Nikka learns to ride a bicycle
Nikka learns to ride a bicycle

Funny Stories for Kids: निक्का के नंदू भैया तो बड़े फर्राटे से साइकिल चलाते थे । पर निक्का …? वह जब नंदू भैया को गद्दी पर बैठे, इत्मीनान से साइकिल चलाते देखता, तो उसके मन में आता, ‘काश, मैं भी साइकिल चला पाऊँ !’ उसने दो-एक बार नंदू भैया से कहा भी, “भैया, मुझे भी सिखा दो न साइकिल चलाना ।”
सुनकर नंदू भैया हँसकर कहते, “निक्की , अभी तुम छोटे हो । जब बड़े हो जाओ, तो खूब साइकिल चलाना ।”
एक दिन नंदू भैया ऐसे ही मजाक कर रहे थे, तो निक्का झटपट अंदर से एक स्टूल उठा लाया । स्टूल पर खड़ा होकर बोला, “लो, मैं बड़ा हो गया, नंदू भैया ! अब तो मैं आपके बराबर हूँ । झटपट मुझे भी साइकिल सिखाओ ।”
सुनकर नंदू भैया हँस पड़े । बोले, “हाँ भई, अब तो तुम्हें साइकिल चलाना सिखाना ही पड़ेगा ।” पर नंदू भैया फिर भूल गए, तो निक्का ने जिद ठान ली । निक्का ने बार-बार कहा और ‘साइकिल… साइकिल’ की कुछ ज़्यादा ही रट पकड़ ली, तो एक दिन नंदू भैया ने निक्का को सिखाना शुरू किया साइकिल ।
पहले मोटी-मोटी बातें समझाईं कि कैसे पैडल चलाना है, कैसे हैंडिल सँभालना है । और भी बहुत सी बातें । फिर उसे सहारा देकर साइकिल पर बैठा दिया । निक्का बड़े चाव से साइकि ल चलाना सीख रहा था, लेकिन अंदर ही अंदर डर भी रहा था । दो-एक बार उससे साइकि ल सँभली नहीं । हैंडि ल
डगमगाया और वह नीचे आ गिरा । चोट भी लगी । पर उसने तय कर लिया, अब चाहे जो भी हो, साइकि ल चलाना सीखकर रहूँगा । यों ही गिरते-उठते उसे थोड़ी -बहुत साइकिल चलानी आ गई । अब तो उसे खूब अच्छा लगने लगा । किसी तरह पैडलों को पैरों से सँभालता, हैंडिल पर ध्यान गड़ा ता और हि म्मत करके साइकिल आगे बढ़ा ता । ध्यान कभी-कभी इधर-उधर भटकता तो साइकि ल डगमगाने लगती, पर अब उसे हिम्मत करके साइकिल सँभालना आ गया था । नंदू भैया भी कम होशियार नहीं थे । वे थोड़ी चालाकी बरतते । निक्का की साइकिल में पीछे से धक्का लगाकर कहते, “निक्का , तू बिल्कुल घबरा नहीं, मैंने पीछे से पकड़ा हुआ है । तुझे गिरने नहीं दूंगा । बस, तू पैडल मारता जा ।… शाबाश !”

