्तर देते हैं कि जुबान ही बंद हो जाती है। हाय! निर्दयी ने मेरा जीवन नष्ट कर दिया और मुझे यों खिलाता है! क्या इसीलिए जीऊं कि उसके कपट भावों का खिलौना बनूं?
फिर वह कौन-सी अभिलाषा है? क्या राजकुमार का प्रेम? उनकी तो अब कल्पना ही मेरे लिए घोर पाप है। मैं अब उस देवता के योग्य नही हूं। प्रियतम! बहुत दिन हुए, मैंने तुम्हें हृदय से निकाल दिया। तुम भी मुझे दिल से निकाल डालो। मृत्यु के सिवाय अब कहीं मेरा ठिकाना नहीं हैं। शंकर! मेरी निर्बल आत्मा को शक्ति प्रदान करो। मुझे कर्त्तव्य-पालन का बल दो।
प्रभा ने फिर कटार निकाली। इच्छा दृढ़ थी। हाथ उठा और निकट था कि कटार उसके शोकातुर हृदय में चुभ जाये कि इतने में किसी के पांव की आहट सुनायी दी। उसने चौंक कर कर सहमी हुई दृष्टि से देखा। मंदार कुमार धीरे-धीरे पैर दबाता हुआ कमरे में दाखिल हुआ।
प्रभा उसे देखते ही चौंक पड़ी। उसने कटार को छिपा लिया। राजकुमार को देखकर उसे आनंद की जगह रोमांचकारी भय उत्पन्न हुआ। यदि किसी को जरा भी संदेह हो गया तो इनका प्राण बचना कठिन है। इनको तुरन्त यहां से निकल जाना चाहिए। यदि इन्हें बातें करने का अक्सर दूं तो विलम्ब होगा और फिर ये अवश्य ही फंस जायेंगे। राणा इन्हें कदापि न छोड़ेंगे। वे विचार वायु और बिजली की व्यग्रता के साथ उसके मस्तिष्क में दौड़े। वह तीव्र स्वर में बोली – ‘भीतर मत आओ।’
राजकुमार ने पूछा – ‘मुझे पहचाना नहीं?’
प्रभा – ‘खूब पहचान लिया, किंतु यह बातें करने का समय नहीं है। राणा तुम्हारी घात में है। अभी यहां से चले जाओ।’
राजकुमार ने एक पग और आगे बढ़ाया और निर्भीकता से कहा – ‘प्रभा, तुम मुझसे निष्ठुरता करती हो।’
प्रभा ने धमकाकर कहा – ‘तुम यहां ठहरोगे तो मैं शोर मचा दूंगी।’
राजकुमार ने उद्दंडता से उत्तर दिया – ‘इसका मुझे भय नहीं। मैं अपनी जान हथेली पर रखकर आया हूं। आज दोनों में से एक का अंत हो जायेगा। या तो राणा रहें या मैं रहूंगा। तुम मेरे साथ चलोगी?’
प्रभा ने दृढ़ता से कहा – ‘नहीं।’
राजकुमार व्यंग्य भाव से बोला – ‘क्या चित्तौड़ की जलवायु पसंद आ गई?’
प्रभा ने राजकुमार की ओर तिरस्कृत नेत्रों से देखकर कहा – ‘संसार में अपनी सब आशाएं पूरी नहीं होती। जिस तरह यहां मैं अपना जीवन काट रही हूं, वह मैं जानती हूं किन्तु लोक-निन्दा भी तो कोई चीज है। संसार की दृष्टि में मैं चित्तौड़ की रानी हो चुकी। अब राणा जिस भांति रखे उसी भांति रहूंगी। मैं अंत समय तक उनसे घृणा करूंगी, जलूंगी, कुढ़ूगीं। जब जलन न सही जायेगी, तो विष लूंगी या छाती में कटार मारकर मर जाऊंगी लेकिन इसी भवन से, इस घर के बाहर कदापि पैर न रखूंगी।’
राजकुमार के मन में संदेह हुआ कि प्रभा पर राणा का वशीकरण मंत्र चल गया। वह मुझसे छल कर रही है। प्रेम की जगह ईर्ष्या पैदा हुई। वह उसी भाव से बोला – ‘और यदि मैं यहां से उठ ले जाऊं!’ प्रभा के तेवर बदल गये। बोली – ‘तो मैं वही करूंगी जो ऐसी अवस्था में क्षत्राणियां किया करती हैं। अपने गले में छुरी मार लूंगी या तुम्हारे गले में।’ राजकुमार एक पग और आगे बढ़कर यह कटु-वाक्य बोला – ‘राणा के साथ तो तुम खुशी से चली आयी। उस समय छुरी कहां गयी थी?’
