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गोदान - मुंशी प्रेमचंद - Hindi novel Godan by Premchand | Grehlakshmi
godan by munshi premchand

प्रात: काल होरी के घर में एक पूरा हंगामा हो गया । होरी धनिया को मार रहा था । धनिया उसे गालियाँ दे रही थी । दोनों लड़कियाँ बाप के पाँवों से लिपटी चिल्ला रही थी और गोबर माँ को बचा रहा था । बार-बार होरी का हाथ पकड़कर पीछे ढकेल देता; पर ज्योंही धनिया के मुँह से कोई गाली निकल जाती, होरी अपने हाथ छुड़ाकर उसे दो-चार घूंसे और लात जमा देता । उसका बूढ़ा क्रोध जैसे किसी गुप्त संचित शक्ति को निकाल लाया हो । सारे गाँव में हलचल पड़ गयी । लोग समझाने के बहाने तमाशा देखने जा पहुँचे । सोभा लाठी टेकता आ खड़ा हुआ । दातादीन ने डाँटा-यह क्या है होरी, तुम बावले हो गये हो क्या? कोई इस तरह घर की लक्ष्मी पर हाथ छोड़ता है! तुम्हें तो यह रोग न था । क्या हीरा की छूत तुम्हें भी लग गयी?
होरी ने पालागन करके कहा-महाराज, तुम इस बखत न बोलो । मैं आज इराकी बान छुड़ाकर तब दम लूँगा । मैं जितना ही तरह देता हूँ, उतना ही यह सिर चढ़ती जाती है ।
धनिया सजल क्रोध में बोली-महाराज तुम गवाह रहना । मैं आज इसे और इसके हत्यारे भाई को जेहल भेजवाकर तब पानी पिऊँगी । इसके भाई ने गाय को माहुर खिलाकर मार डाला । अब जो मैं थाने में रपट लिखाने जा रही हूँ तो यह हत्यारा मुझे मारता है । इसके पीछे अपनी जिन्दगी चौपट कर दी, उसका यह इनाम दे रहा है ।
होरी ने दाँत पीसकर और आँखें निकालकर कहा-फिर वही बात मुँह से निकली । तूने देखा था हीरा को माहुर खिलाते?
‘तू कसम खा जा कि तूने हीरा को गाय की नाँद के पास खड़े नहीं देखा?’
‘हां, मैंने नहीं देखा, कसम खाता हूँ ।’
‘बेटे के माथे पर हाथ रख के कसम खा!’
होरी ने गोबर के माथे पर काँपता हुआ हाथ रखकर काँपते हुए स्वर में कहा-मैं बेटे की कसम खाता हूँ कि मैंने हीरा को नाँद के पास नहीं देखा ।
धनिया ने जमीन पर थूक कर कहा-थुड़ी है तेरी झुठाई पर । तूने खुद मुझसे कहा कि हीरा चोरों की तरह नींद के पास खड़ा था । और अब भाई के पक्ष में झूठ बोलता है । जुड़ी है! अगर मेरे बेटे का बाल भी बाँका हुआ, तो घर में आग लगा दूंगी । सारी गृहस्ती में आग लगा दूँगी । भगवान! आदमी मुँह से बात कहकर इतनी बेसरमी से मुकुर जाता है ।
होरी पाँव पटककर बोला-धनिया, गुस्सा मत दिखा, नहीं बुरा होगा ।
‘मार तो रहा है, और मार ले । जा, तू अपने बाप का बेटा होगा तो आज मुझे मारकर तब पानी पियेगा । पापी ने मारते-मारते मेरा भुरकस निकाल लिया, फिर भी इसका जी नहीं भरा । मुझे मारकर समझता है, मैं बड़ा वीर हूँ । भाइयों के सामने भीगी बिल्ली बन जाता है, पापी कहीं का, हत्यारा ।’
फिर वह बैन कढ़ाकर रोने लगी-इस घर में आकर उसने क्या नहीं झेला किस-किस तरह पेट-तन नहीं काटा, किस तरह एक-एक लत्ते को तरसी । किस तरह एक-एक पैसा प्राणों की तरह संचा, किस तरह घर-भर को खिलाकर आप पानी पीकर सो रही । और आज उन सारे बलिदानों का यह पुरस्कार! भगवान् बैठे यह अन्याय देख रहे हैं और उसकी रक्षा को नहीं दौड़ते । गज की और द्रौपदी की रक्षा करने बैकुण्ठ से दौड़े थे । आज क्यों नींद में सोये हुए हैं ।
जनमत धीरे-धीरे धनिया की ओर आने लगा । इसमें अब किसी को सन्देह नहीं रहा कि हीरा ने ही गाय को जहर दिया । होरी ने बिलकुल झूठी कसम खाई, इसका भी लोगों को विश्वास हो गया । गोबर को भी बाप की इस झूठी कसम और उसके फलस्वरूप आने वाली विपत्ति की शंका ने होरी के विरुद्ध कर दिया । उस पर जो दातादीन ने डाँट बतायी, तो होरी परास्त हो गया । चुपके से बाहर चला गया, सत्य ने विजय पायी ।
दातादीन ने सोभा से पूछा तुम कुछ जानते हो सोभा, क्या बात हुई?
