Hindi Short Story
Hindi Short Story

Hindi Short Story: “होली” का नाम जुबां पर आते ही मन अंदर तक गुदगुदा उठता
है।–बस ऐसी ही एक होली की याद मन को गुदगुदा रही है ।
 उन दिनों मैं एम. ए. में अध्ययनरत थी और  लखनऊ में अपने मम्मी पापा के साथ रहती थी। हमारे बगल के फ्लैट में कुमार जी का छोटा सा परिवार रहता था ।हम दोनों के परिवार का आपस में बहुत अच्छा स्नेह व्यवहार था।
होली का पर्व आने वाला था ।मैंने निश्चय किया कि इस बार मैं
कुमार जी के परिवार के साथ
जोरदार होली खेलूंगी-कि उसकी याद सबके मन में अगली होली तक बनी रहेगी ।
  रंग बिखेरता होली का दिन आ ही गया। मैने अपनी प्लानिंग के अनुसार कुमार जी की फैमिली को लंच के लिये निमंत्रित कर दिया ।
 मध्याह्न तक तो रंग का ही हुडदंग चलता रहा-उसके पश्चात् स्नान आदि से निवृत होकर कुमार जी का परिवार के
 हमारे यहाँ आ गया ।
  अपनी प्लानिंग के अनुसार
मैंने  छोले वाले बाउल मे काफी मात्रा में भांग मिला कर कुमार जी की-तरफ कर दिया।सबने अच्छे मन से खाना खाया ।
लंच कर  कुमार जी परिवार के साथ अपने फ्लैट में चले गये ।
-संध्या समय अपने भाँग का असर देखने के लिए मैं  उनके यहाँ  गई। कुमार जी का
लगातार हंसने का सिलसिला बना हुआ था–मैने समझ लिया–यह भांग का असर है–बिना कुछ बोले मैं चुपचाप
वापस आ   गई ।


दूसरे दिन कुमार जी नार्मल थे–लेकिन उनको अपनी
हालत का अंदाजा लग गया था,
साथ में यह भी कि यह शरारत निश्चित रूपसे मैंने ही की होगी।
अगले दिन नया ड्रेस पहन कर मैं कुमार जी के यहां गई।  
उन्होंने  कहा–“थोड़ी देर में मेरे एक दोस्त अपनी फैमिली के साथ आ  रहे हैं-उनके लिए मैं बड़े टब में रंग  तैयार कर रहा हूँ ,आइये आपको दिखायें-“।
मैं  निश्चिन्त सी उनके साथ होली ।टब के पास पहुँच कर जबतक मैं कुछ समझ पाती,कुमार जी ने मुझे  उठा कर टब में  डाल दिया। ” अरे-अरे ये क्या किया आपने?”
मैं जोर से चिल्ला पड़ी ।
“कुछ नहीं,बस  वही  जो  कल
आपने मेरे साथ किया था ।अब तोआपको बाहर निकालना तब
होगा -जब मैं आपके साथ थोड़ा इन्ज्वाये कर लूंगा “-कहते हुये
कुमार जी भी टब में कूद पड़े ।
  अब तो मेरी हालत खराब
थी-ऐसा कुछ वह करेंगे-मुझे
बिलकुल अनुमान नहीं था।
मुझे  टब में कुमार जी के साथ खड़े रहना- बड़ा अजीब सा और शर्मनाक भी लग रही थी। अचानक  अपने हाथ में लिया  
 बैंजनी रंग भी उन्होंने मेरे चेहरे पर पोत दिया -“अब आप बिलकुल भूत जैसी दिख रही हैं।यह बताइये कि अब आप कल जैसा मज़ाक तो नहीं  करेंगी ?”
उन्होंने  पूछा ।
“नहीं बाबा! नहीं करूँगी “-“बस मुझे टब से बाहर निकालिये “।
  कुमार जी नें मुस्कराते हुए कहा-” अरे -हां , भूत के साथ टब में रहना ही कौन पसंद  करेगा ?” कहते हुए वह पहले स्वयं टब से बाहर कूदे- फिर सहारा देकर मुझे निकाला।
मैं  बुरी तरह से खींझ गयी थी, चुप चाप अपने फ्लैट में चली आई ।
वह होली मैं आज भी भूली नहीं
हूँ ।

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