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पात्र-परिचय हवा दीदी निक्का, निक्की और मोहल्ले के अन्य बच्चे गोमायु सियार, गज्जू दादा, जंगल के अन्य जानवर

पहला दृश्य

(स्थान–गली या मोहल्ले के पास वाला खेल का मैदान, जिसमें एक तरफ बच्चे खड़े-खड़े बातें कर रहे हैं। तभी हवा तेजी से बहती हुई आती है और बच्चों को मजे से बातें करते और खेलते देख, ठिठक जाती है। फिर हवा दीदी बच्चों के पास आकर बड़े उत्साह से बताने लगती है।)

हवा दीदी : सुनो भई निक्का, सुनो भई निक्की, आज तो बहुत ही मजेदार नाटक देखा, बहुत ही बढ़िया।

निक्का : सच्ची…?

निक्का : सच्ची हवा दीदी? तो हमें भी बताओ ना उसके बारे में।

हवा दीदी : बताऊँगी, बताऊँगी…और बताऊँगी क्यों, तुम्हें मैं दिखा ही दूंगी जो अनोखा नाटक मैंने जंगल से गुजरते हुए देखा। गज्जू दादा वहाँ ऐसा नाटक पेश कर रहे थे कि मैं तो हैरान रह गई। इस नायक में एक सियार का किस्सा है। ओहो, बेचारे सियार की बुरी हालत हुई, बहुत ही बुरी।

निक्की : हुआ क्या हवा दीदी?

निक्की : हाँ-हाँ, हुआ क्या हवा दीदी?

हवा दीदी : अरे, होना क्या था? बेचारे सियार को नगाड़ा मिला और वह खुशी के मारे इतना फूला, इतना फूला कि यही बेचारे के लिए मुसीबत हो गई।

निक्की : तो फिर हुआ क्या हवा दीदी।

निक्की : हाँ-हाँ हवा दीदी, बताओ ना।

हवा दीदी : अरे, भई बताने की तो बात ही क्या है? तुम तो नाटक देखो। जंगल का पूरा नाटक जिसे अपने गज्जू दादा करवा रहे थे।

दूसरा दृश्य

(स्थान–जंगल का दृश्य। सियार गोमायु जंगल में अकेला इधर-उधर भटक रहा है।)

गोमायु : अरे, कई दिनों से मुझे भोजन ही नहीं मिला। मैं जरा सीधा-सादा हूँ, इसलिए साथ के सियार हमेशा मेरी खिल्ली उड़ाते हैं। किसी को खामखा तंग करना मुझे पसंद नहीं है। इसीलिए मैं थोड़ा अलग-थलग रहता हूँ और जंगल में अकेला घूमता हूँ। मगर…

(कुछ रुककर) मगर यहाँ भी मुसीबत मेरा पीछा नहीं छोड़ती। खाना तो मिलता ही नहीं, उलटे दूसरों से अपनी जान बचानी ही मुश्किल। अभी कल ही एक भेड़िया पीछे पड़ गया था। अगर तेजी से भागकर जान न बचाना तो न जाने क्या होता?

(इतने में एक शेर की जोर की दहाड़ सुनाई दी, तो दौड़कर एक झाड़ी की ओट में खड़े होकर अपने आप से…)

गोमायु : लेकिन अब मुश्किल यह है कि भोजन कहाँ से मिले? यह तो अलग ही मुसीबत बन गई। भूख के मारे जान निकली जा रही है, पर दो दिन से भोजन मिला ही नहीं। तो मैं क्या करूँ, क्या नहीं? अपनी जान बचाऊँ या फिर भोजन की तलाश में जरा बाहर निकलूँ?

तीसरा दृश्य

(एक बार की बात, बहुत दिनों से गोमायु को भोजन नहीं मिला। वह भोजन की खोज में भटक रहा था और उसकी भूख तेज होती जा रही थी। दुखी होकर अपने आप से…)

गोमायु : जल्दी ही भोजन नहीं मिला, तो भला मैं जीवित कैसे रहूँगा? लगता है, अब जान बचनी मुश्किल है। ओह, मेरा अंत आ गया और वह भी सिर्फ इसलिए कि मुझे कई दिनों से खाने को कुछ नहीं मिला। कुछ भी नहीं। तो अब मैं क्या करूँ, क्या न करूँ? हाय-हाय, मैं कितना अभागा हूँ। ईश्वर को भी मुझ पर दया नहीं आती।

(दुखी और परेशान होकर कुछ सोचता हुआ गोमायु आगे बढ़ रहा था। तभी उसे एक अजीब सी आवाज सुनाई दी।)

रहस्यपूर्ण आवाज : तिड़-तिड़…तिड़क-तिड़क-तिड़क…ड-ड-ड-ड डड़…ड-ड-ड-ड-डड़।

गोमायु : अरे-अरे, यह आवाज कैसी है? यह तो विचित्र आवाज है, बड़ी ही विचित्र आवाज। मैंने ऐसी आवाज तो कभी सुनी ही नहीं।

रहस्यपूर्ण आवाज : तिड़-तिड़…तिड़-तिड़, तिड़-तिड़क्क, तिड़क-तिड़क्क, ड-ड-ड-ड-डड़…ड-ड-डड-डड़।

गोमायु : अरे, यह तो कोई बहुत भयानक जानवर है। तभी तो यह आवाज सुनकर जैसे मेरा खून सूख गया है। इतना डर तो मुझे शेर की दहाड़ से भी नहीं लगता। सच्ची कह रहा हूँ, सच्ची। यह तो शेर और चीते से भी भयानक जानवर है। ओह, अब मैं क्या करूँ, कैसे अपनी जान बचाऊँ?

