Haar Kee Jeet by Munshi Premchand
Haar Kee Jeet by Munshi Premchand

लज्जावती

सावित्री ने क्या सब कुछ जानते हुए भी सत्यवान से विवाह नहीं किया था? फिर मैं क्यों डरूं, अपने कर्तव्य-मार्ग से क्यों डिगू? मैं उनके लिए व्रत रखूंगी, तीर्थ करूंगी, तपस्या करूंगी। भय मुझे उनसे अलग नहीं कर सकता। मुझे उनसे कभी इतना प्रेम न था। कभी इतनी अधीरता न थी। यह मेरी परीक्षा का समय है और मैंने निश्चय कर लिया है। पिताजी अभी यात्रा से लौटे हैं, हाथ खाली है, कोई तैयारी नहीं कर सके हैं। इसलिए दो-चार महीनों के विलंब से उन्हें तैयारी करने का अवसर मिल जाता, पर मैं .अब विलम्ब न करूंगी। हम और वह इसी महीने में एक दूसरे के हो जायेंगे, हमारी आत्माएं सदा के लिए संयुक्त हो जायेंगी, फिर कोई विपत्ति, दुर्घटना मुझे उनसे अलग न कर सकेगी।

मुझे अब एक दिन की देर भी असह्य है। मैं रस्म और रिवाज की लौंडी नहीं हूं। न वही इसके गुलाम हैं। बाबूजी रस्मों के भक्त नहीं। फिर क्यों न तुरंत नैनीताल चलूं उनकी सेवा-सुश्रूषा करूं उन्हें ढाढस दूं। मैं उन्हें सारी चिंताओं से, समस्त विघ्न-बाधाओं से मुक्त कर दूंगी। इलाके का सारा प्रबंध अपने हाथों में लूंगी। काउंसिल के कामों में इतना व्यस्त हो जाने के कारण ही उनकी यह दशा हुई है। पत्रों में अधिकतर उन्हीं के प्रश्न, उनकी की आलोचनाएं, उन्हीं की वक्तृताएं दिखाई देती हैं। मैं उनसे याचना करूंगी कि कुछ दिनों के लिए काउंसिल से इस्तीफा दे दें, वह मेरा गाना कितने चाव से सुनते थे। मैं उन्हें अपने गीत सुनाकर प्रसन्न करूंगी, किस्से पढ़कर सुनाऊंगी, उनको समुचित रूप से शांत रखूंगी। इस देश में तो इस रोग की दवा नहीं हो सकती। मैं उनके पैरों पर गिरकर प्रार्थना करूंगी कि कुछ दिनों के लिए यूरोप के किसी सेनीटोरियम चलें और विधिपूर्वक इलाज करायें। मैं कल ही कॉलेज के पुस्तकालय से इस रोग के संबंध की पुस्तकें लाऊंगी और विचारपूर्वक उनका अध्ययन करूंगी। दो-चार दिन में कॉलेज बंद हो जायेगा। मैं आज ही बाबूजी से नैनीताल चलने की चर्चा करूंगी।

