dussaahas by munshi premchand
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मुंशी – सच कहा है, गंवार भेड़ होते हैं।

बेचन – आप शेर हो जाएं, हम भेड़ ही बने रहेंगे।

मुंशीजी अकड़ते हुए शराब खाने में दाखिल हुए। दुकान पर उदासी छाई हुई थी, कलवार अपनी गद्दी पर बैठा ऊंघ रहा था। मुंशीजी की आहट पाकर चौंक पड़ा, उन्हें तीव्र दृष्टि से देखा मानो यह कोई विचित्र जीव है, बोतल भर दी और ऊंघने लगा।

मुंशीजी गली के द्वार पर आये तो अपने साथियों को न पाया। बहुत से आदमियों ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया और निंदा सूचक बोलियां बोलने लगे।

एक ने कहा – दिलावर हो तो ऐसा हो।

दूसरा बोला – शर्मचे कुत्तीस्त के पेशे मरदां बिवाअद (मर्दों के सामने लज्जा नहीं आ सकती)

तीसरा बोला – है कोई पुराना पियक्कड़ पक्का लतियल।

इतने में थानेदार साहब ने आकर भीड़ हटा दी। मुंशीजी ने उन्हें धन्यवाद दिया और घर चले। एक कांस्टेबल भी रक्षार्थ उनके साथ चला।

मुंशीजी के चारों मित्रों ने बोतलें फेंक दी और आपस में बातें करते हुए चले।

झिनकू – एक बेर हमारा एक्का बेगार में पकड़ जात रहे तो यही स्वामी जी चपरासी से कह-सुन के छुड़ाय दिहेन रहें।

रामबली – पिछले साल जब हमारे घर में आग लगी थी, तब भी तो यही सेवा-समिति वालों को लेकर पहुंच गए थे, नहीं तो घर में एक सूत न बचता।

बेचन – मुख्तार अपने सामने किसी को गिनते ही नहीं। आदमी कोई बुरा काम करता है तो छिपा के करता है, यह नहीं कि बेहयाई पर कमर बांध ले।

झिनकू – भाई, पीठ पीछे कोऊ की बुराई न करै चाही। और जोन कुछ होय पर आदमी बड़ा अकबाली है। उतने आदमियन के बीच मां कैसा घुसत चला गवा।

रामबली – यह कोई अकबाल नहीं है। थानेदार न होता तो आटे-दाल का भाव मालूम हो जाता।

बेचन – मुझे तो कोई पचास रुपये देता तो भी गली में पैर न रख सकता शर्म से सिर ही नहीं उठा था।

ईदू – इनके साथ आकर आज बड़ी मुसीबत में फंस गया। मौलाना जहां देखेंगे वहां आड़े हाथों लेंगे। दीन के खिलाफ ऐसा काम क्यों करे कि शर्मिंदा होना पड़े। मैं तो आज मारे शर्म के गड़ गया। आज तोबा करता हूं। अब इसकी तरफ आंख उठाकर भी न देखूंगा।

रामबली – शराबियों की तोबा कच्चे धागे से मजबूत नहीं होती।

ईदू – अगर फिर कभी मुझे पीते देखना तो मुंह में कालिख पोत देना।

बेचन – अच्छा तो इसी बात पर आज से मैं भी इसे छोड़ देता हूं। अब पीऊं तो गऊ-रक्त बराबर।

छिनकू – तो का हम ही सब से पापी हन। फिर कभू जों इसका पियत देख्यो बैठाय के पचास जूता लगायें।

रामबली – अरे जा, अभी मुंशी बुलायेंगे तो कुत्ते की तरह दौड़ते हुए जाओगे।

झिनकू – मुंशीजी के साथ बैठे देख्यों तो सौ जूता लगायो, जिनके बात मैं फरक है, उनके बाप में फरक है।

रामबली – तो भाई मैं भी कसम खाता हूं कि आज से गांठ के पैसे निकाल कर न पीऊंगा। हां, मुफ्त की पीने में इनकार नहीं।

बेचन – गांठ के पैसे तुमने कभी खर्च किए हैं?

इतने में मुंशी मैकूलाल लपके हुए आते दिखाई दिए। यद्यपि वह बाजी मार कर आये थे, मुख पर विजय गर्व की जगह खिसियानापन छाया हुआ था। किसी अव्यक्त कारणवश वह इस विजय का हार्दिक आनन्द न उठ सकते थे। हृदय के किसी कोने में छिपी हुई लज्जा उनसे चुटकियां ले रही थी। वह स्वयं अज्ञात थे, पर उस दुस्साहस का खेद उन्हें व्यथित कर रहा था।

रामबली ने कहा – आइए मुख्तार साहब, बड़ी देर लगायी।

मुंशी – तुम सब-के-सब गावदी ही निकले, एक साधु के चकमे में आ गये।

रामबली – इन लोगों ने तो आज से शराब पीने की कसम खा ली है।

मुंशी – ऐसा तो मर्द ही नहीं देखा जो एक बार इसके चंगुल में फंसकर निकल जाये? मुंह से बकना दूसरी बात है।

ईदू – जिंदगी रही तो देख लीजिएगा।

झिनकू दाना-पानी तो कोऊ से नाहीं छूट सकत है और बातन का जब मनमा अबे छोड़ देव। बस चोट लग जाये का चाही, नशा खाये बिना कोऊ मर नाहीं जात है।

मुंशी – देखूंगा तुम्हारी बहादुरी थी।

बेचन – देखना क्या है, छोड़ देना कोई बड़ी बात नहीं। यही न होगा कि दो-चार दिन जी सुस्त रहेगा। लड़ाई में अंग्रेजों ने छोड़ दिया था, जो इसे पानी की तरह पीते हैं तो हमारे लिये कोई मुश्किल काम नहीं।

यही बातें करते हुए मुख्तार के मकान पर आ पहुंचे।