Haar Kee Jeet by Munshi Premchand
Haar Kee Jeet by Munshi Premchand

मेरे पास केशव और प्रोफेसर भाटिया के पत्र बराबर आते रहते थे। कभी-कभी लज्जावती भी मिलती थी। उसके पत्रों में श्रद्धा और प्रेम की मात्रा दिनों दिन बढ़ती जाती थी। वह मेरी राष्ट्र-सेवा का बड़े उदार भरे उत्साहमय शब्दों में बखान करती। मेरे विषय में उसे पहले जो शंकाएं थी, वह मिटती जाती थी। मेरी तपस्या देवी को आकर्षित करने लगी थी। केशव के पत्र से उदासीनता टपकती थी। उसके कॉलेज में धन का अभाव था। तीन वर्ष हो गए थे, पर उसकी तरक्की न हुई थी। पत्रों से ऐसा प्रतीत होता कि मानो वह जीवन से असंतुष्ट है। कदाचित् इसका मुख्य कारण यह था कि अभी तक उसके जीवन का सुखमय स्वप्न चरितार्थ न हुआ था।

तीसरे वर्ष गर्मियों की छुट्टियों में प्रोफेसर भाटिया मुझसे मिलने आये और बहुत प्रसन्न होकर गए। उसके एक ही सप्ताह पीछे लज्जावती का पत्र आया। अदालत ने तज़बीब सुना दी, मेरी डिग्री हो गयी। केशव की पहली बार मेरे मुकाबले में हार हुई। मेरे हर्षोल्लास की कोई सीमा न थी। प्रो. भाटिया का इरादा भारतवर्ष के सब प्रांतों में भ्रमण करने का था। वह साम्यवाद पर एक ग्रंथ लिख रहे थे जिसके लिए प्रत्येक बड़े नगर में कुछ अन्वेषण करने की जरूरत थी। लज्जा को अपने साथ ले जान चाहते थे। निश्चय हुआ कि उनके लौट आने पर आगामी चैत के महीने में हमारा संयोग हो जायेगा मैं यह वियोग के दिन बड़ी बेसब्री से काटने लगा। अब तक मैं जानता था कि बाजी केशव के हाथ रहेगी, मैं निराश था, पर शांत था। अब आशा थी और उसके साथ घोर अशांति थी।

मार्च का महीना था। प्रतीक्षा की अवधि पूरी हो चुकी थी। कठिन परिश्रम के दिन गए, फसल काटने का समय आया। प्रोफेसर साहब ने ढाका से पत्र लिखा था कि कई अनिवार्य कारणों से मेरा लौटना मार्च में नहीं, मई में होगा। इसी बीच में काश्मीर के दीवान लाला सोमनाथ कपूर नैनीताल आए। बजट पेश था। उस पर व्यवस्थापक सभा में वाद-विवाद हो रहा था। गवर्नर की ओर से दीवान साहब को पार्टी दी गयी। सभा के प्रतिनिधियों को भी निमंत्रण मिला। काउंसिल की ओर से मुझे अभिवादन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मेरी बकवास को दीवान साहब ने बहुत पसंद किया। चलते समय मुझसे कई मिनट तक बातें की और मुझे अपने डेरे पर आने का आदेश दिया। उनके साथ उनकी पुत्री सुशीला आई थी। वह पीछे सिर झुकाए खड़ी रही। जान पड़ता था, भूमि को पढ़ रही है। पर मैं अपनी आंखों को काबू में न रख सका। वह उतनी ही देर में एक बार नहीं कई बार उठी और जैसे बच्चा किसी अजनबी की पुचकार से उसकी ओर लपकता है, पर फिर डरकर मां की गोद में चिपट जाता है, वह भी डरकर आधे रास्ते से लौट गयी। लज्जा अगर कुसुमित वाटिका थी तो सुशीला शीतल सलिल धारा थी जहां वृक्षों के कुंज थे, विनोदशील पेड़ों के झुंड, विहगावली की अनंत शोभा और तरंगों का मधुर संगीत।

