Haar Kee Jeet by Munshi Premchand
Haar Kee Jeet by Munshi Premchand

केशव से मेरी पुरानी लाग-डांट थी। लेख और वाणी, हास्य और विनोद सभी क्षेत्रों में मुझसे कोसों आगे था। उसके गुणों की चन्द्र-ज्योति में मेरे दीपक का प्रकाश कभी प्रस्फुटित न हुआ। एक बार उसे नीचा दिखाना मेरे जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा थी। उस समय मैंने कभी स्वीकार नहीं किया। अपनी त्रुटियों को कौन स्वीकार करता है – पर वास्तव में मुझे ईश्वर ने उसकी जैसी बुद्धि-शक्ति न प्रदान की थी। अगर मुझे कुछ तस्कीन थी, तो यह कि विद्या-क्षेत्र में चाहे मुझे उनसे कंधा मिलना कभी नसीब न हो, पर व्यवहार की रंगभूमि में सेहरा मेरे ही सिर रहेगा। लेकिन दुर्भाग्य से जब प्रणय-सागर में भी उसने मेरे साथ गोता मारा और रत्न उसी के हाथ लगता हुआ नजर आया तो मैं हताश हो गया। हम दोनों ने ही एम.ए. के लिए साम्यवाद का विषय लिया था। हम दोनों ही साम्यवादी थे। केशव के विषय में तो यह स्वाभाविक बात थी। उसका कुल बहुत प्रतिष्ठित न था, न वह समृद्धि ही थी जो इस कमी को पूरा कर देती। मेरी साम्यवादिता पर लोगों को कुतूहल होता था। हमारे साम्यवाद के प्रोफेसर बाबू हरिदास भाटिया साम्यवाद के सिद्धान्तों के कायल थे, लेकिन शायद धन की अवहेलना न कर सकते थे। अपनी लज्जावती के लिए उन्होंने कुशाग्र बुद्धि केशव को नहीं, मुझे पसंद किया। एक दिन संध्या-समय वह मेरे कमरे में आये और चिंतित भाव से बोले – शारदा चरण, मैं महीनों से एक बड़ी चिंता में पड़ा हुआ हूं। मुझे आशा है कि तुम उसका निवारण कर सकते हो। मेरे कोई पुत्र नहीं है। मैंने तुम्हें और केशव दोनों ही को पुत्र-तुल्य समझा है। यद्यपि केशव तुमसे चतुर है, पर मुझे विश्वास है कि विस्तृत संसार में तुम्हें जो सफलता मिलेगी, वह उसे नहीं मिल सकती, अतएव मैंने तुम्हीं को अपनी लज्जा के लिए वरा है। क्या मैं आशा करूं कि मेरा मनोरथ पूरा होगा।

मैं स्वतन्त्र था, मेरे माता-पिता मुझे लड़कपन ही में छोड़कर स्वर्ग चले गये थे। मेरे कुटुम्बियों में अब ऐसा कोई न था, जिसकी अनुमति लेने की मुझे जरूरत होती। लज्जावती जैसी सुशील, सुंदरी, सुशिक्षित स्त्री को पाकर कौन पुरुष होगा जो अपने भाग्य को न सराहता। मैं फूला न समाया। लज्जा एक कुसुमित वाटिका थी, जहां गुलाब की मनोहर सुगंध थी और हरियाली की मनोरम शीतलता, समीर की शुभ तरंगें थी और पक्षियों का मधुर संगीत। वह स्वयं साम्यवाद पर मोहित थी। स्त्रियों के प्रतिनिधित्व और ऐसी ही अन्य विषयों पर उसने मुझसे कितनी ही बातें की थी लेकिन प्रोफेसर भाटिया की तरह केवल सिद्धांतों की भक्त न थी, उनको व्यवहार में भी लाना चाहती थी। उसने चतुर केशव को अपना स्नेह-पात्र बनाया था। तथापि मैं जानता था कि प्रोफेसर भाटिया के आदेश को वह कभी नहीं टाल सकती, यद्यपि उसकी इच्छा के विरुद्ध मैं उसे अपनी प्रणयिनी बनाने के लिए तैयार न था। इस विषय में मैं स्वेच्छा के सिद्धांत का कायल था। इसलिए मैं केशव की विरक्ति और क्षोभ से आशातीत आनन्द न उठा सका। हम दोनों ही दुःखी थे और मुझे पहली बार केशव से सहानुभूति हुई। मैं लज्जावती से केवल इतना पूछा चाहता था कि उसने मुझे क्यों नजरों से गिरा दिया। पर उसके सामने ऐसे नाजुक क्षणों को छेड़ते हुए मुझे संकोच होता था, और यह स्वाभाविक था, क्योंकि कोई रमणी अपने अंतःकरण के रहस्यों को नहीं खोल सकती। लेकिन शायद लज्जावती इस परिस्थिति को मेरे सामने प्रकट करना अपना कर्तव्य समझ रही थी। वह इसका अवसर ढूंढ रही थी। संयोग से उसे शीघ्र ही अवसर मिल गया।