सोभा जमीन पर लेटा हुआ बोला-मैं तो महाराज, आठ दिन से बाहर नहीं निकला । होरी दादा कभी-कभी जाकर कुछ दे आते हैं, उसी से काम चलता है । रात भी वह मेरे पास गये थे । किसने क्या किया, मैं कुछ नहीं जानता । ही, कल साँझ को हीरा मेरे घर खुरपी माँगने गया था । कहता था, एक जड़ी खोदना है । फिर तब से मेरी उससे भेंट नहीं हुई ।
धनिया इतनी शह पाकर बोली-पण्डित दादा, यह उसी का काम है । सामा के घर से खुरपी माँगकर लाया और कोई जड़ी खोदकर गाय को खिला दी । उस रात को जो झगड़ा हुआ था, उसी दिन से वह खार खाये बैठा था ।
दातादीन बोले यह बात साबित हो गयी, तो उसे हत्या लगेगी । पुलिस कुछ करे या न करे, धरम तो बिना दण्ड दिये न रहेगा । चली तो जा रुपिया, हीरा को बुला ला । कहना, पण्डित दादा बुला रहे हैं । अगर उसने हत्या नहीं की है, तो गंगाजली उठा ले और चौरे पर चढ़कर कसम खाये ।
धनिया बोली-महाराज, उसके कसम का भरोसा नहीं, चटपट खा लेगा । जब इसने झूठी कसम खा ली, जो बड़ा धर्मात्मा बनता है, तो हीरा का क्या विश्वास । अब गोबर बोला-खा ले झूठी कसम। बना का अन्त हो जाये । बूढ़े जीते रहें । जवान जी कर क्या करेंगे ।
रूपा एक क्षण में आकर बोली-काका घर में नहीं हैं, पण्डित दादा! काकी कहती है, कहीं चले गये हैं ।
दातादीन ने लम्बी दाढ़ी फटकारकर कहा-तूने पूछा नहीं, कही चले गये हैं? घर में छिपा बैठा न हो । देख तो सोना, भीतर तो नहीं बैठा है।
धनिया ने टोका-उसे मत भेजो दादा! हीरा के सिर हत्या सवार है, न जाने क्या कर बैठे ।
दातादीन ने खुद लकड़ी सँभाली और ख़बर लाये कि हीरा सचमुच कहीं चला गया है। पुनिया कहती है, लुटिया-डोर और डण्डा सब लेकर गये हैं । पुनिया ने पूछा भी, कहीं जाते हो; पर बताया नहीं। उसने पाँच रुपये आले में रखे थे । रुपये वहाँ नहीं हैं । साइत रुपये भी लेता गया ।
धनिया शीतल हृदय से बोली-मुँह में कालिख लगाकर कहीं भागा होगा ।
सोभा बोला-भाग के कहाँ जायेगा । गंगा नहाने न चला गया हो ।
धनिया ने शंका की-गंगा जाता तो रुपये क्यों ले जाता, और आजकल कोई परब भी तो नहीं है?