आह! मैंने कल इन्हें देखा तो पहचान न सकी। कितना सुर्ख चेहरा था कितना भरा हुआ शरीर। मालूम होता था, ईगुर भरी हुई, कितना सुंदर अंग-विन्यास था? कितना शौर्य था! तीन ही वर्षों में यह काया पलट हो गयी, मुख पीला पड़ गया है, शरीर घुलकर कांटा हो गया। आहार आधा भी नहीं रहा, हरदम चिंता में मग्न रहते हैं। कहीं आते-जाते नहीं देखती। इतने नौकर है, कितना सुरम्य स्थान है। विनोद के सभी सामान मौजूद हैं, लेकिन इन्हें अपना जीवन अब अंधकारमय जान पड़ता है। इस कलमुंही बीमारी का सत्यानाश हो। अगर इसे ऐसी ही भूख थी तो मेरा शिकार क्यों न किया। मैं बड़े प्रेम से इसका स्वागत करती। कोई ऐसा उपाय होता कि यह बीमारी इन्हें छोड़कर मुझे पकड़ लेती। मुझे देखकर कैसे खिल जाते थे और मैं मुस्कराने लगती थी। एक-एक अंग प्रफुल्लित हो जाता था, पर मुझे यहां दूसरा दिन है। एक बार भी उनके चेहरे पर हंसी न दिखाई दी। जब मैंने बरामदे में कदम रखा तब जरूर हंसे थे, किंतु कितनी निराश हंसी थी! बाबूजी अपने आंसुओं को न रोक सके। अलग कमरे में जाकर देर तक रोते रहे। लोग कहते है, काउंसिल में लोग केवल सम्मान-प्रतिष्ठ के लोभ से जाते हैं। उनका लक्ष्य केवल नाम पैदा करना होता है। बेचारे मेंबर पर यह कितना कठोर आक्षेप है, कितनी घोर कृतघ्नता। जाति की सेवा में शरीर को घुलाना पड़ता है, रक्त को जलाना पड़ता है। यही जात-सेवा का उपहार है।

पर यहां नौकरों को जरा भी चिंता नहीं है। बाबूजी ने इनके दो-चार मिलने वालों से बीमारी का जिक्र किया पर उन्होंने भी परवाह न की। यह मित्रों की सहानुभूति का हाल है। सभी अपनी-अपनी धुन में मस्त हैं, किसी को खबर नहीं कि दूसरों पर क्या गुजरती है। हां, इतना मुझे भी मालूम होता है कि इन्हें क्षय का केवल श्रम है। उसके कोई लक्षण नहीं देखती। परमात्मा करे, मेरा अनुमान ठीक हो। मुझे तो कोई और ही रोग मालूम होता है। मैंने कई बार टेम्प्रेरेचर लिया। उष्णता साधारण थी। उसमें कोई आकस्मिक परिवर्तन भी न हुआ। अगर यही बीमारी है तो अभी आरम्भिक अवस्था है, कोई कारण नहीं कि उचित प्रयत्न से उसकी जड़ न उखड़ जाये। मैं कल से ही इन्हें नित्य सैर कराने ले जाऊंगी। मोटर की जरूरत नहीं, फिटन पर बैठने से ज्यादा लाभ होगा। मुझे यह स्वयं कुछ लापरवाह से जान पड़ते है, इस मर्ज के बीमारों को बड़ी एहतियात करते देखा है। दिन में बीसों बार तो थर्मामीटर देखते हैं, पथ्यापथ्य का बड़ा विचार रखते हैं। वे फल, दूध और पुष्टिकारक पदार्थों का सेवन किया करते हैं। यह नहीं कि जो कुछ रसोइये ने अपने मन से बनाकर सामने रख दिया, वही दो-चार ग्रास खाकर उठ आए। मुझे तो विश्वास होता जाता है कि इन्हें कोई दूसरी ही शिकायत है। जरा अवकाश मिले तो इसका पता लगाऊं। कोई चिंता तो नहीं है? रियासत के कर्ज का बोझ तो नहीं हैं? थोड़ा बहुत कर्ज तो अवश्य ही होगा। यह तो रईसों की शान है। अगर कर्ज ही इसका मूल कारण है तो अवश्य कोई भारी रकम होगी।