निक्का के साथ-साथ वे थोड़ी दूर तक दौड़ते, फि र पीछे से उसकी साइकिल को धक्का मारकर कहते, “निक्का , मैं पीछे-पीछे आ रहा हूँ । तू घबराना नहीं, बस तू पैडल मारता जा ।” निक्का समझता, नंदू भैया साथ ही हैं, तो भला चिंता करने की क्या बात ? पर वे तो निक्का की साइकिल को धक्का देकर अपनी जगह खड़े रहते । या फिर पीछे-पीछे चलते हुए ध्यान से नजर गड़ा के देखते कि निक्का कितनी होशियारी से साइकिल चला रहा है । कहीं कुछ गड़बड़ होती तो वहीं से टोकते, “निक्का , आगे गड्ढा है, जरा सँभल के !” या कि “निक्का , अब यहाँ से मोड़ना है—
हैंडिल सँभाल !”
यों ही गिरते-पड़ते, कभी चोट तो कभी टक्कर खाते कोई हफ्ते भर में निक्का अच्छी तरह साइकिल चलाना सीख गया । अब तो वह सुबह-सुबह साइकिल लेकर निकल जाता और घंटे-डेढ घंटे तक पार्क में साइकि ल चलाता । कभी-कभी राजा जी की बगिया तक चला जाता और देर तक साइकि ल चलाने का अभ्यास करता । सड़क पर चलाने में भी अब उसे डर नहीं लगता था । और छुट्टी वाले दिन तो उसका एक ही
प्रोग्राम था– साइकिल, साइकिल और बस साइकिल । सुबह से शाम तक बस साइकिल ही चलाता । इस दौरान कहाँ कि ताबें पड़ी हैं, कहाँ बस्ता , उसे होश ही नहीं था । यहाँ तक कि टीवी पर कार्टून सीरियल देखना भी वह भूल गया । अब कुछ दिनों से तो निक्का को सपने भी साइकि ल चलाने के ही आने लगे थे । सपने में किसी से जोरदार टक्कर होती तो वह चीख पड़ता, “हाय
मम्मी , हाय…!”

मम्मी -पापा दौड़कर जाते । पूछते, “क्या हुआ निक्का , क्या हुआ ? तू चिल्ला क्यों रहा था ?”
“मैं चि ल्ला रहा था…?” निक्का को बड़ा अचरज होता । पर फिर उसे अचानक याद आ जाता, “ओह, मैं शायद सपने में चि ल्ला रहा था ! मम्मी , एक लड़के ने ना, मुझे बुरी तरह टक्कर मार दी । मुझे बुरी तरह चोट लगी टाँगों में…!”
धीरे-धीरे निक्का को साइकिल चलाना आ गया । अब उसे बिल्कुल डर नहीं लगता था । वह खूब जमकर और आत्मविश्वास के साथ साइकिल चलाने लगा था । पार्क में ही नहीं, सड़कों और गलियों में भी निक्का की नीली साइकिल दौड़ती दिखाई पड़ती । महीने भर बाद निक्का की साइकि ल से और साइकिल की निक्का से दोस्ती हो गई । अब उसे साइकिल चलाने में खूब मजा आता था ।

फिर एक दिन की बात, निक्का सुबह-सुबह साइकिल चलाता हुआ रामलाल हलवाई की दुकान पर गया । और पूरे एक कि लो बूंदी के लड्डू खरीदकर लाया । महीने भर तक अपना जेबखर्च बचाकर उसने ये पैसे इकट्ठे किए थे । उनसे बूंदी के लड्डू ,खरीदे तो उसके उत्साह का ठिकाना न था । घर
आकर उसने सबसे पहले नंदू भैया को लड्डू दिए । कहा, “लो भैया, मेरी ओर से आपको गुरु दक्षि णा !” और फिर मम्मी -पापा, मीनू दीदी सबको खिलाए । सब खुश होकर निक्का की पीठ ठोंक रहे थे और निक्का हँसता हुआ कह रहा था, “अब मैं भी साइकिल का पायलट हो गया । कोई मामूली चीज
है क्या !” “बिल्कुल, बि ल्कुल !” निक्का की मम्मी भी जोर से हँस पड़ीं । उन्होंने उसी समय एक कि लो लड्डू मँगवाए और आस-पड़ो स में बाँटे ! सबसे यही कहा, “अपना निक्का भी अब पायलेट हो गया है जी । अपनी छोटी-सी नीली
साइकिल का पायलेट !” फिर तो निक्का को खूब बधाइयाँ मिलीं । सबने खुश होकर निक्का का नाम रखा, ‘पायलट द ग्रेट !’

ये कहानी ‘बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंBachchon Ki 51 Natkhat Kahaniyan बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