Mantra - 2 - by Munshi Premchand
Mantra - 2 - by Munshi Premchand

‘उसके पहले के पैसे तो दिये ही नहीं, और उधार कैसे देगा?’

‘न देगा, न सही। घास तो कहीं नहीं गई है। दोपहर तक क्या दो आने की भी न काटूंगा?’

इतने में एक आदमी ने द्वार पर आवाज दी – ‘भगत, भगत, क्या सो गए? जरा किवाड़ खोलो।’

भगत ने उठकर किवाड़ खोल दिए। एक आदमी ने आकर कहा – ‘कुछ सुना, डॉक्टर चड्ढा बाबू के लड़के को सांप ने काट लिया।’

भगत ने चौंक कर कहा – ‘चड्ढा बाबू के लड़के को! वही चड्ढा बाबू है न, जो छावनी में बंगले में रहते हैं?’

‘हां-हां वही। शहर में हल्ला मचा हुआ है। जाते हो तो जाओ, आदमी बन जाओगे?’ बूढ़े ने कठोर भाव से सिर हिलाकर कहा – ‘मैं नहीं जाता! मेरी बला जाय! वही चड्ढा है। खूब जानता हूं। भैया को लेकर उन्हीं के पास गया था। खेलने जा रहे थे। पैरों पर गिर पड़ा कि एक बार देख लीजिए, मगर सीधे मुंह से बात तक न की। भगवान बैठे सुन रहे थे। अब जान पड़ेगा कि बेटे का गम कैसा होता है। कई लड़के हैं?

‘नहीं जी, यही तो एक लड़का था। सुना है, सबने जवाब दे दिया है’

‘भगवान बड़ा कारसाज है। उस वक्त मेरी आंखों से आंसू निकल पड़े थे, पर उन्हें तनिक भी दया न आयी थी। मैं तो उनके द्वार पर होता, तो भी बात न पूछता।’

‘तो न जाओगे? हमने जो सुना था, सो कह दिया।’

‘अच्छा किया – अच्छा किया। कलेजा ठंडा हो गया, आंखें ठंडी हो गई।’

‘लड़का भी ठंडा हो गया होगा! तुम जाओ। आज चैन की नींद सोऊंगा।’ (बुढ़िया से) जरा तमाकू ले ले! एक चिलम और पीऊंगा। अब मालूम होगा लाला को! सारी साहबी निकल जायेगी, हमारा क्या बिगाड़ा? लड़के के मर जाने से कुछ राज जो नहीं चला गया? जहां छह चले गए थे, वहां एक और चला गया, तुम्हारा तो राज सूना हो जायेगा। उसी के वास्ते सबका गला दबा-दबाकर जोड़ा था न! अब क्या करोगे? एक बार देखने जाऊंगा, पर कुछ दिन बाद मिज़ाज का हाल पूछूंगा।

आदमी चला गया। भगत ने किवाड़ बंद कर लिए, तब चिलम पर तमाकू रखकर पीने लगा।

बुढ़िया ने कहा – ‘इतनी रात गए जाड़े-पाले में कौन जायेगा?’

‘अरे, दोपहर ही होता, तो मैं न जाता। सवारी दरवाजे पर लेने आती, तो भी न जाता। भूल नहीं गया हूं। मुन्ना की सूरत आज भी आंखों में फिर रही है। इस निर्दयी ने उसे एक नजर देखा तक नहीं। क्या मैं न जानता था कि वह न बचेगा? जानता था? चड्ढा भगवान नहीं थे कि उनके एक निगाह देख लेने से अमृत बरस जाता। नहीं, खाली मन की दौड़ थी। जरा तसल्ली हो जाती। बस, इसलिए उनके पास दौड़ा गया था। अब किसी दिन जाऊंगा और कहूंगा – ‘क्यों साहब, कहिए, क्या रंग है दुनिया बुरा कहेगी कोई परवाह नहीं। छोटे आदमियों में तो सब ऐब होते हैं। बड़ों में कोई ऐब नहीं होता। देवता होते हैं।’

