jhaankee by munshi premchand
jhaankee by munshi premchand

कई दिन से घर में कलह मचा हुआ था। माँ अलग मुँह फुलाये बैठी थी, स्त्री अलग। घर की वायु में जैसे विष भरा हुआ था। रात को भोजन नहीं बना, दिन को मैंने स्टोव पर खिचड़ी डाली; पर खाया किसी ने नहीं। बच्चों को भी आज भूख न थी। छोटी लड़की कभी मेरे पास आकर खड़ी हो जाती, कभी माता के पास, कभी दादी के पास; पर कहीं उसके लिए प्यार की बातें न थीं। कोई उसे गोद में न उठाता था, मानो उसने भी कोई अपराध किया हो। लड़का शाम को स्कूल से आया। किसी ने उसे कुछ खाने को न दिया, न उससे बोला न कुछ पूछा। दोनों बरामदे में मन मारे बैठे हुए थे और शायद सोच रहे थे-घर में आज क्यों लोगों के हृदय उनसे इतने फिर गये हैं। भाई-बहन दिन में कितनी बार लड़ते हैं, रोना-पीटना भी कई बार हो जाता है; पर ऐसा कभी नहीं होता कि घर में खाना न पके या कोई किसी से बोले नहीं। यह कैसा झगड़ा है कि चौबीस घंटे गुज़र जाने पर भी शांत नहीं होता, यह शायद उनकी समझ में न आता था।

झगड़े की जड़ कुछ न थी। अम्माँ ने मेरी बहन के घर तीज भेजने के लिए जिन सामानों की सूची लिखायी, वह पत्नी जी को घर की स्थिति देखते हुए अधिक मालूम हुई। अम्माँ ख़ुद समझदार हैं। उन्होंने थोड़ी-बहुत काट-छाँट कर दी थीं; लेकिन पत्नी के विचार से और काट-छाँट होना चाहिए थी। पाँच साड़ियों की जगह तीन रहें तो क्या बुराई है! खिलौने इतने क्या होेंगे, इतनी मिठाई की क्या जरूरत! उनका कहना था- जब रोज़गार में कुछ मिलता नहीं, दैनिक कार्यों में खींच-तान करनी पड़ती है, दूध-घी के बजट में तकलीफ़ हो गयी, तो फिर तीज में क्यों इतनी उदारता की जाय? पहले घर में दिया जलाकर तब मस्जिद में जलाते हैं। यह नहीं कि मस्जिद में तो दिया जला दें, और घर में अँधेरा पड़ा रहे। इसी बात पर सास-बहू में तक़रार हो गयी, फिर शाखें फूट निकलीं। बात कहाँ-से-कहाँ जा पहुँची, गड़े हुए मुर्दे उखाड़े गये। अन्योक्तियों की बारी आयी, व्यंग्य का दौर शुरू हुआ और मौनालंकार पर समाप्त हो गया।

मैं बड़े संकट में था। अगर अम्माँ की तरफ़ से कुछ कहता हूँ, तो पत्नीजी रोना-धोना शुरू करती हैं, अपने नसीबों को कोसने लगती हैं; पत्नी की-सी कहता हूँ, तो जनमुरीद की उपाधि मिलती है। इसलिए बारी-बारी से दोनों पक्षों का समर्थन करता जाता था; पर स्वार्थवश मेरी सहानुभूति पत्नी के साथ ही थी। मेरे सिनेमा का बजट इधर साल-भर से बिल्कुल ग़ायब हो गया, पान-पत्ते के ख़र्च में भी कमी करनी पड़ी थी, बाज़ार की सैर बंद हो गयी थी। खुलकर तो अम्माँ से कुछ न कह सकता था; पर दिल में समझ रहा था कि ज़्यादती इन्हीं की है। दुकान का यह हाल है कि कभी-कभी बोहनी भी नहीं होती। असामियों से टका वसूल नहीं होता, तो इन पुरानी लक़ीरों को पीटकर क्यों अपनी जान संकट में डाली जाय!