संध्या का समय था। केशव राजपूत हॉस्टल में साम्यवाद पर एक व्याख्यान देने गया हुआ था। प्रोफेसर भाटिया उस जलसे के प्रधान थे। लज्जा अपने बंगले में अकेली बैठी हुई थी। मैं अपने अशांत हृदय के भाव छिपाए हुए, शोक और नैराश्य की दाह से जलता हुआ उसके समीप आकर बैठ गया। लज्जा ने मेरी ओर एक उड़ती हुई निगाह डाली और सहृदय भाव से बोली – कुछ चिंतित जान पड़ते हो?

मैंने कृत्रिम उदासीनता से कहा – तुम्हारी बला से।

लज्जा – केशव का व्याख्यान सुनने नहीं गये।

मेरी आंखों से ज्वाला-सी निकलने लगी। जब्त करके बोला – आज सिर में दर्द हो रहा था।

यह कहते-कहते अनायास ही मेरे नेत्रों से आंसू की कई बूंदें टपक पड़ी। मैं अपने शोक को प्रदर्शित करके उसका करुणा पात्र बनना नहीं चाहता था। मेरे विचार में रोना स्त्रियों के ही स्वाभावनुकूल था। मैं उस पर क्रोध प्रकट करना चाहता था और निकल पड़े आंसू। मन के भाव इच्छा के अधीन नहीं होते।

मुझे रोते देखकर लज्जा की आंखों से आंसू गिरने लगे।

मैं कीना नहीं रखता, मलिन हृदय नहीं हूं लेकिन न मालूम क्यों लज्जा के रोने पर मुझे इस समय एक आनंद का अनुभव हुआ। उस शोकावस्था में भी मैं उस पर व्यंग्य करने से बाज न रह सका। बोला – लज्जा, मैं तो अपने भाग्य को रोता हूं। शायद तुम्हारे अन्याय की दुहाई दे रहा हूं लेकिन तुम्हारे आंसू क्यों?

लज्जा ने मेरी ओर तिरस्कार-भाव से देखा और बोली – मेरे आंसुओं का रहस्य तुम न समझोगे क्योंकि तुमने कभी समझने की चेष्टा नहीं की। तुम मुझे कटु वचन सुनाकर अपने चित्त को शांत कर लेते हो। मैं किसे जलाऊ? तुम्हें क्या मालूम है कि मैंने कितना आगा-पीछा सोचकर, हृदय को कितना दबाकर, कितनी रातें करवटें बदलकर और कितने आंसू बहाकर यह निश्चय किया है। तुम्हारी कुल-प्रतिष्ठा, तुम्हारी रियासत एक दीवार की भांति मेरे रास्ते में खड़ी है, उस दीवार को मैं पार नहीं कर सकती। मैं जानती हूं कि इस समय तुम्हें कुल प्रतिष्ठा और रियासत का लेशमात्र भी अरमान नहीं है। लेकिन यह भी जानती हूं कि तुम्हारा कालेज की शीतल छाया में पला हुआ साम्यवाद बहुत दिनों तक सांसारिक जीवन की लू और लपट को न सह सकेगा। उस समय तुम अवश्य अपने फैसले पर पछताओगे और कुढ़ोगे। मैं तुम्हारे लिए दूध की मक्खी और हृदय का कांटा बन जाऊंगी।

मैंने आर्द्र होकर कहा – जिन कारणों से मेरा साम्यवाद लुप्त हो जायेगा,क्या वह तुम्हारे साम्यवाद को छेड़ेगा?