भगत के लिए जीवन में यह पहला अवसर था कि ऐसा समाचार पाकर वह बैठा रह गया हो। 80 वर्ष के जीवन में ऐसा कभी न हुआ था कि सांप की खबर पाकर वह दौड़ा न गया हो। माघ-पूस की अंधेरी रात, चैत-बैसाख की धूप और लू सावन-भादों की चढ़ी हुई नदी और नाले, किसी की उसने कभी परवाह न की। वह तुरन्त घर से निकल पड़ता था। निःस्वार्थ, निष्काम। लेने-देने का विचार कभी दिल में आया ही नहीं। यह ऐसा काम ही न था। जान का मूल्य कौन दे सकता है? यह एक पुण्य कार्य था। सैकड़ों निराशों को उसके मंत्रों ने जीवनदान दे दिया था, पर वह आज घर से कदम नहीं निकाल सका। यह खबर सुनकर सोने जा रहा है।

बुढ़िया ने कहा – ‘तमाकू अंगीठी के पास रखी हुई है। उसके भी आज ढाई पैसे हो गए। देती ही न थी।’

बुढ़िया यह कहकर लेटी। बूढ़े ने कुप्पी बुझायी, कुछ देर खड़ा रहा। फिर बैठ गया। अंत को लेट गया, पर यह खबर उसके हृदय पर बोझ की भांति रखी हुई थी। उसे मालूम हो रहा था, उसकी कोई चीज खो गई है, जैसे सारे कपड़े गीले हो गए हैं या पैरों में कीचड़ लगा हुआ है, जैसे कोई उसके मन में बैठा हुआ उसे घर से निकलने के लिए कुरेद रहा है। बुढ़िया जरा देर में खर्राटे लेने लगी। बूढ़े बातें करते-करते सोते हैं और जरा-सा खटका होते ही जागते हैं। तब भगत उठा, अपनी लकड़ी उठा ली और धीरे से किवाड़ खोले।

बुढ़िया ने पूछ – ‘कहां जाते हो?’

‘कहीं नहीं, देखता था कि कितनी रात है।’

‘अभी बहुत रात है, सो जाओ।’

‘नींद नहीं आती।’

‘नींद काहे को आवेगी? मन तो चड्ढा के घर पर लगा हुआ है।’

‘चड्ढा ने मेरे साथ कौन-सी नेकी कर दी है, जो वहां जाऊं? वह आकर पैरों पड़े, तो भी न जाऊं।’

‘उठे तो तुम इसी इरादे से हो?’

‘नहीं री, ऐसा पागल नहीं हूं कि जो मुझे कांटे बोए, उसके लिए फूल बोता फिरूं।’ बुढ़िया फिर सो गई। भगत ने किवाड़ लगा दिए और फिर आकर बैठा। पर उसके मन की कुछ ऐसी दशा थी, जो बाजे की आवाज कान में पड़ते ही उपदेश सुनने वालों की होती है। आंखें चाहे उपदेशक की ओर हो, पर कान बाजे ही की ओर होते हैं। दिल में भी बाजे की ध्वनि गूंजती रहती है। शर्म के मारे जगह से नहीं उठता। निर्दयी प्रतिघात का भाव जगत के लिए उपदेशक था, पर हृदय उस अभागे युवक की ओर था, जो इस समय मर रहा था, जिसके लिए एक एक पल का विलम्ब घातक था।

उसने फिर किवाड़ खोले, इतने धीरे से कि बुढ़िया को खबर भी न हुई। बाहर निकल आया। उसी वक्त गांव का चौकीदार गश्त लगा रहा था, बोला – ‘कैसे उठे भगत? आज तो बड़ी सरदी है! कहीं जा रहो हो क्या?’ भगत ने कहा – ‘नहीं जी, जाऊंगा कहां? देखता था, अभी कितनी रात है। भला, कै बजे होंगे?’

चौकीदार बोला – ‘एक बजा होगा, और क्या! अभी थाने से आ रहा था, तो डॉक्टर चड्ढा के बंगले पर बड़ी भीड़ लगी हुई उनके लड़के का हाल तो तुमने सुना होगा, कीड़े ने छू लिया है। चाहे मर भी गया हो। तुम चले जाओ, तो शायद बच जाये। सुना है, दस हजार देने को तैयार हैं।’

भगत – ‘मैं तो न जाऊं, चाहे वह दस लाख भी दें। मुझे दस हजार या दस लाख लेकर करना क्या है? कल मर जाऊंगा, फिर कौन भोगने वाला बैठा हुआ है?’

