दीवान खाने में सन्नाटा था। मुवक्किल चले गये थे। अलगू पड़ा सो रहा था। मुंशीजी मसनद पर जा बैठे और आलमारी से गिलास निकालने लगे। उन्हें अभी तक अपने साथियों की प्रतिज्ञा पर विश्वास न आता था। उन्हें पूरा यकीन था कि शराब की सुगंध और लालिमा देखते ही सभी की तोबा टूट जाएगी। जहां मैंने जरा बढ़ावा दिया, वहीं सब-के-सब आकर डट जायेंगे और महफिल जम जाएगी। जब ईदू सलाम करके चलने लगा और झिनकू ने अपना डंडा संभाला तो मुंशीजी ने दोनों के हाथ पकड़ लिए और बड़े मृदुल शब्दों में बोले – यारों, यों साथ छोड़ना अच्छा नहीं। आओ, जरा आज इसका मजा तो चखो, खास तौर पर अच्छी है।
मुंशी – अजी आओ, तो, इन बातों में क्या धरा है?
ईदू – आप ही को मुबारक रहे, मुझे जाने दीजिए।
झिनकू – हम तो भगवान् चाही तो एके नियर न जाब, जूता कौन खाय?
यह कहकर दोनों अपने-अपने हाथ छुड़ाकर चले गये तब मुख्तार साहब ने बेचन का हाथ पकड़ा जो बरामदे से नीचे उतर रहा था, बोले – बेचन क्या तुम भी बेवफाई करोगे?
बेचन – मैंने तो बड़ी कसम खायी है। जब एक बार इसे गऊ-रक्त कह चुका तो फिर इसकी ओर ताक भी नहीं सकता। कितना ही गया-बीता हूं तो क्या गऊ-रक्त की लाज भी न रखूंगा। अब आप भी छोड़िए कुछ दिन राम-राम कीजिए। बहुत दिन तो पीते हो गये। यह कहकर वह भी सलाम करके चलता हुआ। अब अकेले रामबली रह गया। मुंशीजी ने उससे शोकातुर होकर कहा – देखो रामबली, इन सबों की बेवफाई? यह लोग ऐसे ढुलमुल होंगे, मैं न जानता था। आओ आज हमीं तुम सही। दो सच्चे दोस्त ऐसे दरजनों कचलोहियों से अच्छे हैं। आओ बैठ जाओ।
रामबली – मैं तो हाजिर ही हूं लेकिन मैंने भी कसम आयी है कि कभी कांठ कै पैसे खर्च करके न पीऊंगा।
मुंशी – अजी, जब तक मेरे दम-में-दम है, तुम जितना चाहो पियो, गम क्या है।
रामबली – लेकिन आप न रहें तब? ऐसा सज्जन फिर कहां पाऊंगा।
मुंशी – अजी तब देखी जाएगी, मैं आज मरा थोड़े ही जाता हूं।
रामबली – जिन्दगी का कोई एतबार वहीं, आप मुझसे पहले जरूर ही मरेंगे, तो उस वक्त मुझे कौन रोज पिलाएगा नहीं, तब तो छोड़ भी न सकूंगा। इससे बेहतर यही है कि अभी से फिक्र करूं।
मुंशी – यार ऐसी बातें करके दिल न छोटा करो। आओ बैठ जाओ, एक ही गिलास ले लेना।
रामबली – मुख्तार साहब, अब ज्यादा मजबूर न कीजिए। जब ईदू और झिनकू जैसे लतियों ने कसम खा ली जो औरतों के गहने बेच-बेच पी गये और निरे मूर्ख हैं, तो मैं इतना निर्लज्ज नहीं हूं कि इसका गुलाम बना रहूं। स्वामी जी ने मेरा सर्वनाश होने से बचाया है। उसकी आज्ञा मैं किसी तरह नहीं टाल सकता। यह कहकर रामबली भी विदा हो गया।
मुंशीजी ने प्याला मुंह से लगाया, लेकिन दूसरा प्याला भरने से पहले उनकी मद्यातुरता गायब हो गयी थी। जीवन में यह पहला अवसर था कि उन्हें एकांत में बैठकर दवा की भांति शराब पीनी पड़ी। पहले वो सहवासियों पर झुंझलाए। दगाबाजों को सैकड़ों रुपये खिला दिए होंगे, लेकिन आज जरा-सी बात पर सब-के-सब फिरंट हो गये। अब मैं भूत भांति अकेला पड़ा हुआ हूं कोई हंसने-बोलने वाला नहीं। यह तो सोहबत की नजर है, जब सोहबत का आनन्द ही न रहा तो पीकर खाट पर पड़े रहने से क्या फायदा?
मेरा कितना अपमान हुआ! जब मैं गली में घुसा हूं तो सैकड़ों ही आदमी मेरी ही ओर आग्नेय दृष्टि से ताक रहे थे। शराब लेकर लौटा हूं तब तो लोगों का वश चलता तो मेरी बोटियां नोंच खाते। थानेदार न होता तो घर तक आना मुश्किल था। यह अपमान और लोकनिंदा किसलिए? इसलिए कि घड़ी भर बैठकर मुंह कड़वा करूं और कलेजा जलाऊ। कोई हंसी चुहल करने वाला तक नहीं।
लोग इसे कितनी त्याज्य-वस्तु समझते हैं, इसका अनुभव मुझे आज ही हुआ, नहीं तो एक संन्यासी के जरा-से-इशारे पर बरसों के लत्ती पियक्कड़ यों मेरी अवहेलना न करते। बात यही है कि अंतःकरण से सभी इसे निषिद्ध समझते है। जब मेरे साथ के ग्वाले, इक्केवान, कहार तक इसे त्याग सकते हैं तो क्या मैं उनसे भी गया गुजरा हूं? इतना अपमान सहकर, जनता की निगाह में पतित होकर, सारे शहर में बदनाम होकर, नक्कू बनकर एक क्षण के लिए सिर में सरूर पैदा कर लिया तो क्या काम किया? कुवासना के लिए आत्मा को इतनी नीचे गिराना क्या अच्छी बात है। यह चारों इस घड़ी मेरी निंदा कर रहे होंगे, मुझे दुष्ट बना रहें होंगे, मुझे नीच समझ रहे होंगे। इन नीचों की दृष्टि में मैं नीचा हो गया। यह दुरावस्था नहीं सही जाती। आज इस वासना का अंत कर दूंगा, अपमान का अंत कर दूंगा।
एक क्षण में धड़ाके की आवाज हुई। अलगू चौंक कर उठा तो देखा कि मुंशीजी बरामदे में खड़े हैं और बोतल जमीन पर टूटी पड़ी है।