चित्त विधियों चिंताओं से इतना दबा हुआ है कि कुछ लिखने को जी नहीं चाहता। मेरे समस्त जीवन की अभिलाषाएं मिट्टी में मिल गयी। हां हतभाग्य मैं अपने को कितनी खुशनसीब समझती थी। अब संसार में मुझसे ज्यादा बदनसीब और कोई न होगा। वह अमूल्य रत्न, जो मुझे चिरकाल की तपस्या और उपासना से न मिला, वह इस मृगनयनी सुंदरी को अनायास मिला जाता है। शारदा ने अभी उसे हाल में ही देखा है। कदाचित अभी तक उससे परस्पर बात-चीत करने की नौबत नहीं आयी। लेकिन उससे कितने अनुरक्त हो रहे हैं। उसके प्रेम में कैसे उन्मत्त हो गए हैं। पुरुषों को परमात्मा ने रूप नहीं दिया, केवल आंखें दी हैं। वह रूप की कद्र करना नहीं जानते, केवल रूप-रंग पर बिक जाते हैं। अगर मुझे किसी तरह विश्वास हो जाये कि सुशीला उन्हें मुझसे ज्यादा प्रसन्न रख सकेगी, उनके जीवन को अधिक सार्थक बना देगी, तो मुझे उसके लिए जगह खाली करने में जरा भी आपत्ति न होगी। वह इतनी गर्ववती, इतनी निष्ठुर है कि मुझे भय है कही शारदा को पछताना न पड़े।

लेकिन यह मेरी स्वार्थ-कल्पना है। सुशीला गर्ववती सही, निष्ठुर सही, विलासिनी सही, शारदा ने अपना प्रेम उस पर अर्पण कर दिया है। वह बुद्धिमान हैं, चतुर हैं, दूरदर्शी हैं, अपना हानि-लाभ सोच सकते हैं। उन्होंने सब कुछ सोचकर निश्चय किया होगा। जब उन्होंने मन में यह बात ठान ली तो मुझे कोई अधिकार नहीं है कि उनके सुख-मार्ग का कांटा बनूं। मुझे सब करके अपने मन को समझाकर यहां से निराश, हताश, भग्नहृदय विदा हो जाना चाहिए। परमात्मा से यही प्रार्थना है कि उन्हें प्रसन्न रखे। मुझे जरा भी ईर्ष्या, जरा भी दम्भ नहीं है। मैं तो उनकी इच्छाओं की चेरी हूं। अगर उन्हें मुझको विष दे देने से खुशी होती तो मैं शौक से विष का प्याला पी लेती। प्रेम ही जीवन का प्राण है। हम इसी के लिए जीना चाहते हैं। अगर इसके लिए मरने का भी अवसर मिले तो धन्य भाग। यदि केवल मेरे हट जाने से सब काम संवर सकते हैं तो मुझे कोई इंकार नहीं। हरि इच्छा! लेकिन मानव शरीर पाकर कौन माया-मोह से रहित होता है? जिस प्रेम-लता को मुद्दतों से पाला था, आंसुओं से सींचा था, उनको पैरों तले रौंदा जाना नहीं देखा जाता। हृदय विदीर्ण हो जाता है। अब कागज तैरता हुआ जान पड़ता है, आंसू उमड़े चले आते हैं, कैसे मन को खींचूं। हा! जिसे, अपना समझती थी, जिसके चरणों पर अपने को भेंट कर चुकी थी, जिसके सहारे जीवन-लता पल्लवित हुई थी, जिसे हृदय-मंदिर में पूजती थी, जिसके ध्यान में मग्न हो जाना जीवन का सबसे प्यारा काम था, उससे अब अनंत काल के लिए वियोग हो रहा है। आह! किससे अब फरियाद करूं? किसके सामने जाकर रोऊं, किससे अपनी दुःख-कथा कहूं। मेरा निर्जल हृदय यह वज्राघात नहीं सह सकता। यह चोट मेरी जान लेकर छोड़ेगी। अच्छा ही होगा। प्रेम-विहीन हृदय के लिए संसार काल-कोठरी है, नैराश्य और अंधकार से भरी हुई है। मैं जानती हूं अगर आज बाबूजी उनसे विवाह के लिए जोर दें तो वह तैयार हो जायेंगे, बस मुरव्वत के पुतले हैं। केवल मेरा मन रखने के लिए अपनी जान पर खेल जायेंगे। वह उन शीलवान पुरुषों में हैं जिन्होंने ‘नहीं’ करना ही नहीं सीखा। अभी तक उन्होंने दीवान साहब से सुशीला के विषय में कोई बातचीत भी नहीं की। शायद मेरा रुख देख रहे हैं। इसी असमंजस ने उन्हें इस दशा को पहुंचा दिया है। वह मुझे हमेशा प्रसन्न रखने की चेष्टा करेंगे। मेरा दिल कभी न दुखायेंगे, सुशीला की चर्चा भूलकर भी न करेंगे। मैं उनके स्वभाव को जानती हूं। वह नर-रत्न हैं लेकिन मैं उनके पैरों की बेड़ी नहीं बनना चाहती। जो कुछ बीते अपने ही ऊपर बीते, उन्हें क्यों समेटे डूबना ही है तो आप क्यों न डूबूं। उन्हें अपने साथ क्यों डुबाऊं।

