gareebon kee haay by munshi premchand
gareebon kee haay by munshi premchand

मनुष्य के मन और मस्तिष्क पर भय का जितना प्रभाव होता है उतना और किसी शक्ति का नहीं। प्रेम, चिंता, निराशा, हानि यह सब मन को अवश्य दुःखित करते हैं, पर यह हवा के हलके झोंके हैं और भय प्रचंड आधी है। मुंशीजी पर इसके बाद क्या बीती, मालूम नहीं। कई दिनों तक लोगों ने उन्हें कचहरी जाते और यहां से मुरझाए हुए लौटते देखा। कचहरी जाना उनका कर्त्तव्य था, और यद्यपि वहां मुवक्किल का अकाल था, तो भी तगादे वालों से गला छुड़ाने और उनको भरोसा दिलाने के लिए अब यही एक लटका रह गया था। इसके बाद कई महीने तक दिखे न। बद्रीनाथ चले गए। एक दिन गांव में एक साधु आया। भभूत रमाए, लम्बी जटाएं, हाथ में कमंडल। उसका चेहरा मुंशी रामसेवक से बहुत मिलता-जुलता था। बोल-चाल में भी अधिक अंतर न था। वह एक पेड़ के नीचे धूनी रमाए बैठा रहा। उसी रात को मुंशी रामसेवक के घर से धुआं उठा, फिर आग की ज्वाला दीखने लगी और आग भड़क उठी। गांव के सैकड़ों आदमी दौड़े। आग बुझाने के लिए नहीं तमाशा देखने के लिए। एक गरीब की हाय में कितना प्रभाव है। रामगुलाम मुंशीजी के गायब हो जाने पर अपने मामा के यहां चला गया और वहां कुछ दिनों रहा। पर वहां उसकी चाल-ढाल किसी को पसंद न आयी ।

एक दिन उसने किसी के खेत में मूली नोची। उसने दो-चार धौल लगाए। उस पर वह इस कदर बिगड़ा कि उसके खड़े खलिहान में उसने आग लगा दी। सारा-का सारा खलिहान जलकर खाक हो गया। हजारों रुपयों का नुकसान हुआ। पुलिस ने तहकीकात की, रामगुलाम पकड़ा गया। इसी अपराध में वह चनार के रिफार्मेटरी स्कूल में मौजूद है।