(कुछ देर रुककर फिर वही आवाज शुरू हो जाती है। गोमायु डर के मारे सिहर उठता है।)

रहस्यपूर्ण आवाज : (बड़ी विचित्र लय में) डड़ड़-डड़ड़-डडड़…घरड़-घरड़-घरड़। तिड़-तिड़, तड़-तड़…तिड़तिड़, तड़-तड़। ड-ड-ड-डड़ड़, ड-ड-ड-डडडड़। डडड़-डडड़…डडड़।

गोमायु : (लंबी साँस छोड़ते हुए) मारे गए, मारे गए, आज तो सचमुच जान बचनी मुश्किल। मुझे तो इतना डर लग रहा है कि अभी खड़े-खड़े गिर जाऊँगा। इससे तो अच्छा था कि शेर मुझे खा जाता। तब इतना डर तो न लगता। अब तो राम बचाए भैया, राम बचाए।

(आवाज कुछ इतनी विचित्र थी कि गोमायु भयभीत होकर झाड़ी के पीछे छिप गया। अपने आप से…)

गोमायु : भला इतनी अजीब आवाज किस जानवर की हो सकती है ? लगता है, जंगल में कोई ऐसा भीषण बलशाली जानवर आ गया है जिसे मैंने आज तक कभी नहीं देखा। यह तो भैया, शेर का भी बाप है। तभी तो उसकी आवाज सुनकर मेरा दिल दहल रहा है।

(कुछ देर बाद) पर मैं इस तरह कब तक छिपा रहूँ? भूख से तो मैं वैसे ही बेहाल हूँ। तो फिर भला कब तक झाड़ी के पीछे छिपा रहूँगा? हिम्मत करके बाहर निकलता हूँ। अब जो होगा, देखा जाएगा। ज्यादा से ज्यादा जान ही तो जाएगी। पर इस झाड़ी से बाहर न निकला तो भूख से मैं वैसे ही मर जाऊँगा।

चौथा दृश्य

(गोमायु डरते-डरते झाड़ी से बाहर आया, तो उसे सामने एक विचित्र चीज दिखाई दी, जो एकदम गोलमटोल और विशालकाय थी। कुछ फूली-फूली भी थी और उस पर चमड़ा मढ़ा हुआ था। देखकर वह अचंभे में पड़ गया।…)

गोमायु : अरे, भला यह क्या चीज है? कोई जादू का पिटारा तो नहीं? पर आवाज तो इसी गोलमोल चीज के अंदर से ही आ रही है। तो क्या इसके भीतर कोई बंद है? या फिर हो सकता है कि इसके भीतर कोई मोटा-ताजा जानवर बंद हो। आजकल ऐसी-ऐसी अजीब बातें हो रही हैं कि क्या कहूँ?

जंगल बाबा : (जोर से हँसते हुए अपने आप से) इस जंगल की भी विचित्र माया है, जिसे इस जंगल के जानवर ही नहीं जानते। इसीलिए तो हर चीज से डर जाते हैं। अब भला इस सियार को कैसे बताऊँ कि असल में तो यह एक विशाल नगाड़ा है। कुछ समय पहले इसी स्थान पर दो सेनाओं में भीषण युद्ध हुआ था। बाद में वे सेनाएँ वहाँ से चली गईं, पर किसी सैनिक का नगाड़ा वहीं छूट गया। और अब वह नगाड़ा एक पेड़ के नीचे पड़ा है।

(कुछ रुककर) वही नगाड़ अब बन गया है जादू का नगाड़ा। इसलिए कि जब-जब जोर की हवा चलती है, तो उस पेड़ की एक टहनी नगाड़े से आकर लगती है। टहनी की चोट से नगाड़ा बज उठता है और उसकी गूंज हवाओं में फैलती हुई सारे जंगल में छा जाती है।

(अचानक उसी समय फिर वही आवाज नगाड़े से निकलकर पूरे जंगल में गूंजने लगी।)

रहस्यपूर्ण आवाज : तड़-तड़ तन्न…तड़-तड़ तन्न।

गोमायु : (डर के मारे एकदम पीछे हटकर) भला यह किस चीज की आवाज है? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आता। अरे, कहीं यह कोई जादू-मंतर तो नहीं? जरूर यह जादू का कोई पिटारा है, एकदम जादू का पिटारा।

