Parlour
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Hindi Kahaniya: सुबह की सुनहरी धूप छन कर श्यामलाल जी की गैलरी व झरोखे से होते हुए उनके कमरे में अपनी रौशनी बिखेर रही थी. श्यामलाल जी अपने जमाने के सुप्रसिद्ध गीत “उड़ी जब जब जुल्फें तेरी…” गुनगुनाते हुए अपने बालों को संवार रहे थे तभी गृह सहायिका भंवरी उनके कमरे में दाखिल हुई और बोली-

  “बाबू जी आपका चाय नाश्ता यहां कमरे में ला दूं या डायनिंग टेबल पर लगा दूं.” श्यामलाल जी स्वयं को आईने में देखते हुए और अपने शर्ट का कॉलर ठीक करते हुए बोले-

 “तुम नाश्ता डायनिंग टेबल पर लगा दो, आज संडे है, नाश्ता सब के साथ करेंगे. रोज तो अकेले ही करते हैं.” श्यामलाल जी के इतना कहने पर भी भंवरी चुपचाप दरवाजे पर ही खड़ी रही. यह देख श्यामलाल जी ने कहा – “अरे क्या हुआ कुछ और कहना है…?” भंवरी धीरे से बोली – “बाबू जी वो घर पर तो कोई नहीं है. साब और मेमसाब सुबह ही शहर से बाहर कोई रिशॉर्ट है वहां के लिए निकल ग‌ए हैं और रोमी बाबा पढ़ाई करने के लिए अपने दोस्त के घर चले गए हैं. सभी घर देर रात तक लौटेंगे. मेमसाब ने कहा है आपको जो खाने में पसंद है वह मैं बना दूं.”

     भंवरी से इतना सुनते ही श्यामलाल जी का चमकता चेहरा पीला पड़ गया किन्तु क्षण भर में ही वह मुस्कुराते हुए बोले- 

 “कोई बात नही, तुम तो नाश्ता डायनिंग टेबल पर ही लगा दो, न्यूज देखते हुए नाश्ता कर लेंगे.”

“जी बाबू जी, आलू के पराठे बनाए हैं” कहते हुए भंवरी वहां से चली गई.

    श्यामलाल जी की धर्मपत्नी को परलोक सिधारे पूरे एक वर्ष बीत चुके थे और श्यामलाल जी को सेवानिवृत्त हुए लगभग दो वर्ष होने जा रहा है. जब तक श्यामलाल जी की पत्नी जीवित थी दोनों पति-पत्नी एक-दूसरे का सहारा थे. सुबह की चाय से लेकर रात का खाना, दोनों संग में ही किया करते थे. श्यामलाल जी को कभी भी अकेलेपन का एहसास नहीं हुआ. बेटा, बहू और पोता तो तब भी अपनी ही दुनियां में खोए रहते थे लेकिन तब कभी भी श्यामलाल जी को यह बात नहीं कचोटी कि उनके संग कोई बोलने बतियाने वाला या साथ बैठ कर चाय पीने वाला नहीं है क्योंकि हर वक्त उनकी पत्नी उनके साथ हुआ करती थी किन्तु पत्नी के जाने के बाद श्यामलाल जी अपने ही घर पर स्वयं को उपेक्षित व तन्हा महसूस करने लगे थे. 

  श्यामलाल जी का बेटा संजय और बहू अलका दोनों ही कामकाजी हैं. हमेशा अपने काम में व्यस्त रहते हैं और वीकेंड सेलीब्रेशन ने नाम पर हर सप्ताह घर से बाहर निकल जाते हैं. पोता भी अपने कॉलेज, दोस्तों व पढ़ाई में लगा रहता है, श्यामलाल जी घर पर अकेले रह जाते हैं. उम्र का यह पड़ाव कुछ ऐसा ही होता है. श्यामलाल जी भी समझते हैं, वह जानते हैं कि उम्र के जिस दौर से वह गुजर रहे हैं वहां हमउम्र मित्रों का होना जरूरी है क्योंकि आजकल की युवा पीढ़ी के साथ वह कदम से कदम मिलाकर चल तो सकते हैं किन्तु दौड़ नहीं सकते. उनके सोच-विचार और खान पान में अंतर होना भी स्वाभाविक है इसलिए उन्होंने कुछ ही दिन पहले शहर में स्थित टाकिंग पार्लर ज्वाइन कर लिया है जहां उनके जैसे और भी कई बुजुर्ग केवल बातें करने के लिए आया करते हैं. यहां आने वाले क‌ई बुजुर्ग ऐसे हैं जिनके पास कहने को तो भरा-पूरा परिवार है, रूपए पैसों की भी कोई कमी नहीं है परन्तु घर पर बात करने वाला कोई नहीं है. सारा दिन सूने घर और चारदीवारी को ताकते रहना उनकी मजबूरी बन गई है.

     नाश्ता करते हुए श्यामलाल जी ने भंवरी से कहा –

     ” भंवरी तुम कुछ पराठे और दही टिफिन में पैक कर दो, मैं पार्लर जा रहा हूं वहीं खा लूंगा.”

      पार्लर शब्द सुनते ही भंवरी के कान खड़े हो गए. वह टिफिन पैक करते हुए यह सोचने लगी कि आखिर बाबू जी पार्लर क्यों जा रहे हैं जेन्ट्स तो सलून जाते हैं, असल में वह केवल एक ही पार्लर के बारे में जानती थी और वह था ब्यूटी पार्लर लेकिन श्यामलाल जी से पूछने की वह हिम्मत ना जुटा पाई. श्यामलाल जी नाश्ता करने के बाद पार्लर चले गए. 