इस शंका का कोई समाधान न मिला । धारणा दृढ़ हो गयी ।
आज होरी के घर भोजन नहीं पका । न किसी ने बैलों को सानी-पानी दिया । सारे गाँव में सनसनी फैली हुई थी । दो-दो चार-चार आदमी जगह-जगह जमा होकर इसी विषय की आलोचना कर रहे थे । हीरा अवश्य कहीं भाग गया । देखा होगा कि भेद खुल गया, अब जेहल जाना पड़ेगा, हत्या अलग लगेगी । बस, कहीं भाग गया । पुनिया अलग रो रही थी, कुछ कहा न सुना, न जाने कहाँ चल दिये ।
जो कुछ कसर रह गयी थी वह संध्या-समय हलके के थानेदार ने आकर पूरी कर दी । गांव के चौकीदार ने इस घटना की रपट की, जैसा उसका कर्तव्य था और थानेदार साहब भला अपने कर्तव्य से कब चूकने वाले थे? अब गाँव वालों को भी उनकी सेवा-सत्कार करके अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए । दातादीन, झिंगुरीसिंह, नोखेराम, उनके चारों प्यादे, मँगरू साह और लाला पटेश्वरी, सभी आ पहुँचे और दारोगाजी के सामने हाथ बाँधकर खड़े हो गये । होरी की तलबी हुई । जीवन में यह पहला अवसर था कि वह दारोगा के सामने आया । ऐसा डर रहा था, जैसे फाँसी हो जायेगी । धनिया को पीटते समय उसका एक-एक अंग फड़क रहा था । दारोगा के सामने कछुए की भाँति भीतर सिमटा जाता था । दारोगा ने उसे आलोचक नेत्रों से देखा और उसके हृदय तक पहुँच गये । आदमियों की नस पहचानने का उन्हें अच्छा अभ्यास था । किताबी मनोविज्ञान में कोरे, पर व्यावहारिक मनोविज्ञान के मर्मज्ञ थे । यकीन हो गया, आज अच्छे का मुँह देखकर उठे हैं । और होरी का चेहरा कहे देता था, इसे केवल एक घुड़की काफी है ।

दारोगा ने पूछा तुझे किसका शुबहा है?
होरी ने जमीन छुई और हाथ बाँधकर बोला-मेरा सुबहा किसी पर नहीं है सरकार, गाय अपनी मौत से मरी है । बुड्ढी हो गयी थी ।
धनिया भी आकर पीछे खड़ी थी । तुरन्त बोली-गाय मारी है तुम्हारे भाई हीरा ने । सरकार ऐसे बौड़म नहीं हैं कि जो कुछ तुम कह दोगे, वह मान लेंगे । यही जाँच-तहकीकात करने आये हैं ।
दारोगाजी ने पूछा-यह कौन औरत है?
कई आदमियों ने दारोगाजी से कुछ बातचीत करने का सौभाग्य प्राप्त करने के लिए चढ़ा-ऊपरी की । एक साथ बोले और अपने मन को इस कल्पना से संतोष दिया कि पहले मैं बोला-होरी की घरवाली है सरकार!
‘तो इसे बुलाओ, मैं पहले इसी का बयान लिखूँगा । वह कहाँ है हीरा?’
विशिष्ट जनों ने एक स्वर से कहा-वह तो आज सबेरे से कहीं चला गया है सरकार!
‘मैं उसके घर की तलाशी लूँगा ।’
तलाशी! होरी की साँस तले-ऊपर होने लगी । उसके भाई हीरा के घर की तलाशी होगी और हीरा घर में नहीं है । और फिर होरी के जीते-जी, उसके देखते यह तलाशी न होने पायेगी; और धनिया से अब उसका कोई सम्बन्ध नहीं । जहाँ चाहे जाये । जब वह उसकी इज्जत बिगाड़ने पर आ गयी है, तो उसके घर में कैसे रह सकती है । जब गली-गली ठोकर खायेगी, तब पता चलेगा ।
गांव के विशिष्ट जनों ने इस महान संकट को टालने के लिए कानाफूसी शुरू की ।
दातादीन ने गंजा रियर हिलाकर कहा-यह सब कमाने के ढंग हैं । पूछो, हीरा के घर में क्या रखा है ।
पटेश्वरीलाल बहुत लम्बे थे; पर लम्बे होकर भी बेवकूफ न थे । अपना लम्बा काला मुँह और लम्बा करके बोले-और यहाँ आया है किस लिए, और जब आया है बिना कुछ लिये-दिये गया कब है?