प्रभा को यह शब्द शर-सा लगा। वह तिलमिलाकर बोली – ‘उस समय इसी छुरी के एक वार से खून की नदी बहने लगती। मैं नहीं चाहती थी कि मेरे कारण मेरे भाई-बंधुओं की जान जाये। इसके सिवाय मैं कुंआरी थी। मुझे अपनी मर्यादा के भंग होने का कोई भय न था। मैंने पतिव्रत नहीं लिया। कम-से-कम संसार मुझे ऐसा समझता था। मैं अपनी दृष्टि में अब भी वहीं हूं। किंतु संसार की दृष्टि में कुछ और हो गयी हूं। लोक-लाल ने मुझे राणा की आज्ञाकारिणी बना दिया है। पतिव्रत की बेड़ी जबरदस्ती मेरे पैरों में डाल दी गयी है। अब इसकी रक्षा करना मेरा धर्म है। इसके विपरीत और कुछ करना छत्राणियों के नाम को कलंकित करना है। तुम मेरे घाव पर व्यर्थ नमक क्यों छिड़कते हो? यह कौन-सी भलमनसी है। मेरे भाग्य में जो कुछ बदा है, वह भोग रही हूं। मुझे भोगने दो और तुमसे विनती करती हूं कि शीघ्र ही यहां से चले जाओ।’
राजकुमार एक पग और बढ़ा कर दुष्ट-भाव से बोला – ‘प्रभा, यहां आ कर तुम त्रियाचरित्र में निपुण हो गयी। तुम मेरे साथ विश्वासघात करके अब धर्म की आड़ ले रही हो। तुमने मेरे प्रणय को पैरों तले कुचल दिया और अब मर्यादा का बहाना ढूंढ रही हो। मैं इन नेत्रों से राणा को तुम्हारे सौंदर्यपुष्प का भ्रमर बनते नहीं देख सकता। मेरी कामनाएं मिट्टी में मिलती हैं तो तुम्हें लेकर जाएंगी। मेरा जीवन नष्ट होता है तो उसके पहले तुम्हारे जीवन का भी अंत होगा। तुम्हारी बेवफाई का यही दंड है। बोलो, क्या निश्चय करती हो? इस समय मेरे साथ चलती हो या नहीं? किले के बाहर मेरे आदमी खड़े हैं।’
प्रभा ने निर्भयता से कहा – ‘नहीं।’
राजकुमार – ‘सोच लो, नहीं तो पछताओगी।’
प्रभा – ‘खूब सोच लिया।’
राजकुमार ने तलवार खींच ली और वह प्रभा की तरफ लपके। प्रभा भय से आंखें बंद किये एक कदम पीछे हट गयी। मालूम होता था, उसे मूर्छा आ जायेगी।
अकस्मात् राणा तलवार लिये वेग के साथ कमरे में दाखिल हुए। राजकुमार संभल कर खड़ा हो गया।
राणा ने सिंह के समान गरजकर कहा – ‘दूर हट। क्षत्रिय स्त्रियों पर हाथ नहीं उठाते।
राजकुमार ने तनकर उत्तर दिया – ‘लज्जाहीन स्त्रियों की यही सजा है।’
राणा ने कहा – ‘तुम्हारा बैरी तो मैं था। मेरे सामने आते क्यों लजाते थे। जरा मैं भी तुम्हारी तलवार की काट देखता।’
राजकुमार ने ऐंठ कर राणा पर तलवार चलायी। शस्त्र-विद्या में राणा अति कुशल थे। वार खाली देकर राजकुमार पर झपटे। इतने में प्रभा, जो मूर्च्छित अवस्था में दीवार से चिपटी खड़ी थी, बिजली की तरह कौंध कर राजकुमार के सामने खड़ी हो गयी। राणा वार कर चुके थे। तलवार का पूरा हाथ उसके कंधे पर पड़ा। रक्त की फुहार छूटने लगी। राणा ने ठंडी सांस ली और उन्होंने, तलवार हाथ से फेंककर गिरती हुई प्रभा को संभाल लिया।
क्षणमात्र में प्रभा का मुखमंडल वर्ण-विहीन हो गया। आंखें बुझ गयी। दीपक ठंडा हो गया। मंदार कुमार ने भी तलवार फेंक दी और वह आंखों में आंसू भर प्रभा के सामने पुट्ठे टेककर बैठ गया। दोनों प्रेमियों की आंखें सजल थी। पतंगे बुझे हुए दीपक पर जान दे रहे थे।
प्रेम के रहस्य निराले हैं। अभी एक क्षण हुआ, राजकुमार प्रभा पर तलवार लेकर झपटा था। प्रभा किसी प्रकार उसके साथ चलने पर उद्यत न होती थी। लज्जा का भय, धर्म की बेड़ी, कर्तव्य की दीवार रास्ता रोके खड़ी थी। परन्तु उसे तलवार के सामने देखकर उसने उस पर अपना प्राण अर्पण कर दिया। प्रीति की प्रथा निबाह दी, लेकिन अपने वचन के अनुसार उसी घर में।
हां, प्रेम के रहस्य निराले हैं। अभी एक क्षण पहले राजकुमार प्रभा पर तलवार लेकर झपटा था। उसके खून का प्यासा था। ईर्ष्या की अग्नि उसके हृदय में दहक रही थी। वह रुधिर की धारा से शांत हो गयी। कुछ देर तक वह अचेत बैठा रहा। फिर उठा और उसने तलवार उठाकर जोर से अपनी छाती में चुभा ली, फिर रक्त की फुहार निकली। दोनों धाराएं मिली और उनमें कोई भेद न रहा।
प्रभा, उसके साथ चलने पर राजी न थी, किंतु वह प्रेम के बंधन को तोड़ न सकी। दोनों उस घर से ही नहीं, संसार से एक साथ सिधारे।
