june 2008

मां में आ गई, मैं आ गई । चहकती हुई नन्हीं खुशी साइकिल से उतरने हेतु मचलने लगी। बाबा, मुझे उतारो, बाबा उतारो ना जल्दी । अरे भाई, उतार रहा हूं, साइकिल से उतरते ही बिजली की गति से खुशी मां के गले से लिपट गई। श्याम लाल एवं शोभा मां की इकलौती संतान थी खुशी । तीन बरस की नन्हीं खुशी मासूम, सुंदर, फूल-सी कोमल गुड़िया। अभी-अभी तो उसका बालवाड़ी में दाखिला कराया गया था। दाखिले से पहले दिनभर घर में चहकती फुदकती रहती। मां, बाबा, मां, बाबा के शोर से पूरा घर गूंजता रहता। मां ये चाहिए, मां वो चाहिए, बाबा, मां ये नहीं दे रही, बाबा मां वो नहीं दे रही। मां के सामने मां के सामने पिता की रट और पिता के सामने मां की रट।

शयामलाल एक किसान थे। पूर्वजों द्वारा छोड़ी गई जमीन ही उनकी रोजी-रोटी का एकमात्र सहारा थी। मेहनत तो बहुत करते परंतु कभी सूखे की मार पड़ती तो कभी फसल को बारिश बहा ले जाती। कुल मिलाकर कभी खुशी कभी गम की सि्थति रहती। परंतु खुशी की एक मुस्कान उनके दु:खों के घने बादल को पल में दूर कर देती। श्यामलाल और शोभा अपनी बेटी में सारे संसार की खुशी तलाशते। उनका एक ही सपना था, खुशी को पढ़ा-लिखाकर एक अच्छा घर-वर ढूंढकर उसका खुशियों भरा संसार बसाना। इसी धुन में वे खुशी को हर अच्छी बातें-बड़ों का आदर, मान-सम्माऩ अच्छे संस्कार देने का प्रयास करते। खुशी भी अपने माता-पिता का कहना हमेशा मानती। स्कू्ल में सभी गतिविधियाें में अव्वल, शिक्षकों की चेहती थी।

कोई भी सांस्कृतिक कार्यक्रम तो जैसे बगेर अधूरा रहता। पढ़ाई-लिखाई में अत्यंत कुशाग्र एवं होनहार खुशी ने मैट्रिक और उसके बाद बारहवीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की। आज उसका बीए अंतिम वर्ष का परीक्षा परिणाम आनेवाला था। वैसे सभी जानते थे कि परिणाम क्या होगा। तभी पड़ोस के दीनू काका के लड़के विनोद ने खुशी से उछलते हुए घर में कदम रखा। अरे! खुशी से झूम उठा। मोहलले पड़ोस के लोग घर में जमा हो गए। अपनी बेटी पर भरोसा जमाते हुए शयामलालजी ने लड्डुओं का इंतजाम पहले ही से कर रखा था। खुशी की बुध्दिमानी की सभी प्रशंसा कर रहे थे।