झिंगुरीसिंह ने होरी को बुलाकर कान में कहा-निकालो जो कुछ देना हो । यों गला न छूटेगा ।
दारोगाजी ने अब ज़रा गरजकर कहा-मैं हीरा के घर की तलाशी लूँगा ।
होरी के मुख का रंग ऐसा उड़ गया था, जैसे देह का सारा रक्त सुख गया हो । तलाशी उसके घर हुई तो, उसके भाई के धर हुई तो, एक ही बात है । हीरा अलग सही; पर दुनिया तो जानती है, वह उसका भाई है; मगर इस वक़्त उसका कुछ बस नहीं । उसके पास रुपये होते, तो इसी वक़्त पचास रुपये लाकर दारोगाजी के चरणों पर रख देता और कहता-पररकार, मेरी इज्जत अब आपके हाथ है । मगर उसके पास तो जहर खाने को भी एक पैसा नहीं । धनिया के पास चाहे दो-चार रुपये पड़े हों; पर वह चुड़ैल भला क्यों देने लगी । मृत्युदण्ड पाये हुए आदमी की भाँति सिर झुकाये, अपने अपमान की वेदना का तीव्र अनुभव करता हुआ चुपचाप खड़ा रहा ।
दातादीन ने होरी को सचेत किया-अब इस तरह खड़े रहने से काम न चलेगा होरी, रुपये की कोई जुगत करो ।

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होरी दीन स्वर में बोला-अब मैं क्या अरज करूँ महाराज! अभी तो पहले ही की गठरी सिर पर लदी है, और किस मुँह से मांगू; लेकिन इस संकट से उबार लो । जीता रहा, तो कौड़ी-कौड़ी चुका दूँगा । मैं मर भी जाऊँ तो गोबर तो है ही ।
नेताओं में सलाह होने लगी । दारोगाजी को क्या भेंट किया जाये । दातादीन ने पचास का प्रस्ताव किया । झिंगुरीसिंह के अनुमान में सौ से कम पर सौदा न होगा । नोखेराम भी सौ के पक्ष में थे । और होरी के लिए सौ और पचास में कोई अन्तर न था । इस तलाशी का संकट उसके सिर से टल जाये । पूजा चाहे कितनी ही चढ़ानी पड़े । मरे को मन-भर लकड़ी से जलाओ, या दस मन से; उसे क्या चिन्ता! मगर पटेश्वरी से यह अन्याय न देखा गया । कोई डाका या कतल तो हुआ नहीं । केवल तलाशी हो रही है । इसके लिये बीस रुपये बहुत हैं ।
नेताओं ने धिक्कारा- तो फिर दारोगाजी से बातचीत करना । हम लोग नगीच न जायेंगे । कौन घुड़कियों खाय ।
होरी ने पटेश्वरी के पाँव पर अपना सिर रख दिया-भैया, मेरा उद्धार करो । जब तक जिऊँगा, तुम्हारी ताबेदारी करूँगा ।
दारोगाजी ने फिर अपने विशाल वक्ष और विशालतर उदर की पूरी शक्ति से कहा-कहाँ है हीरा का घर? मैं उसके घर की तलाशी लूँगा ।
पटेश्वरी ने आगे बढ़कर दारोगाजी के कान में कहा-तलाशी लेकर क्या करोगे हुजूर, उसका भाई आपकी ताबेदारी के लिए हाजिर है ।
दोनों आदमी ज़रा अलग जाकर बातें करने लगे ।
‘कैसा आदमी है?’
‘बहुत ही गरीब हुजूर! भोजन का ठिकाना भी नहीं!’
‘सच?’
‘हाँ हुजूर, ईमान से कहता हूँ ।’
‘अरे तो क्या एक पचासे का डौल भी नहीं है?’