मैं घर पर आया तो ऐसा थका हुआ था जैसे कोई मंजिल मारकर आया था सौंदर्य जीवन-सुधा है। मालूम नहीं क्यों इसका असर इतना प्राणघातक होता है।

लेटा तो वही सूरत सामने थी। मैं उसे हटाना चाहता था। मुझे भय था कि एक क्षण भी उस भंवर में पड़कर मैं अपने को संभाल न सकूंगा। मैं अब लज्जावती का हो चुका था, वही अब मेरे हृदय की स्वामिनी थी। मेरा उस पर कोई अधिकार न था लेकिन मेरे सारे संयम, सारी दलीलें निष्फल हुई। जल के उद्वेग में नौका को धागे से कौन रोक सकता है? अन्त में हताश होकर मैंने अपने को विचारों के प्रवाह में डाल दिया। कुछ दूर तक नौका वेगवती तरंगों के साथ चली फिर उसी प्रवाह में विलीन हो गयी।

दूसरे दिन मैं नियत समय पर दीवान साहब के डेरे पर जा पहुंचा, इस भांति कांपता और हिचकता जैसे कोई बालक दामिनी की चमक से चौंक कर आंख बंद कर लेता है कि कहीं वह चमक न जाये, कहीं मैं उसकी चमक देख न लूं भोला-भाला किसान भी अदालत के सामने इतना संशकन होता होगा। यथार्थ यह था कि मेरी आत्मा परास्त हो चुकी थी, उसमें अब प्रतिकार की शक्ति न रही थी।

दीवान साहब ने मुझसे हाथ मिलाया और कोई घंटे भर तक आर्थिक और सामाजिक प्रश्नों पर वार्तालाप करते रहे। मुझे उनकी बहुज्ञता पर आश्चर्य होता था। ऐसा वाक् चतुर पुरुष मैंने कभी न देखा था। साठ वर्ष की वयस थी, पर हास्य और विनोद के मानो भंडार थे। न जाने कितने श्लोक, कितने कवित्व, कितने शेर उन्हें याद थे। बात-बात पर कोई-न-कोई सुयुक्ति निकाल लाते थे। खेद है, उस प्रकृति के लोग अब गायब होते जाते हैं। वह शिक्षा प्रणाली न जाने कैसी थी, जो ऐसे-ऐसे रत्न उत्पन्न करती थी। अब तो सजीवता कहीं दिखाई ही नहीं देती। प्रत्येक प्राणी चिन्ता की मूर्ति है, उसके होठों पर कभी हंसी आती ही नहीं। खैर, दीवान साहब ने पहले चाय मंगवायी, नित्य फल और मेवे मंगवाए। मैं रह-रहकर इधर-उधर उत्सुक नेत्रों से देखता था। मेरे कान उसके स्वर का रसपान करने के लिए मुंह खोले हुए थे, आंखें उस की ओर लगी हुई थी। भय भी था और लगाव भी, झिझक भी थी और खिंचाव भी। बच्चा झूले से डरता है पर उस पर बैठना भी चाहता है।

लेकिन रात के नौ बजे गए, मेरे लौटने का समय आ गया। मन लज्जित हो रहा था कि दीवान साहब दिल में क्या कह रहे होंगे। सोचते होंगे इसे कोई काम नहीं है? जाता क्यों नहीं? बैठे-बैठे दो ढाई घंटे तो हो गए।

सारी बातें समाप्त हो गयी। उनके लतीफे भी खत्म हो गए। वह नीरवता उपस्थित हो गयी, जो कहती है कि अब चलिए फिर मुलाकात होगी। यार जिंदा व सोहबत बाकी। मैंने कई बार उठने का इरादा किया, लेकिन इंतजार में आशिक की जान भी नहीं निकलती, मौत को भी इंतजार का सामना करना पड़ता है। यहां तक कि साढ़े नौ बज गये और अब मुझे विदा होने के सिवा कोई मार्ग न रहा, जैसे दिल बैठ गया।

