Jyoti by munshi premchand
Jyoti by munshi premchand

‘तो मैं समझ गयी। तुम मुझे प्यार नहीं करते।’

‘मेरा बस होता, तो तुमको अपने परान में रख लेता।’

इसी समय घर के किवाड़ खटके। रुपिया भाग गयी।

मोहन दूसरे दिन सोकर उठा तो उसके हृदय में आनंद का सागर-सा भरा हुआ था। वह सोहन को बराबर डाँटता रहता था। सोहन आलसी था। घर के काम-धंधे में जी न लगाता था। आज भी वह आँगन में बैठा अपनी धोती में साबुन लगा रहा था। मोहन को देखते ही यह साबुन छिपाकर भाग जाने का अवसर खोजने लगा। मोहन ने मुस्कराकर कहा- धोती बहुत मैली हो गयी है सोहन? धोबी को क्यों नहीं देते??

सोहन को इन शब्दों में स्नेह की गंध आयी।

‘धोबिन पैसे माँगती है।’

‘तो पैसे अम्मा से क्यों नहीं माँग लेते?’

‘अम्मा कौन पैसे दिये देती हैं।’

‘तो मुझसे ले लो।’

यह कहकर उसने एक इकन्नी उसकी ओर फेंक दी। सोहन प्रसन्न हो गया। भाई और माता, दोनों ही उसे धिक्कारते रहते थे। बहुत दिनों बाद आज उसे स्नेह की मधुरता का स्वाद मिला। इकन्नी उठा ली और धोती को वहीं छोड़कर गाय को खोलकर ले चला।

मोहन ने कहा- ‘रहने दो, मैं इसे लिये जाता हूँ।’

सोहन ने पगहिया भाई को देकर फिर कहा- ‘तुम्हारे लिए चिलम रख लाऊँ?’ जीवन में आज पहली बार सोहन ने भाई के प्रति ऐसा सद्भाव प्रकट किया था। इसमें क्या रहस्य है, यह मोहन की समझ में न आया। बोला- ‘आग हो तो रख लाओ।’

मैना सिर के बाल खोले आँगन में बैठी घरौंदा बना रही थी। मोहन को देखते ही उसने घरौंदा बिगाड़ दिया और आँचल से बाल छिपाकर रसोईघर में बरतन उठाने चली।

मोहन ने पूछा- ‘क्या खेल रही थी मैना?’

मैना डरी हुई बोली- ‘कुछ तो नहीं।’

‘तू तो बहुत अच्छे घरौंदे बनाती है। जरा बना, देखूँ।’

मैना का रुआँसा चेहरा खिल उठा। प्रेम के शब्द में कितना जादू है! मुँह से निकलते ही जैसे सुगंध फैल गयी। जिसने सुना, उनका हृदय खिल उठा। जहाँ भय था, वहाँ विश्वास चमक उठा। जहाँ कटुता थी, वहाँ अपनापन छलक पड़ा। चारों ओर चेतना दौड़ गयी। कहीं आलस्य नहीं, कहीं खिन्नता नहीं। मोहन का हृदय आज प्रेम से भरा हुआ है। उसमें सुगंध का विकर्षण हो रहा है।

मैना घरौंदा बनाने बैठ गयी।

मोहन ने उसके उलझे हुए बालों को सुलझाते हुए कहा- ‘तेरी गुड़िया का ब्याह कब होगा मैना, नेवता दे, कुछ मिठाई खाने को मिले।’

मैना का मन आकाश में उड़ने लगा। अब भैया पानी मांगें, तो वह लोटे को राख से खूब चमाचम करके पानी ले जायेगी।

‘अम्मा पैसे नहीं देती। गुड्डा तो ठीक हो गया है। टीका कैसे भेजूँ।’

‘कितने पैसे लेगी?’

‘एक पैसे के बताशे लूँगी और एक पैसे का रंग। जोड़े तो रँगे जायेंगे कि नहीं।’

‘तो दो पैसे में तेरा काम चल जायेगा?’

‘हां, दो पैसे दे दो भैया, तो मेरी गुड़िया का ब्याह धूमधाम से हो जाये।’ मोहन ने दो पैसे हाथ में लेकर मैना को दिखाया। मैना लपकी, मोहन ने ऊपर हाथ उठाया, मैना ने हाथ पकड़कर नीचे खींचना शुरू किया। मोहन ने उसे गोद में उठा लिया। मैना ने पैसे ले लिये और नीचे उतरकर नाचने लगी। फिर अपनी सहेलियों को विवाह का नेवता देने के लिए भागी।

उसी वक्त बूटी गोबर का झौवा लिए आ पहुँची। मोहन को खड़े देखकर कठोर स्वर में बोली- ‘अभी तक मटरगस्ती ही हो रही है। भैंस कब दुही जायेगी?’

आज बूटी को मोहन ने विद्रोह-भरा जवाब न दिया। जैसे उसके मन में माधुर्य का कोई सोता-सा खुल गया हो। माता को गोबर का बोझ लिए देखकर उसने झौवा उसके सिर से उतार लिया।

बूटी ने कहा- ‘रहने दे, रहने दे, जाकर भैंस दुह, मैं तो गोबर लिए जाती हूँ।’

‘तुम इतना भारी बोझ क्यों उठा लेती हो, मुझे क्यों नहीं बुला लेतीं?’

‘माता का हृदय वात्सल्य से गदगद हो उठा।’

‘तू जा अपना काम देख। मेरे पीछे क्यों पड़ता है।’

‘गोबर निकालने का काम मेरा है।’

‘और दूध कौन दुहेगा?’

‘वह भी मैं करूंगा। ‘

‘तू इतना बड़ा जोधा है कि सारे काम कर लेगा। ‘

‘जितना कहता हूँ उतना कर लूँगा।’

‘तो मैं क्या करूंगी?’

‘तुम लड़कों से काम लो, जो तुम्हारा धर्म है।’

‘मेरी सुनता है कोई?’

आज मोहन बाजार से दूध पहुँचाकर लौटा तो पान, कत्था, सुपारी, एक छोटा-सा पानदान और थोड़ी-सी मिठाई लाया। बूटी बिगड़ कर बोली- ‘आज पैसे कहीं फालतू मिल गये थे क्या? इस तरह उड़ायेगा तो कितने दिन निर्वाह होगा?’

‘मैंने तो एक पैसा भी नहीं उड़ाया अम्मा। पहले मैं समझता था, तुम पान खाती ही नहीं।’

‘तो अब मैं पान खाऊंगी। ‘

‘हां और क्या! जिसके दो-दो जवान बेटे हों, क्या वह इतना शौक भी न करे।’ बूटी के सूखे कठोर हृदय में कहीं से कुछ हरियाली निकल आयी, एक नन्ही- सी कोपल थी लेकिन उसके अंदर कितना जीवन, कितना रस था। उसने मैना और सोहन को एक-एक मिठाई दे दी और मोहन को देने लगी।

‘मिठाई तो लड़कों के लिए लाया था अम्मा।’

‘और तू तो बूढ़ा हो गया, क्यों?’

‘इन लड़कों के सामने तो बूढ़ा ही हूँ।’

‘लेकिन मेरे सामने तो लड़का ही है।’