‘कहीं की बात हुजूर! दस मिल जायँ, तो हजार समझिए । पचास तो पचास जनम में भी मुमकिन नहीं और वह भी जब कोई महाजन खड़ा हो जायगा ।’
दारोगाजी ने एक मिनट तक विचार करके कहा-तो फिर उसे सताने से क्या फायदा । मैं ऐसों को नहीं सताता, जो आप ही मर रहे हों ।

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Godan Novel

पटेश्वरी ने देखा, निशाना और आगे जा पड़ा । बोले-नहीं हुजूर, ऐसा न कीजिए, नहीं फिर हम कहीं जायेंगे । हमारे पास दूसरी और कौन-सी खेती है? ‘तुम इलाके के पटवारी हो जी, कैसी बातें करते हो?,
‘जब ऐसा ही कोई अवसर आ जाता है, तो आपकी बदौलत हम भी कुछ पा जाते हैं नहीं पटवारी को कौन पूछता है ।’
‘अच्छा जाओ, तीस रुपये दिलवा दो; बीस रुपये हमारे, दस रुपये तुम्हारे ।’
‘चार मुखिया हैं, इसका ख्याल कीजिए ।’
‘अच्छा आधेआध पर रखो, जल्दी करो । मुझे देर हो रही है ।’
पटेश्वरी ने झिंगुरी से कहा, झिंगुरी ने होरी को इशारे से बुलाया, अपने घर ले गए, तीस रुपये गिनकर उनके हवाले किए और एहसान से दबाते हुए बोले आज ही कागद लिखा लेना । तुम्हारा मुँह देखकर रुपये दे रहा हूँ, तुम्हारी भलमंसी पर । होरी ने रुपये लिए और अंगोछे के कोर में बाँधे प्रसन्नचित्त आकर दारोगाजी की ओर चला ।
सहसा धनिया झपटकर आगे आयी और अँगोछी एक झटके के साथ उसके हाथ से छीन ली । गांठ पक्की न थी । झटका पाते ही खुल गयी और सारे रुपये जमीन पर बिखर गये । नागिन की तरह फुँफकारकर बोली-ये रुपये कहीं लिए जा रहा है, बता । भला चाहता है तो सब रुपये लौटा दे, नहीं कहे देती हूँ । घर के परानी रात-दिन मरें और दाने-दाने को तरसें, लत्ता भी पहनने को मयस्सर न हो और अँजुली-भर रुपये लेकर चला है इज्जत बचाने! ऐसी बड़ी है तेरी इज्जत! जिसके घर में चूहे लोटे, वह भी इज्जतवाला है! दारोगा तलासी ही तो लेगा । ले-ले जहाँ चाहे तलासी । एक तो सौ रुपये की गाय गयी, उस पर यह पलेथन! वाह री तेरी इज्जत!
होरी खून का घूँट पीकर रह गया । सारा समूह जैसे थर्रा उठा । नेताओं के सिर झुक गए । दारोगा का मुँह ज़रा-सा निकल आया । अपने जीवन में उसे ऐसी लताड़ न मिली थी ।
होरी स्तम्भित-सा खड़ा । जीवन में आज पहली बार धनिया ने उसे भरे अखाड़े में पटकनी दी, आकाश तका दिया । अब वह कैसे सिर उठाए!