आज खुशी को देखने के लिए पड़ोस के गांव के रोशनलाल और उनका परिवार आ रहा था। घर में सुबह ही से चहल-पहल बनी हुई थी। खुशी को जब यह बात पता चली तो उसने और पढ़ने की इच्छा जताकर हल्का विरोध जताया परंतु मां के समझाने पर वह कुल की मान-मर्यादा की खातिर रजामंद हो गई। आसमानी रंग की साड़ी में सजी-संवरी खुशी जब मेहमानों के सामने चाय का ट्रे लेकर आयी तो सभी उसके रंगरुप पर मुग्ध होकर उसे अपलक निहारते रह गए। लड़के को खुशी बहुत पसंद आई। वह शहर के किसी बैंक में नया-नया प्रोबेशनरी अफसर बना था। खुशी के लिए अच्छे घर-वर का सपना श्यामलालजी को पूरा होता नजर आ रहा था। लेन-देन, रस्मों की बातें तय हो जाने के पश्चात विवाह मुहुर्त तय कर लिया गया। आज खुशी के विवाह का शुभ दिन था। सभी गांववाले श्यामलालजी के घर पर जमा थे। जिसके हाथ को जो काम सूझ रहा था । बारात तय समय पर आई। सुगंधित इृत्र छिड़कर, फूलों की पखुड़ियों की वर्षा कर स्वादिष्ट लस्सी के साथ बारातियां का स्वागत किया गया। श्यामलाल हर किसी के पास पहुंच रहे थे। बिटिया के ब्याह में कोई कमी न रह जाए। सोच कर चारों तरफ हंसी की खनक गूंज रही थी। शादी की सभी रस्म धीरे-धीरे पूरी हो रही थी। ठहरिये पंडितजी, अचानक दूल्हे के पिता रोशनलाल का तेज सवर मंडप में गूंजा। रोशनलाल आंखे तरेरकर शयामलाल इकलौती बेटी की शादी और दहेज में आपने कार देने की कमी कर दी। रोशनलाल तैश में बोले। रोशनलाल की इस अप्रत्याशित मांग पर सभी हतप्रभ थे, परंतु आपने इस सबंध में पहले कुछ नहीं कहा था, चिंता और मायूस में डूबा श्यामलाल का स्वर यूं जान पड़ रहा था जैसे किसी गहरे कुएं से नि्कल रहा हो। अरे भई, ये भी कोई कहने की बात है, आखिर हमारा एक ही बेटा है और वह भी एक प्रथम श्रेणी का बै्ंक अधिकारी । उसकी हैसियत तो देखते कम-से-कम? परंतु रोशनलाल इतने कम समय में कार का इंतजाम कैसे कर पाऊंगा?  आप यूं करें कि शादी की रस्म होने दीजिए, मैं प्रथम बार बेटी को लिवाने आऊंगा तो आपके घर के सामने गाड़ी खड़ी होगी, यह मेरा वादा है आपसे, हाथ जोड़कर श्यामलाल गिड़गिड़ाने लगे। नहीं बाबा, बिल्कुल भी नहीं, खुशी अपने हार-श्रृगांर को फैंकती हुई अपने पिता को रोशनलाल के कदमों में झुकने से रोकने हेतु आगे बढ़ी। अपने पिता के हाथों को अपने हाथों में ले्कर वह बोली, नहीं बाबा, यह आप क्या कर रहे हैं मेरी शादी आपके मान-सम्मान को किसी के कदमों तले कुचलकर मैं अपने अरमानों का महल नहीं बसा सकती और फिर ऐसे लालचियों का क्या भरोसा? आज कार मांगी है, कल कुछ और मांगेगे । मिला तो ठीक वरना किसी दिन आपको यह संदेश पहुंचा देंगे। कि रसोई में काम करते समय खुशी दुर्घटना जल कर मर गई। नहीं, बाबा नहीं, ये शादी नहीं होगी। यही मेरा आखिरी फैंसला है। बारात बैंरग लौट गई। चारों तरफ खुशी की बहादुरी के चर्चे थे। समाचार पत्रों टीवी चैनलों मे उसकी चर्चा हो रही थी। सारा गांव सिर ऊंचा कर घूम रहा था। कहते हैं कि कभी-कभी कोई असफलता मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी सफलता का रास्ता खोल देती है। इस घटना के बाद खुशी एक नए जोश के साथ उठ खड़ी हुई। होनहार तो वह थी ही उसने संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा दी। पहले प्रारम्भिक और फिर मुख्य परीक्षा पास करके वह प्रशासनिक प्रशिक्षण प्राप्त करने मसूरी चली गई। समय अपनी रफ्तार से पंख लगाए उड़ता रहा। खुशी के खत आते रहे। दोनों पति-पत्नी खत पढ़ लेने पर भी उन्हें चैन न मिलता। कभी खत श्यामलाल के पास होता तो कभी शोभा के पास । उन दोनों के पास बस एक ही विषय होता खुशी।

आज खुशी अपना प्रशिक्षण पूरा कर वापस लौट रही थी। पूरा गांव उसके लिए पलकें बिछाए उसकी बाट जोह रहा था। श्यामलाल और शोभा तो जैसे अपने कलेजे के टुकड़े को एक नजर देखने उसे गले से लगाने हेतु उतावले से हो रहे थे। तभी घर के सामने एक ऑटोरिक्शा आकर रुका, जिसमें से दुल्हन के लिबास में एक लड़की उतरी। आंखों तक बड़ा-सा घूघंट पायल खनकाती कदमों की चाप लिए वह आगे बढ़ी। पीछे पीछे हाथों में हार लिए एक हृष्ट-पुष्ट सुंदर सा नौजवान चला आ रहा था। होंठों पर मुस्कान बिल्कुल राजकुमार सा रंगरुप लिए। दोनों ने घर में प्रवेश किया और लड़की ने जैसे ही श्यामलाल और शोभा के सामने जाकर अपना घूघंट उठाया लोगों के मुंह से बेसाख्त निकल पड़ा खुशी। सजी-संवरी सौभाग्यवती खुशी सबके सामने मुस्कराते हुए खड़ी थी। इससे पहले कि कोई कुछ कहता नौजवान ने आगे बढ़कर शयामलाल और शोभा के चरण-स्पर्श किए और कहने लगा, बाबूजी पहले तो आप सभी हमें माफ कीजिएगा। मेरा नाम सुधीर है। मैं और खुशी मसूरी में ट्रेनिगं में साथ थे। खुशी ने मुझे अपने बारे में सब कुछ बता दिया था। बाबूजी मैं एक अनाथ हूं। आश्रमवालों ने मुझे पढ़ा-लिखाकर इस काबिल बनाया है। हम आप लोगों के आशीर्वाद के बगैर कुछ नहीं करना चाहते थे। उनकी जिद को हम टाल न सके। हमें माफ कर दिजिए। सुधीर पुन:  श्यामलालजी के कदमों पर झुकने लगा। अरे नहीं बेटा, नहीं श्यामलाल ने उसे उठाया। तुम लोगों ने जो कुछ किया अच्छा किया। वास्तव में, शादी की रस्म के नाम पर खुशी के साथ खिलवाड़ ही तो हुआ था। वास्तव में बहुत अच्छा किया, हम बड़े खुश हैं, सारा गांव खुशी की खुशी में झूम रहा था। मां-बेटी एक-दुसरे के गले से लिपटी हुई थी। श्यामलाल और सुधीर सारे गांव में न्यौता, पंडाल, रोशनाई की तैयारी में कंधे-से-क्ंधा मिलाए घूम रहे थे। हर किसी की आंखों में आंसू थे खुशी की खुशी के।

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