बार-बार इस गृहस्थी के जंजाल पर तबीयत झुँझलाती थी। घर में तीन तो प्राणी हैं और उनमें भी प्रेमभाव नहीं! ऐसी गृहस्थी में तो आग लगा देनी चाहिए। कभी-कभी ऐसी सनक सवार हो जाती थी कि सबको छोड़-छाड़कर कहीं भाग जाऊँ। जब अपने सिर पड़ेगी, तब इनको होश आयेगा। तब मालूम होगा कि गृहस्थी कैसे चलती है। क्या जानता था कि यह विपत्ति झेलनी पड़ेगी, नहीं विवाह का नाम ही न लेता। तरह-तरह के कुत्सित भाव मन में आ रहे थे। कोई बात नहीं, अम्माँ मुझे परेशान करना चाहती हैं। बहू उनके पाँव नहीं दबाती, उनके सिर में तेल नहीं डालती, तो इसमें मेरा क्या दोष? मैंने उसे मना तो नहीं कर दिया है! मुझे तो सच्चा आनंद होगा, यदि सास-बहू में इतना प्रेम हो जाय; लेकिन यह मेरे वश की बात नहीं कि दोनों में प्रेम डाल दूँ। अगर अम्माँ ने अपनी सास की साड़ी धोई है, उनके पाँव दबाये हैं, उनकी घुड़कियाँ खायी हैं, तो आज वह पुराना हिसाब बहू से क्यों चुकाना चाहती हैं? उन्हें क्यों नहीं दिखाई देता कि अब समय बदल गया है। बहुएँ अब भयवश सास की गुलामी नहीं करतीं। प्रेम से चाहे उनके सिर के बाल नोच लो, लेकिन जो रौब दिखाकर उन पर शासन करना चाहो, तो वह दिन लद गये।

सारे शहर में जन्माष्टमी का उत्सव हो रहा था। मेरे घर में संग्राम छिड़ा हुआ था। संध्या हो गयी थी, पर सारे घर में अँधेरा पड़ा था। मनहूसियत छायी हुई थी। मुझे अपनी पत्नी पर क्रोध आया। लड़ती हो, लड़ो; लेकिन घर में अँधेरा क्यों कर रखा है। जाकर कहा-क्या आज घर में चिराग़ न जलेंगे?

पत्नी ने मुँह फुलाकर कहा-जला क्यों नहीं लेते। तुम्हारे हाथ नहीं हैं?

मेरी देह में आग लग गयी। बोला-तो क्या जब तुम्हारे चरण नहीं आये थे, तब घर में चिराग़ न जलते थे?

अम्माँ ने आग को हवा दी-नहीं, तब सब लोग अँधेरे ही में पड़े रहते थे।

पत्नीजी को अम्माँ की इस टिप्पणी ने जामे के बाहर कर दिया। बोली-जलाते होंगे मिट्टी की कुप्पी! लालटेन तो मैंने नहीं देखी। मुझे इस घर में आये दस साल हो गये।

मैंने डाँटा-अच्छा चुप रहो, बहुत बढ़ो नहीं।

‘ओ हो! तुम तो ऐसा डाँट रहे हो, जैसे मुझे मोल लाये हो?’

‘मैं कहता हूँ, चुप रहो!

‘क्यों चुप रहूं? अगर एक कहोगे, तो दो सुनोगे।’

‘इसी का नाम पतिव्रता है?’

‘जैसा मुँह होता है, वैसे ही बीड़े मिलते हैं।’

मैं परास्त होकर बाहर चला आया, और अँधेरी कोठरी में बैठा हुआ, उस मनहूस घड़ी को कोसने लगा, जब इस कुलच्छनी से मेरा विवाह हुआ था। इस अंधकार में भी दस साल का जीवन सिनेमा-चित्रों की भाँति मेरे स्मृति-नेत्रों के सामने दौड़ गया। उसमें कहीं प्रकाश की झलक न थी, कहीं स्नेह की मृदुता न थी।

सहसा मेरे मित्र पंडित जयदेवजी ने द्वार पर पुकारा-अरे, आज यह अँधेरा क्यों कर रखा है जी! कुछ सूझता ही नहीं। कहाँ हो?