(आखिर वह डरते-डरते उस नगाड़े के पास गया। लेकिन पास जाकर उसका दुख खुशी में बदल गया।)

गोमायु : ओहो, कमाल हो गया, कमाल। यह तो एक विशाल भंडार जैसा है। सचमुच विशाल भंडार। इसके भीतर न जाने क्या-क्या होगा? इसीलिए शायद इसे चमड़े से मढ़ दिया गया है। तब तो मेरी किस्मत चमक गई। मैं जिससे डर रहा था, वह तो मेरे लिए सौभाग्य की चीज बन गई।

(जोश और उत्साह से भरकर) अरे वाह, मैं भी कितनी किस्मत वाला हूँ। यह तो मुझे पता ही नहीं था और मैं उलटे रो रहा था। अब जल्दी से यह चमड़ा काटता हूँ, फिर तो अंदर से खाने-पीने की इतनी चीजें निकलेंगी कि समझो, पूरे साल भर के खाने का इंतजाम हो गया। वाह-वाह रे मैं, वाह-वाह।

(बस, उसी समय गोमायु ने नगाड़े के चमड़े को काटना शुरू कर दिया।)

गोमायु : ओह, पर यह चमड़ा तो एकदम सूखा हुआ और सख्त है। मुझे बहुत ताकत लगानी पड़ेगी, पर मैं लगाऊँगा। जब नसीब से खाने का इतना बड़ा भंडार मुझे मिल गया है, तो भला क्यों छोडूं? चाहे जितनी मेहनत करनी पड़े, मैं इसे का,गा, काटकर रहूँगा।

(दिन भर गोमायु इसी तरह जुटा रहा। मगर जब चमड़े को काट लिया, तो भीतर झाँकने पर हक्काबक्का रह गया।)

गोमायु : हाय-हाय, यह क्या? अंदर तो खाली पोल के सिवा कुछ भी नहीं है। ओह, कितना अभागा हूँ मैं? मेरी तो सारी मेहनत बेकार गई। चलता हूँ, अब चलकर कहीं और भोजन की तलाश करूँगा। हे ईश्वर, तूने मेरे साथ अच्छा मजाक किया। पर इस दुनिया में शायद सभी गरीबों और खाली पेट वालों से ऐसा ही मजाक करते हैं। (सिर पर हाथ मारते हुए) ऐसा ही मजाक…ऐसा ही मजाक।

(गोमायु के दुख का ठिकाना न था। अपने भाग्य को कोसता हुआ गोमायु सियार भोजन की तलाश में आगे चल दिया। अपने आप से…)

गोमायु : पर गलती शायद मेरी ही है। मैं भला किसी को क्यों दोष दूँ? सच बात तो यह है कि इतना उतावलापन भी ठीक नहीं है। मुझे अच्छी तरह देख परखकर ही मेहनत करनी चाहिए थी। वरना तो इस दुनिया में ढोल की पोल बहुत हैं। ऐसी ढोल की पोल से तो राम बचाए…(बहुत करुण स्वर में) राम बचाए भैया, राम बचाए!

गज्जू दादा : (अपनी सूंड़ ऊपर उठाकर धीरे-धीरे हिलाते हुए) और यों गोमायु सियार के दुख की कहानी खत्म हुई। पर भई, देखा जाए तो उसमें भी बड़ी गहरी सीख छिपी हुई थी। बड़ी ही गहरी और हमेशा याद रखने लायक सीख। और जंगल के सभी जानवरों ने, मुझे पूरी उम्मीद है कि इसे समझ लिया होगा।

पाँचवाँ दृश्य

(स्थान-गली या मोहल्ले के पास वाला खेल का मैदान। बच्चे हवा दीदी को घेरकर खड़े हैं और खुश होकर बातें कर रहे हैं।)

हवा दीदी : तो भई देख लिया तुमने, बेचारे गोमायु सियार के साथ क्या बीता?

निक्का : हाँ हाँ, देख लिया, देख लिया हवा दीदी।

निक्की : (अजीब सी हास्य मुद्रा में) हमने भी देख ली ढोल की पोल दीदी।

हवा दीदी : (हँसते हुए) फिर तो तुम समझ गए कि इस नाटक की सीख क्या है?

निक्का : (हाथ उठाकर) हाँ-हाँ, समझ गए हम समझ गए?

निक्की : ढोल की होती पोल क्या, हम समझ गए।

हवा दीदी : (सिर हिलाते हुए) सोच-समझकर करना काम, समझ गए?

निक्का : समझ गए हम, समझ गए।

निक्की : हाँ-हाँ दीदी, समझ गए।

हवा दीदी : तो अब मुझे विदा दो बच्चो, मैं चलती हूँ। दूर, बहुत ही दूर मुझे अब जाना है।

(हाथ हिलाती हुई हवा दीदी विदा लेती है। बच्चे हाथ हिलाकर विदा कर रहे हैं। निक्का और निक्की के चेहरे सबसे अलग नजर आ रहे हैं।)

(परदा गिरता है।)

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