चौकीदार चला गया। भगत ने आगे पैर बढ़ाया। जैसे नशे में आदमी की देह अपने काबू में नहीं रहती, पैर कहीं रखता है, पड़ता कहीं है, कहता कुछ है, जबान से निकलता कुछ है, वही हाल इस समय भगत का था। मन में प्रतिकार था, पर कर्म मन के अधीन न था। जिसने कभी तलवार नहीं चलाई, वह इरादा करने पर भी तलवार नहीं चला सकता। उसके हाथ कंपते हैं, उठते ही नहीं।

भगत लाठी-खट-खट करता लपका चला जाता था। चेतना रोकती थी, पर उपचेतना ठेलती थी। सेवक स्वामी पर हावी था।

आधी राह निकल जाने के बाद सहसा भगत रुक गया। हिंसा ने क्रिया पर विजय पायी मैं यों ही इतनी दूर चला आया। इस जाड़े-पाले में मरने की मुझे क्या पड़ी थी? आराम से सोया क्यों नहीं? नींद न आती, न सही, दो-चार भजन ही गाता। व्यर्थ इतनी दूर दौड़ा आया। चड्ढा का लड़का रहे या मरे, मेरी बला से। मेरे साथ उन्होंने ऐसा कौन-सा सलूक किया था कि मैं उनके लिए मरूं? दुनिया में हजारों मरते हैं, हजारों जीते हैं। मुझे किसी के मरने-जीने से क्या मतलब।

मगर उपचेतना ने अब एक दूसरा रूप धारण किया, जो हिंसा से बहुत कुछ मिलता-जुलता था – वह झाड़-फूंक करने नहीं जा रहा है, वह देखेगा कि लोग क्या कर रहे हैं। डॉक्टर साहब का रोना-पीटना देखेगा कि किस तरह सिर पीटते हैं, किस तरह पछाड़े खाते हैं। यह देखेगा, बड़े लोग भी छोटों ही की भांति रोते रहते हैं, या सब्र कर जाते हैं। ये लोग तो विद्वान होते हैं, सब्र कर जाते होंगे! हिंसा- भाव को यों धीरज देता हुआ वह फिर आगे बढ़ा।

इतने में दो आदमी आते दिखाई दिए। दोनों बातें करते चले आ रहे थे। चड्ढा बाबू का घर उजड़ गया, वही तो एक लड़का था। भगत के कान में यह आवाज पड़ी। उसकी चाल और और भी तेज हो गई। थकान के मारे पांव न उठते थे। सिरोभाग इतना बढ़ा जाता था, मानो अब मुंह के बल गिर पड़ेगा। इस तरह वह कोई 10 मिनट चला होगा कि डॉक्टर साहब का बंगला नजर आया। बिजली की बत्तियां जल ली थी, मगर सन्नाटा छाया हुआ था। रोने-पीटने की आवाज भी न आती थी। भगत का कलेजा धक-धक करने लगा। कहीं मुझे बहुत देर तो नहीं हो गई? वह दौड़ने लगा। अपनी उम्र में वह इतना तेज कभी न दौड़ा था। बस, यही मालूम होता था, मानों उसके पीछे मौत दौड़ी आ रही है।

दो बज गए थे। मेहमान विदा हो गए। रोने वालों में केवल आकाश के तारे रह गए थे। और सभी रो-रोकर थक गए थे। बड़ी उत्सुकता के साथ लोग रह-रहकर आकाश की ओर देखते थे कि किसी तरह सुबह हो और लाश गंगा की गोद में दी जाये।

सहसा भगत ने द्वार पर पहुंचकर आवाज दी। डॉक्टर साहब समझे, कोई मरीज आया होगा। किसी और दिन उन्होंने उस आदमी को दुत्कार दिया होता, मगर आज बाहर निकल आए। देखा, एक बूढ़ा आदमी खड़ा है – कमर झुकी हुई, पोपला मुंह, भौहें तक सफेद हो गई थी। लड़की के सहारे कांप रहा था। बड़ी नम्रता से बोले – ‘क्या है भई, आज तो हमारे ऊपर ऐसी मुसीबत पड़ गई है कि कुछ कहते नहीं बनता, फिर कभी आना। इधर एक महीना तक तो शायद मैं किसी मरीज को न देख सकूंगा।’