मगर दारोगाजी इतना जल्द हार मानने वाले न थे । खिसियाकर बोले-मुझे ऐसा मालूम होता है कि इस शैतान की खाला ने हीरा को फँसाने के लिए खुद गाय को ज़हर दे दिया ।
धनिया हाथ मटकाकर बोली-‘हाँ, दे दिया । अपनी गाय थी, मार डाली, फिर किसी दूसरे का जानवर तो नहीं मारा? तुम्हारे तहकियात में यही निकलता है, तो यही लिखो । पहना दो मेरे हाथ में हथकड़ियाँ । देख लिया तुम्हारा न्याय और तुम्हारे अक्कल की दौड़ । गरीबों का गला काटना दूसरी बात है । दूध का दूध और पानी का पानी करना दूसरी बात है ।
होरी खो से अँगारे बरसाता धनिया की ओर लपका; पर गोबर सामने आकर खड़ा हो गया और उग्र भाव से बोला-अच्छा दादा, अब बहुत हुआ । पीछे हट जाओ, नहीं मैं कहे देता हूँ. मेरा मुँह न देखोगे । तुम्हारे ऊपर हाथ न उठाऊँगा ऐसा कपूत नहीं हूँ । यही गले में फाँसी लगा लूँगा ।
होरी पीछे हट गया और धनिया शेर होकर बोली-तू हट जा गोबर, देखूँ तो क्या करता है मेरा । दारोगाजी बैठे हैं । इसकी हिम्मत देखूं । घर में तलासी होने से इसकी इज्जत जाती है। अपनी मेहरिया को सारे गॉव के सामने लतियाने रो इसकी इज्जत नहीं जाती! यही तो बीरों का धरम है । बड़ा बीर है, तो किसी मर्द से लड़ । जिसकी बाँह पकड़कर लाया, उसे मारकर बहादुर न कहलायेगा । तू समझता होगा, मैं इसे रोटी-कपड़ा देता हूँ । आज से अपना घर संभाल । देख तो इसी गाँव में तेरी छाती पर मूँग दलकर रहती हूँ कि नहीं, और उससे अच्छा खाऊँ-पहनूँगी । इच्छा हो, देख ले ।
होरी परास्त हो गया । उसे ज्ञात हुआ, स्त्री के सामने पुरुष कितना निर्बल, कितना निरुपाय है ।
नेताओं ने रुपये चुनकर उठा लिये थे और दारोगाजी को वही से चलने का इशारा कर रहे थे । धनिया ने एक ठोकर और जमायी-जिसके रुपये हों, ले जाकर उसे दे दो । हमें किसी से उधार नहीं लेना है । और जो देना है, तो उसी से लेना । मैं दमड़ी भी न दूँगी, चाहे मुझे हाकिम के इजलास तक ही चढ़ना पड़े । हम बाकी चुकाने को पचीस रुपये माँगते थे, किसी ने न दिया । आज अँजुली-भर रुपये ठनाठन निकाल के दिये । मैं सब जानती हूँ । यही तो बाँट-बखरा होने वाला था, सभी के मुँह मीठे होते । ये हत्यारे गाँव के मुखिया हैं, गरीबों का खून करने वाले!
सूद-ब्याज डेढ़ी-सवाई. नजर-नज़राना, घूस-घास जैसे भी हो, ग़रीबों को लूटो । उस पर सुराज चाहिये । जेल जाने से सुराज न मिलेगा धरम से. न्याय से ।
नेताओं के मुँह में कालिख-सी लगी हुई थी । दारोगाजी के मुँह पर झाडू-सी फिरी हुई थी । इज्जत बचाने के लिए हीरा के घर की ओर चले ।
रास्ते में दारोगा ने स्वीकार किया-औरत है बड़ी दिलेर!
पटेश्वरी बोले-दिलेर है हुजूर, कर्कशा है । ऐसी औरत को तो गोली मार दे ।
‘तुम लोगों का काफिया गा कर दिया उसने । चार-चार तो मिलते ही ।’
‘हुजूर के भी तो पन्द्रह रुपये गये ।’
‘मेरे कही जा सकते हैं । वह न देगा, गाँव के मुखिया देंगे और पन्द्रह रुपये की जगह पूरे पचास रुपये । आप लोग चटपट इन्तजाम कीजिए ।’
पटेश्वरीलाल ने हंसकर कहा-हुजूर बड़े दिल्लगीबाज हैं ।
दातादीन बोले-बड़े आदमियों के यही लक्षण हैं । ऐसे भाग्यवानों के दर्शन कहाँ होते हैं ।
दारोगाजी ने कठोर स्वर में कहा-यह खुशामद फिर कीजिएगा । इस वक़्त तो मुझे पचास रुपये दिलवाइए, नकद; और यह समझ लो कि आनाकानी की, तो मैं तुम चारों के घर की तलाशी लूँगा । बहुत मुमकिन है कि तुमने हीरा और होरी को फंसाकर उनसे सौ पचास ऐंठने के लिए यह पाखण्ड रचा हो ।

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नेतागण भी अभी तक यही समझ रहे हैं, दारोगाजी विनोद कर रहे हैं ।
झिंगुरीसिंह ने आँखें मारकर कहा-निकालो पचास रुपये पटवारी साहब!