जिसे मैंने भय कहा है, वह वास्तव में भय नहीं था, वह उत्सुकता की चरम सीमा थी। यहां से चला तो ऐसा शिथिल और निर्जीव था मानों प्राण निकल गये हो। अपने को धिक्कारने लगा। अपनी क्षुद्रता पर लज्जित हुआ। तुम समझते हो कि हम भी कुछ हैं। यहां किसी को तुम्हारे मरने-जीने की परवाह नहीं। माना उसके लक्षण कुंवारियों के से हैं। संसार में कुंवारी लड़कियों की कमी नहीं। सौंदर्य भी ऐसी दुर्लभ वस्तु नहीं। अगर प्रत्येक रूपवती और कुंवारी युवती को देखकर तुम्हारी यही हालत होती रही तो ईश्वर ही मालिक है।

वह भी तो अपने दिल में यही विचार करती होगी। प्रत्येक रूपवती युवक पर उसकी आंखें क्यों उठे। कुलवती स्त्रियों के यह ढंग नहीं होते। पुरुषों के लिए अगर यह रूप-तृष्णा निंदाजनक है तो स्त्रियों के लिए विनाशक है। द्वैत से अद्वैत को भी इतना आघात नहीं पहुंच सकता, जितना सौंदर्य को।

दूसरे दिन शाम को मैं अपने बरामदे में बैठा पत्र देख रहा था। क्लब जाने को जी नहीं चाहता था। चित्त कुछ उदास था। सहसा मैंने दीवान साहब को फिटन पर आते देखा। मोटर से उन्हें घृणा थी। वह इसे पैशाचिक उड़न-खटोला कहा करते थे। उनके बगल में सुशीला भी थी। मेरा हृदय धक-धक करने लगा। उसकी निगाह मेरी तरफ उठी हो या न उठी हो, पर मेरी टकटकी उस वक्त तक लगी रही जब तक फिट अदृश्य न हो गयी।

तीसरे दिन मैं फिर बरामदे में आ बैठा, आंखें सड़क की ओर लगी हुई थी। फिटन आयी और चली गयी। अब यही उसका नित्यप्रति का नियम हो गया है। मेरा अब यही काम था कि सारे दिन बरामदे में बैठ रहूं। मालूम नहीं फिटन कब निकल जाये। विशेषतः तीसरे पहर तो मैं अपनी जगह से हिलने का नाम भी न लेता था।

इस प्रकार एक मास बीत गया। मुझे अब काउंसिल के कामों में कोई उत्साह न था। समाचार पत्रों में, उपन्यासों में जी न लगता। कहीं सैर करने का भी जी न चाहता। प्रेमियों को न जाने जंगल-पहाड़ में भटकने की, कांटों में उलझने की सनक कैसे सवार होती है। मेरे तो जैसे पैरों में बेड़ियां-सी पड़ गयी थी। बस, बरामदा था और मैं, और फिटन का इंतजार। मेरी विचार-शक्ति भी शायद अंतर्धान हो गयी थी। मैं दीवान साहब को या अंग्रेजी शिष्टता के अनुसार सुशीला को ही अपने यहां निमंत्रित कर सकता था, पर वास्तव में, मैं अभी तक उससे भयभीत था। अब भी लज्जावती को अपनी प्रणयिनी समझता था। वह अब भी मेरे हृदय की रानी थी, चाहे उस पर किसी दूसरी शक्ति का अधिकार ही क्यों न हो गया हो।

एक महीना और निकल गया, लेकिन मैंने लज्जा को कोई पत्र न लिखा। मुझमें अब उसे पत्र लिखने की भी सामर्थ्य न थी। शायद उससे पत्र-व्यवहार करने को मैं नैतिक अत्याचार समझता था। मैंने उससे दगा की थी। मुझे अब उसे अपने मलिन अंतःकरण में भी पवित्र करने का कोई अधिकार न था। इसका अन्त क्या होगा? यही चिंता अहर्निश मेरे मन पर कुहर मेघ की भाति शून्य हो गयी थी। चिंता दाह के कारण दिनों दिन घुलता जाता था। मित्रजन अक्सर पूछा करते, आपको क्या मर्ज है? मुख निस्तेज, कांतिहीन हो गया। भोजन औषधि के समान लगता। सोने जाता तो जान पड़ता, किसी ने पिंजरे में बन्द कर दिया है। कोई मिलने आता तो चित्त उससे कोसों भागता। विचित्र दशा थी।