भगत ने कहा, ‘सुन चुका हूं बाबूजी, इसीलिए आया हूं। भैया कहां हैं? जरा मुझे दिखा दीजिए। भगवान् बड़ा कारसाज है, मुरदे को भी जिला सकता है। कौन जाने, अब भी उसे दया आ जाये।’

चड्ढा ने व्यथित स्वर से कहा – ‘चलो, देख लो, मगर तीन-चार घंटे हो गए। जो कुछ होना था, हो चुका। बहुतेरे झाड़ने-फूंकने वाले देख-देखकर चले गए।’

डॉक्टर साहब को आशा तो क्या होती। हां, बूढ़े पर दया आ गई। अंदर ले गए, भगत ने लाश को एक मिनट तक देखा। तब मुस्कराकर बोला – ‘अभी कुछ नहीं बिगड़ा है, बाबूजी! वह नारायण चाहेंगे, तो आधा घंटे में भैया उठ बैठेंगे। आप नाहक दिल छोटा कर रहे हैं। जरा कहारों से कहिए, पानी तो भरें।’

कहारों ने पानी भर-भरकर कैलाश को नहलाना शुरू किया। पाइप बन्द हो गया था। कहारों की संख्या अधिक न थी, इसलिए मेहमानों ने अहाते के बाहर से कुंए से पानी भर-भरकर कहारों को दिया। मृणालिनी कलश लिये पानी ला रही थी। बूढ़ा भगत खड़ा मुस्करा-मुस्कराकर मंत्र पढ़ रहा था, मानो विजय उसके सामने खड़ी है। जब एक बार मंत्र समाप्त हो जाता, तब वह एक जड़ी कैलाश को सुंघा देता। इस तरह न-जाने कितने घड़े पानी कैलाश के सिर पर डाले गए और न-जाने कितनी बार भगत ने मंत्र पढ़ा। आखिर जब उषा ने अपनी आंखें खोली तो कैलाश की भी लाल-लाल आंखें खुल गई। एक क्षण में उसने अंगड़ाई ली और पानी पीने को मांगा। डॉक्टर चड्ढा ने दौड़कर नारायणी को गले लगा लिया। नारायणी भगत के पैरों पर गिर पड़ी और मृणालिनी कैलाश के सामने आंखों में आंसू-भरे पूछने लगी – अब कैसी तबियत है?

एक क्षण में चारों तरफ खबर फैल गई। मित्रगण मुबारक देने आने लगे। डॉक्टर साहब बड़े श्रद्धा-भाव से हर एक के सामने भगत का यश गाते फिरते थे। सभी लोग भगत के दर्शनों के लिए उत्सुक हो उठे, मगर अन्दर जाकर देखा, तो भगत का कहीं पता न था। नौकरों ने कहा – ‘अभी तो यहीं बैठे चिलम पी रहे थे। हम लोग तमाकू देने लगे, तो नहीं ली, अपने पास से तमाकू निकाल कर भरी।’

अब तो भगत की चारों ओर तलाश होने लगी, और भगत लपका हुआ घर चला जा रहा था कि बुढ़िया के उठने से पहले पहुंच जाऊं!

नारायणी – ‘मैंने तो सोचा था, इसे बड़ी रकम दूंगी।’

चड्ढा – ‘रात को मैंने नहीं पहचाना, पर जरा साफ हो जाने पर पहचान गया। एक बार यह एक मरीज को लेकर आया था। मुझे अब याद आता है कि मैं खेलने जा रहा था और मरीज को देखने से साफ इंकार कर दिया था। आज उस दिन की बात याद करके मुझे कितनी ग्लानि हो रही है, उसे प्रकट नहीं कर सकता। मैं उसे खोज निकालूंगा और उसके पैरों पर गिरकर अपना अपराध क्षमा कराऊंगा। वह कुछ लेगा नहीं, यह जानता हूं उसका जन्म यश की वर्षा करने ही के लिए हुआ है। उसकी सज्जनता ने मुझे ऐसा आदर्श दिखा दिया है, जो अब से जीवन-पर्यन्त मेरे सामने रहेगा।’