प्रिय श्री शारदाचरण जी,
हम लोग कल यहां से चले जायेंगे। आज मुझे बहुत काम करना है? इसलिए मिल न सकूंगी। मैंने आज रात को अपना कर्तव्य स्थिर कर लिया? मैं लज्जावती के बने-बनाये घर को उजाड़ना नहीं चाहती। मुझे पहले यह बात न मालूम थी, नहीं तो हममें इतनी घनिष्ठता न होती। मेरा आपसे यही अनुरोध है कि लज्जा को हाथ से न जाने दीजिए। वह नारी-रत्न है। मैं जानती हूं कि मेरा रूप-संग उससे कुछ अच्छा है और कदाचित् आप उसी प्रलोभन में पड़ गये, लेकिन मुझमें वह त्याग, वह सेवा-भाव, वह आत्मोत्सर्ग नहीं है। मैं आपको प्रसन्न रख सकती हूं पर आपके जीवन को उन्नत नहीं कर सकती, उसे पवित्र और यशस्वी नहीं बना सकती। लज्जा देवी है, वह आपको देवता बना देगी? मैं अपने को इस योग्य नहीं समझती। मुझसे कल भेंट करने का विचार न कीजिए।
रोने-रुलाने से क्या लाभ क्षमा कीजिए?
आपकी
सुशीला
मैंने यह पत्र लज्जा के हाथ में रख दिया। वह पढ़कर बोली – मैं उससे आज ही मिलने जाऊंगी।
मैंने उसका आशय समझकर कहा – क्षमा करो, तुम्हारी उदारता की दूसरी बार परीक्षा नहीं लेना चाहता।
यह कहकर मैं प्रोफेसर भाटिया के पास गया। वह मोटर पर मुंह फुलाये बैठे थे। मेरे बदले लज्जावती आयी होती तो उस पर जरूर ही बरस पड़ते।
मैंने उनके पद स्पर्श किये और सिर झुकाकर बोला – आपने मुझे सदैव अपना पुत्र समझा है। अब उस नाते को और भी दृढ़ कर दीजिए।
प्रोफेसर भाटिया ने पहले तो मेरी ओर अविश्वासपूर्ण नेत्रों से देखा तब मुस्कराकर बोले – यह तो मेरे जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा थी।
