Hindi Kahani: बात उन दोनों की है, जब मेरा बेटा इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहा था l उन्हीं दिनों में मेरी पूज्यनीय सास हर महीने मथुरा ,परिक्रमा करने जाया करती थीं।
एक बार वह मथुरा से आईं ,साथ में कुछ देशी घी लेकरआईंl उन्होंने वह घी रसोई घर में लाकर रख दिया l जब मैं उस घी को उठा कर रखने लगी ,तो वह मुझसे बोली इस घी को तुम खाना बनाने में प्रयोग मत करना l
मुझे बड़ा ही अजीब लगा …मैंने उसका कारण भी नहीं पूछा ,और वह घी वही रखा रहने दियाl
यूं तो हम सास बहू में कई बार शीत युद्ध हो जाया करता था और दोनों के स्वाभिमान या यूं कहे ,झूठे अहंकार का टकराव भी हो जाया करता था…. लेकिन हम दोनों के बीच कभी भी खाने पीने की चीजों को लेकर किसी तरह का तनाव नहीं हुआl वह भी मेरी आदत भली-भांति जानती थी ,कि मैं सबको खिलाकर ही खाती थी …और वह भी अपने मुंह का निवाला भी मुझे दे देती थींl लेकिन जब उन्होंने घी के प्रयोग करने की माना की, तो मैंने भी तुनक कर उस घी को वही रखा रहने दिया …और सोचने लगी कि पता नहीं इनको इतने घी का
क्या ही करनाl
दरअसल वह घी से अपने शरीर की मालिश भी किया करती थीं…तो मुझे लगा हो सकता है ,वह गांव का शुद्ध घी अपने शरीर की मालिश के लिए ही लाई हों l
थोड़ी देर बाद ही मेरा बेटा आया और उसने अम्मा के चरण स्पर्श किए l अम्मा ने बड़े ही स्नेह से पोते के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा… बेटा, मैं तुम्हारे लिए विशुद्ध गाय का घी लाई हूं ,तुम बहुत मेहनत करते हो …गाय का घी मस्तिष्क के लिये अच्छा होता है।अब इस घी को तुम खाना …जिससे तुम्हारे दिमाग को शक्ति और ठंडक मिलेगी।
बेटा भी बड़े स्नेह व आदर से बोला ,हां अम्मा मैं खा लूंगा l
दादी पोते की स्नेह भरी बात सुनकर मैं सोच रही थी कि जब तक पूरी बात पता न हो हमें किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचना चाहिये।
आज भी जब ये बात याद आती है तो मैं मुस्कुराए बिना नहीं रह पाती हूँ.. साथ ही प्रेरणा भी लेती हूँ कि पूर्ण सत्य जानकार ही ,सोच को आगे बढ़ाना चाहिये।
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