यह भी जानती हूं कि यदि इस शोक ने घुला-घुला कर मेरी जान ले ली तो यह अपने को कभी क्षमा न करेंगे। उनका समस्त जीवन क्षोभ और ग्लानि की भेंट हो जायेगा, उन्हें कभी शांति न मिलेगी। कितनी विकट समस्या है। मुझे मरने की भी स्वाधीनता नहीं। मुझे इनको प्रसन्न रखने के लिए अपने को प्रसन्न रखना होगा। इनसे निष्ठुरता करनी पड़ेगी। त्रियाचरित्र खेलना पड़ेगा। दिखाना पड़ेगा कि इस बीमारी के कारण अब विवाह की बातचीत अनर्गल है। वचन को तोड़ने का अपराध अपने सिर लेना पड़ेगा। इसके सिवाय उद्धार की और कोई व्यवस्था नहीं? परमात्मा मुझे बल दो कि इस परीक्षा में सफल हो जाऊं।

शारदाचरण

एक ही निगाह ने निश्चय कर दिया। लज्जा ने मुझे जीत लिया। एक ही निगाह से सुशीला ने भी मुझे जीता था। उस निगाह में प्रबल आकर्षण था, एक मनोहर सारत्य, एक आनन्दोद्गार, जो किसी भांति छिपाये नहीं छिपता था, एक बालोचित उल्लास, मानों उसे कोई खिलौना मिल गया हो। लज्जा की चितवन में क्षमा थी और थी करुणा, नैराश्य तथा वेदना। वह अपने को मेरी इच्छा पर बलिदान कर रही थी। आत्म-परिचय में उसे सिद्धि है। उसने अपनी बुद्धिमानी में सारी स्थिति ताड़ ली और तुरंत फैसला कर लिया। वह मेरे सुख में बाधक नहीं बनना चाहती थी। उसके साथ ही यह भी प्रकट करना चाहती थी कि मुझे तुम्हारी परवाह नहीं है। अगर तुम मुझसे जौ भर खिंचोगे तो में तुमसे गज भर खिंच जाऊंगी। लेकिन मनोवृत्तियां सुगंध के समान हैं जो छिपाने से नहीं छिपती। उसकी निष्ठुरता में नैराश्यमय वेदना थी, उसकी मुस्कान में आंसुओं की झलक। वह मेरी निगाह बचाकर क्यों रसोई में चली जाती थी और कोई-न-कोई पाक, जिसे वह जानती है कि मुझे रुचिकर है, बना लेती थी? वह मेरे नौकरों को क्यों आराम से रखने की गुप्त रीति से ताकीद किया करती थी? समाचार पत्रों को क्यों मेरी निगाह से छिपा दिया करती थी? क्यों संध्या समय मुझे सैर करने को मजबूर किया करती थी? उसकी एक-एक बात उसके हृदय का परदा खोल देती थी। उसे कदाचित् मालूम नहीं है कि आत्म-परिचय रमणियों का विशेष गुण नहीं। उस दिन जब प्रोफेसर भाटिया ने बातों-ही-बातों में मुझ पर व्यंग्य किये, मुझे वैभव और सम्पत्ति का दास कहा और मेरे साम्यवाद की हंसी उड़ानी चाही तो उसने कितनी चतुरता से बात टाल दी। पीछे से मालूम नहीं उनसे क्या कहा, पर