  ‌‌   पार्लर को लेकर भंवरी के मन में जिज्ञासा की लहरें उठने लगी जो अभी तक शांत भी नहीं हुई थी कि दूसरे दिन फिर श्यामलाल जी ने नाश्ते के बाद भंवरी से टिफिन पैक करने और पार्लर जाने की बात कह कर घर से निकल गए. इस तरह पूरा एक सप्ताह बीत गया और भंवरी के भीतर यह जानने की तीव्र इच्छा जागृत होने लगी कि आखिर श्यामलाल जी हर रोज पार्लर क्यों जाते हैं और पार्लर में जाकर वह पूरा दिन करते क्या होंगे. 

    भंवरी से रहा नहीं गया, वह श्यामलाल जी से पूछने की साहस तो कर नहीं पाई इसलिए इस रविवार उसने श्यामलाल जी की बहू को सारी बातें बताने और जानने की मनसा से घर का काम करते हुए बड़े ही भोलेपन व सहजता से बोली- 

  ‌    “मेमसाब हर रोज बाबू जी पार्लर क्यों जाते हैं..?” 

 ” पार्लर….!” अलका ने आश्चर्य से कहा

अनगिनत आशंकाएं व सवालों के भाव अपने चेहरे पर लाती हुई भंवरी बोली –

    ” हां मेमसाब सुबह से लेकर शाम तक बाबू जी पार्लर में ही रहते हैं दोपहर का खाना भी क‌ई बार वहीं खाते हैं.”

    इतना सुनते ही अलका सख्ते में आ गई. उसे लगा बाबू जी इस उम्र में कहीं बहक तो नहीं गए हैं इसलिए मसाज पार्लर जा रहे हैं. यह विचार मन में आते ही अलका सीधे अपने पति संजय जो वरांडे में अखबार पर नजरें गड़ाए बैठे हुए थे उनसे सारी बातें बताते हुए बोली-

” चलिए चलकर बाबूजी से पूछिए कि वह हर रोज मसाज पार्लर क्यों जाते हैं.” 

  मसाज पार्लर सुनते ही संजय भी चौंक गया,  आजकल मसाज पार्लर के आड़ में किस तरह के कृत्य होते हैं इस बात से वह भी अनभिज्ञ नहीं था, बिना कुछ सोचे-समझे वह तमतमाता हुआ श्यामलाल जी के कमरे की ओर बढ़ा उसके पीछे अलका और फिर अलका के पीछे भंवरी. तीनों श्यामलाल जी के कमरे में जा पहुंचे. श्यामलाल जी पार्लर जाने की तैयारी में थे, तभी एक साथ तीनों को अपने कमरे में आया देख श्यामलाल जी मुस्कुराते हुए बोले-

    ” अरे क्या बात है. इस वक्त तुम लोग यहां कैसे…?आज वीकेंड पर कहीं बाहर नहीं ग‌ए.”

     इतना सुनते ही संजय बोला –

 ” पापा हम तो कहीं नहीं ग‌ए, लेकिन आप कहां जाने की तैयारी कर रहे हैं.”

 श्यामलाल जी बड़े शांत भाव से बोले-

    ” टाकिंग पार्लर”

“टाकिंग पार्लर” संजय और अलका ने बड़ी हैरान से एक दूसरे की ओर देखते हुए कहा. 

“लेकिन पापा आप को टाकिंग पार्लर जाने की क्या जरूरत हैं?” संजय ने आश्चर्य पूर्वक श्यामलाल जी से प्रश्न किया.

कुछ पल की चुप्पी के पश्चात श्यामलाल जी बोले –

” बेटा तुम, बहू और रोमी सारा दिन अपने-अपने कामों में व्यस्त रहते हो, वीकेंड पर बाहर चले जाते हो, मैं घर पर अकेला रह जाता हूं पूरा दिन कितना टीवी देखूंगा या अखबार पढूंगा कोई बातचीत करने वाला भी तो चाहिए ना, बस इसलिए टाकिंग पार्लर चला जाता हूं वहां हमउम्र लोगो से मिलकर, उनसे बातें करके मन को सुकून मिलता है.”

   श्यामलाल जी की बातों में दर्द और थोड़ी शिकायत भी थी जिसे अलका और संजय दोनों ने महसूस किया. अलका और संजय को अपनी गलती का एहसास हुआ. श्यामलाल जी से माफी मांगते हुए अलका बोली –

” पापा जी हमें माफ कर दीजिए, केवल ज़रूरतों का व खाने-पीने का ध्यान रखना ही हम बच्चों का दायित्व नहीं है, हमारे माता-पिता व हमारे बुजुर्ग अकेलापन महसूस ना करें इस बात का ध्यान रखना भी हमारा कर्तव्य है.”

  तभी संजय बोला –

  ” हां पापा हमें माफ कर दीजिए, हम अपने आप में इतना अधिक मस्त व व्यस्त हो गए कि हम यह भूल ही गए कि आपको भी कहने सुनने वालों की जरूरत है.” 

अभी संजय की बात पूरी नहीं हुई थी कि अलका बीच में ही बोल पड़ी-

” क्यों ना हम सभी आज टाकिंग पार्लर में चल कर अपना वीकेंड मनाते हैं. कुछ अपनी कहते हैं कुछ उनकी सुनते हैं.”

    अलका के ऐसा कहने पर श्यामलाल जी के चेहरे पर चमक आ गई, सभी टाकिंग पार्लर चलने की तैयारी करने लगे. भंवरी भी आज पार्लर का अर्थ केवल ब्यूटी पार्लर नहीं होता है यह समझ चुकी थी.