एक दिन शाम को दीवान साहब की फिटन मेरे द्वार पर आकर रुकी। उन्होंने अपने व्याख्यानों का एक संग्रह प्रकाशित कराया था। उसकी प्रति मुझे भेंट करने के लिए आए थे। मैंने उन्हें बैठने के लिए बहुत आग्रह किया, लेकिन उन्होंने यही कहा, सुशीला को यहां आने में संकोच होगा और फिटन पर अकेले वह घबराएगी। वह चले तो मैं भी साथ हो लिया और फिटन तक पीछे-पीछे आया। जब वह फिटन पर बैठने लगे तो मैंने सुशीला को निःशंक हो आंख भर कर देखा, जैसे कोई प्यासा पथिक गर्मी के दिन में अफर कर पानी पिये कि न जाने कब उसे पानी मिलेगा। मेरी उस एक चितवन में उग्रता, वह याचना, वह उद्वेग, वह करुणा, वह श्रद्धा, वह आग्रह, वह दीनता थी, जो पत्थर की मूर्ति को भी पिघला देती। सुशीला तो फिर स्त्री थी। उसने भी मेरी ओर देखा, निर्भीक सरल नेत्रों से, जरा भी झेंप नहीं, जरा भी झिझक नहीं। मेरे परास्त होने में जो कसर रह गयी थी, वह पूरी हो गयी। इसके साथ उसने मुझ पर मानों अमृत वर्षा कर दी। मेरे हृदय और आत्मा में एक नयी शक्ति का संचार हो गया। मैं लौट तो ऐसा प्रसन्न-चित्त था मानों कल्पवृक्ष मिल गया हो।

एक दिन मैंने प्रोफेसर भाटिया को पत्र लिखा मैं थोड़े दिनों से किसी गुप्त रोग से ग्रस्त हो गया हूं। सम्भव है, तपेदिक (क्षय) का आरम्भ हो, इसलिए मैं इस मई में विवाह करना उचित नहीं समझता। मैं लज्जावती से इस भांति पराड्मुख होना चाहता था कि निगाहों में मेरी इज्जत कम न हो। मैं कभी-कभी अपनी स्वार्थपरता पर कुद्ध होता। लज्जा के साथ यह छल-कपट, यह बेवफाई करते हुए मैं अपनी ही नजरों में गिर गया था। लेकिन मन पर कोई वश न था। उस अबला को कितना दुःख होगा, यह सोचकर मैं कई बार रोया। अभी तक मैं सुशीला के स्वभाव, विचार, मनोवृत्तियों से जरा भी परिचित न था। केवल उसके रूप-लावण्य पर अपनी लज्जा की चिर संचित अभिलाषाओं का बलिदान कर रहा था। अबोध बालकों की भांति मिठाई के नाम पर अपने दूध-चावल को ठुकराये देता था। मैंने प्रोफेसर को लिखा था, लज्जावती से मेरी बीमारी का जिक्र न करें, लेकिन प्रोफेसर साहब इतने गहरे न थे। चौथे ही दिन लज्जा का पत्र आया, जिसमें उसने अपना हृदय खोलकर रख दिया था। वह मेरे लिए सब कुछ, यहां तब कि वैधव्य की यंत्रणा भी सहने के लिए तैयार थी। उसकी इच्छा थी कि अब हमारे संयोग में एक क्षण का भी विलंब न हो, अस्तु! इस पत्र को लिए घंटों एक संज्ञाहीन दशा में बैठ रहा। इस अलौकिक आत्मोत्सर्ग के सामने अपनी क्षुद्रता, अपनी स्वार्थपरता, अपनी दुर्बलता कितनी घृणित थी!