लज्जा – हां, मुझे पूरा विश्वास है कि मुझ पर उनका जरा भी असर न होगा। मेरे घर में कमी रियासत नहीं रही और कुल की अवस्था तुम भली भांति जानते हो। बाबूजी ने केवल अपने अविरल परिश्रम और अध्यवसाय से यह पद प्राप्त किया है। मुझे वह नहीं भूला है, जब मेरी माता जीवित थी और बाबूजी 11 बजे रात को प्राइवेट ट्यूशन करके घर आते थे। तो मुझे रियासत और कुल-गौरव का अभिमान कभी हो नहीं सकता, उसी तरह जैसे तुम्हारे हृदय से वह अभिमान कभी मिट नहीं सकता। यह घमंड मुझे उसी दशा में होगा जब मैं स्मृतिहीन हो जाऊंगी।

मैंने उद्दंडता से कहा – कुल प्रतिष्ठा को तो मैं मिटा नहीं सकता, मेरे वश की बात नहीं है, लेकिन तुम्हारे लिए मैं आज रियासत को तिलांजलि दे सकता हूं।

लज्जा क्रूर मुस्कान से बोली – फिर वही भावुकता? अगर यह बात तुम किसी अबोध बालिका से करते तो कदाचित् वह फूली न समाती। मैं एक ऐसे गहन विषय में, जिस पर दो प्राणियों के समस्त जीवन का सुख-दुःख निर्भर है, भावुकता का आश्रय नहीं ले सकती। शादी बनावट नहीं है। परमात्मा साक्षी है, मैं विवश हूं मुझे अभी तक स्वयं मालूम नहीं है कि मेरी डोंगी किधर जाएगी लेकिन मैं तुम्हारे जीवन को कंटकमय नहीं बना सकती।

मैं यहां से चला तो इतना निराश न था जितना सचिंत। लज्जा ने मेरे सामने एक नयी समस्या उपस्थित कर दी थी।

हम दोनों साथ-साथ एम.ए. हुए। केशव प्रथम श्रेणी में आया, मैं द्वितीय श्रेणी में। उसे नागपुर के एक कॉलेज में अध्यापक का पद मिल गया। मैं घर आकर अपनी रियासत का प्रबंध करने लगा। चलते समय हम दोनों गले मिलकर और रो कर विदा हुए। विरोध और ईर्ष्या को कॉलेज में छोड़ दिया।

मैं अपने प्रांत का पहला ताल्लुकेदार था जिसने एम.ए. पद प्राप्त किया हो। पहले तो राज्याधिकारियों ने मेरी खूब आवभगत की, लेकिन जब मेरे सामाजिक सिद्धांतों से अवगत हुए तो उनकी कृपा दृष्टि कुछ शिथिल पड़ गयी। मैंने भी उनसे मिलना-जुलना छोड़ दिया। अपना अधिकांश समय असामियों के ही बीच में व्यतीत करता।

पूरा साल भर भी न गुजरने पाया कि एक ताल्लुकेदार की परलोक यात्रा ने काउंसिल में एक स्थान खाली कर दिया। मैंने काउंसिल में जाने की अपनी तरफ से कोई कोशिश नहीं की। लेकिन काश्तकारों ने अपने प्रतिनिधित्व का भार मेरे ही सिर रखा। बेचारा केशव तो अपने कॉलेज में लेक्चर देता था, किसी को खबर भी न थी कि वह कहां है और क्या कर रहा है और मैं अपनी कुल मर्यादा की बदौलत काउंसिल का मेम्बर हो गया। मेरी वक्तृताएं समाचार-पत्रों में छपने लगी। मेरे प्रश्नों की प्रशंसा होने लगी है। काउंसिल में मेरा विशेष सम्मान होने लगा। कई सज्जन ऐसे निकल आए जो जनतावाद के भक्त थे। पहले वह परिस्थितियों से दबे हुए थे, अब वह खुल पड़े। हम लोगों ने लोकवादियों का अपना एक पृथक् दल बना लिया और कृषकों के अधिकारों को जोरों के साथ व्यक्त करना शुरू किया। अधिकांश भूपतियों ने मेरी अवहेलना की। कई सज्जनों ने धमकियां भी दीं लेकिन मैंने अपने निश्चित पथ को न छोड़ा। सेवा के इस सुअवसर को क्यों कर हाथ से जाने देता। दूसरा वर्ष समाप्त होते-होते जाति के प्रधान नेताओं में मेरी गणना होने लगी। मुझे बहुत परिश्रम करना, बहुत पढ़ना, बहुत लिखना और बहुत बोलना पड़ता पर जरा भी न घबराता। इस परिश्रमशीलता के लिए केशव का ऋणी था उसी ने मुझे उतना अभ्यस्त बना दिया था।