मैंने कोई जवाब न दिया। सोचा, यह आज कहाँ से आकर सिर पर सवार हो गया। जयदेव ने फिर पुकारा-अरे, कहाँ हो भाई? बोलते क्यों नहीं? कोई घर में है या नहीं?

कहीं से कोई जवाब न मिला।

जयदेव ने द्वार को इतने ज़ोर से झँझोड़ा कि मुझे भय हुआ, कहीं दरवाज़ा चौखट-बाजू समेत गिर न पड़े। फिर भी मैं बोला नहीं। उसका आना खल रह था।

जयदेव चले गये। मैंने आराम की साँस ली। शैतान टला, नहीं घंटों सिर खाता।

मगर पाँच ही मिनट में फिर किसी के पैरों की आहट मिली और अबकी टार्च के तीव्र आकाश से मेरा सारा कमरा भर उठा। जयदेव ने मुझे बैठे देखकर कौतूहल से पूछा-तुम कहाँ गये थे जी? घंटो चीखा, किसी ने जवाब तक न दिया। यह आज क्या मामला है? चिराग़ क्यों नहीं जले?

मैंने बहाना किया-क्या जानें, मेरे सिर में दर्द था, दुकान से आकर लेटे, तो नींद आ गयी।

‘और सोए तो घोड़ा बेचकर, मुर्दों से शर्त लगाकर?’

‘हाँ यार, नींद आ गयी।’

‘मगर घर में चिराग़ तो जलाना चाहिए था या उसका रिट्रेंचमेंट कर दिया?

‘आज घर में लोग व्रत से है। न हाथ खाली होगा।’

‘खैर चलो, कहीं झाँकी देखने चलते हो? सेठ घूरेमल के मंदिर में ऐसी झाँकी बनी है कि देखते ही बनता है। ऐसे-ऐसे शीशे और बिजली के सामान सजाये हैं कि आँखें झपक उठती है। अशोक के स्तम्भों में लाल, हरी, नीली बत्तियों की अनोखी बहार है। सिंहासन के ठीक सामने ऐसा फौवारा लगाया है कि उसमें से गुलाब जल की फुहारें निकलती हैं। मेरा तो चोला मस्त हो गया। सीधे तुम्हारे पास दौड़ा आ रहा हूँ। बहुत झाँकियाँ देखी होंगी तुमने, लेकिन यह और ही चीज़ है। आलम फटा पड़ता है। सुनते हैं, दिल्ली से कोई चतुर कारीगर आया है। उसी की यह करामात है।’

मैंने उदासीन भाव से कहा-मेरी तो जाने की इच्छा नहीं है भाई! सिर में ज़ोर का दर्द है।

‘तब तो ज़रूर चलो भाई! दर्द भाग न जाय तो कहना।’

‘तुम तो यार बहुत ज़िद करते हो। इसी मारे मैं चुपचाप पड़ा था कि किसी तरह यह बला टले; लेकिन तुम फिर सिर पर सवार ही हो गये। कह दिया-मैं न जाऊँगा।

‘और मैंने कह दिया-मैं ज़रूर ले जाऊँगा।’

मुझ पर विजय पाने का मेरे मित्रों को बहुत आसान नुस्ख़ा याद है। यों हाथा-पाई, धींगा-मुश्ती, धौल-धप्पे में किसी से पीछे रहनेवाला नहीं हूँ, लेकिन किसी ने मुझे गुदगुदाया और मैं परास्त हुआ। फिर मेरी कुछ नहीं चलती। मैं हाथ जोड़ने लगता हूँ, घिघियाने लगता हूँ और कभी-कभी रोने भी लगता हूँ। जयदेव ने वही नुस्ख़ा आज़माया और उसकी जीत हो गयी। संधि की यही शर्त ठहरी कि मैं चुपके से झाँकी देखने चला चलूँ।