मैं बरामदे में बैठा सुन रहा था कि बाप और बेटी बगीचे में बैठे हुए किसी विषय पर बहस कर रहे है। कौन ऐसा हृदयशून्य प्राणी है जो निष्काम सेवा के वशीभूत न हो जाये। लज्जावती को मैं बहुत दिनों से जानता हूं। पर मुझे ज्ञात हुआ कि इस मुलाकात में मैंने उसका यथार्थ रूप देखा। पहले मैं उसकी रूप राशिका, उसके उदार विचारों का, उसकी मृदुवाणी का भक्त था। उसकी उज्ज्वल, दिव्य आत्म-ज्योति मेरी आंखों से छिपी हुई थी। मैंने अबकी ही जाना कि उसका प्रेम कितना गहरा, कितना पवित्र, कितना अगाध है। इस अवस्था में कोई दूसरी स्त्री ईर्ष्या से बावली हो जाती, मुझसे नहीं तो सुशीला से तो अवश्य ही जलने लगती, आप कुढ़ती। पर लज्जा ने जितने विशुद्ध प्रेम-भाव से सुशीला का स्वागत किया, वह मुझे कभी न भूलेगा – मालिन्य, संकीर्णता, कटुता का लेश न था। इस तरह सुशीला इस व्यवहार पर मानों मुग्ध हो गयी। आह! वह दृश्य भी चिरस्मरणीय है, जब लज्जावती मुझसे विदा होने लगी। प्रोफेसर भाटिया मोटर पर बैठे हुए थे। लज्जा एक उज्ज्वल साड़ी पहने हुए मेरे सम्मुख आकर खड़ी हो गयी। वह एक तपस्विनी थी, जिसने प्रेम पर अपना जीवन अर्पण कर दिया हो, श्वेत पुष्पों की माला थी जो किसी देवमूर्ति के चरणों पर पड़ी हुई हो! उसने मुस्कराकर मुझसे कहा – कभी-कभी पत्र लिखते रहना, इतनी कृपा की मैं अपने को अधिकारिणी समझती हूं। मैंने जोश से कहा – हां, अवश्य।

लज्जावती ने फिर कहा – शायद यह हमारी अंतिम भेंट हो। न जाने मैं कहां रहूंगी, कहां जाऊंगी, फिर कभी आ सकूंगी या नहीं। मुझे बिलकुल भूल न जाना। अगर मेरे मुंह से कोई ऐसी बात निकल आयी हो जिससे तुम्हें दुःख हुआ हो तो क्षमा करना और… अपने स्वास्थ्य का बहुत ध्यान रखना।

यह कहते हुए उसने मेरी तरफ हाथ बढ़ाये। हाथ कांप रहे थे। कदाचित आंखों में आंसुओं का आवेग हो रहा था। वह जल्दी से कमरे के बाहर निकल जाना चाहती थी। अपने जब्त पर अब उसे भरोसा न था। उसने मेरी ओर दबी आंखों से देखा। मगर इस अर्द्ध चितवन में दबे हुए पानी का वेग और प्रवाह था। ऐसे प्रवाह में मैं स्थिर न रह सका। इस निगाह ने हारी हुई बाजी जीत ली, मैंने उसके दोनों हाथ पकड़ लिये और गदगद स्वर से बोला – नहीं लज्जा, अब हममें और तुममें भी वियोग न होगा।

सहसा चपरासी ने सुशीला का पत्र लाकर सामने रख दिया। लिखा था–