एक महिला दीन-हीन अवस्था में घायल होकर सड़क के एक ओर पड़ी कराह रही थी। उसके पास ही उसका शिशु भूख के कारण लगातार रोए जा रहा था। अनेक लोग उधर से गुजर रहे थे, लेकिन दो मिनट रुककर उसको दिलासा देने वाला कोई भी नहीं था।
वहाँ से गुजरने वाला हर कोई बस इतना ही कहता- “न जाने कौन है? तभी एक बग्घी उधर से गुजरी और महिला के कराहने का स्वर सुनकर उसके निकट जा रुकी। एक व्यक्ति नीचे उतरा और जल्दी-जल्दी चलकर उस महिला व शिशु को उठाया और बग्घी में ला बैठाया। उसने कहा, ‘कोचवान! बग्घी अस्पताल की ओर मोड़ लो।” “लेकिन, आपको तो समारोह में जाना है, वहाँ पहुँचने में विलंब हो जाएगा।” कोचवान ने झिझकते हुए कहाः ‘अरे भाई, समारोह से ज्यादा आवश्यक मानव सेवा है।
कोचवान चुप हो गया और कुछ ही देर बाद बग्घी अस्पताल के बाहर खड़ी थी। उस व्यक्ति ने महिला को अस्पताल में भर्ती करा दिया। करीब आधा घंटे बाद महिला की स्थिति कुछ सुधरी, तो उस व्यक्ति ने उसे कुछ रुपए दिए और बग्घी में बैठकर समारोह में भाग लेने चला गया। वह व्यक्ति कोई अन्य नहीं पंडित मदनमोहन मालवीय थे।
ये कहानी ‘इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं– Indradhanushi Prerak Prasang (इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग)