नोखेराम ने उनका समर्थन किया-पटवारी साहब का इलाका है। उन्हें जरूर आपकी खातिर करनी चाहिए ।
पण्डित नोखेरामजी की चौपाल आ गयी । दारोगाजी एक चारपाई पर बैठ गये और बोले-तुम लोगों ने क्या निश्चय किया? रुपये निकालते हो या तलाशी करवाते हो?
दातादीन ने आपत्ति की-मगर हुजूर….
‘मैं अगर-मगर कुछ नहीं सुनता चाहता ।’
झिंगुरीसिंह ने साहस किया-सरकार यह तो सरासर…
‘मैं पन्द्रह मिनट का समय देता हूँ । अगर इतनी देर में पूरे पचास रुपये न आये, तो तुम चारों के घर की तलाशी होगी । और गण्डासिंह को जानते हो । उसका मारा पानी भी नहीं माँगता ।’
पटेश्वरीलाल ने तेज़ स्वर से कहा-आपको अख्तियार है, तलाशी ले लें । यह अच्छी दिल्लगी है, काम कौन करे, पकड़ा कौन जाये?
‘मैंने पचीस साल थानेदारी की है, जानते हो?’
‘लेकिन ऐसा अन्धेर तो कभी नहीं हुआ ।’
‘तुमने अभी अधेर नहीं देखा । कहो तो वह भी दिखा दूँ । एक-एक को पाँच-पाँच साल के लिए भेजवा दूँ । यह मेरे बायें हाथ का खेल है । डाके में सारे गाँव को काले पानी भेजवा सकता हूँ । इस धोखे में न रहना!’
चारों सज्जन चौपाल के अन्दर जाकर विचार करने लगे ।
फिर क्या हुआ, किसी को मालूम नहीं ही, दोरोगाजी प्रसन्न दिखायी दे रहे थे और चारों सज्जनों के मुँह पर फटकार बरस रही थी ।
दारोगाजी घोड़े पर सवार होकर चले, तो चारों नेता दौड़ रहे थे । घोड़ा दूर निकल गया तो चारों सज्जन लौटे; इस तरह मानो किसी प्रियजन का संस्कार करके श्मशान से लौट रहे हों ।
सहसा दातादीन बोले-मेरा सराप न पड़े तो मुँह न दिखाऊँ ।
नोखेराम ने समर्थन किया-ऐसा धन कभी फलते नहीं देखा ।
पटेश्वरी ने भविष्यवाणी की-हराम की कमाई हराम में जायेगी।
झिंगुरीसिंह को आज ईश्वर की न्यायपरता में सन्देह हो गया था । भगवान न जाने कही हैं कि यह अन्धेर देखकर भी पापियों को दण्ड नहीं देते ।
इस वक़्त इन सज्जनों की तस्वीर खींचने लायक थी ।

FAQ ( लोग यह भी पूछते है )

उर्दू में प्रेमचंद का नाम क्या था?

पहले प्रेमचंद, धनपत राय नाम से लिखते थे. लेकिन उर्दू में प्रकाशित होने वाली ‘ज़माना पत्रिका’ के सम्पादक और उनके प्रिय दोस्‍त मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें सलाह दी के प्रेमचंद नाम से नाम लिखे. जिसके बाद वे प्रेमचन्द के नाम से लिखने लगे। उन्‍होंने आरंभिक लेखन ज़माना पत्रिका में ही किया

मुंशी प्रेमचंद की प्रमुख रचनाएं कौन-कौन सी है

उन्होंने सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, निर्मला, गबन, कर्मभूमि, गोदान आदि लगभग डेढ़ दर्जन उपन्यास तथा कफन, पूस की रात, पंच परमेश्वर, बड़े घर की बेटी, बूढ़ी काकी, दो बैलों की कथा आदि तीन सौ से अधिक कहानियाँ लिखीं।

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