Hindi Love Story: उस दिन मौसम साफ़ था, लेकिन न जाने कैसे अचानक बूंदाबांदी शुरू हो गई। चारुलता कुछ भीगती हुई, कुछ हाँफती हुई पेरिस के सेंटर पोम्पिडू में पहुँची, जहाँ मेरे चित्रों की प्रदर्शनी लगी थी। देश के बड़े चित्रकारों में मेरा नाम शुमार किया जाता है, पर उस क्षण मुझे देखकर किसी भी आभा का बोध नहीं होता – मानो अपने ही रंगों से थका हुआ कोई चित्रकार।
चारुलता की खोजपूर्ण निगाहें पूरे हॉल में घूमती रहीं, पर मैं वहाँ नहीं था। उसका उत्साह धीमे-धीमे ठंडा पड़ने लगा। मेरे साथ उसकी कई पुरानी यादें थीं – अनगढ़, आत्मीय, अनकही। उन्हीं स्मृतियों को छूने वह इतनी दूर पेरिस आई थी। तभी उसे अनुमान हुआ कि मैं कहाँ हो सकता हूँ। वह हॉल के कोने में बने छोटे-से कॉफ़ी हाउस में पहुँची, जहाँ मैं एक मग को दोनों हाथों में थामे उदास-सा बैठा था। बूंदों से भीगी चारुलता को देखते ही मेरे होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई – दूर की, पर परिचित। चारुलता ने जैसे ही मुझे देखा, वह बिना किसी संकोच के मेरी ओर बढ़ी और मेरे गले लग गई। वह मेरे होठों को चूमने लगी। उसकी आँखों से झरझर आँसू बहने लगे।  उस आलिंगन में वर्षों की दूरी, अनगिनत अनकहे शब्द और बचपन से अब तक की यात्रा, सब एक साथ सिमट आए।
अब वह पूरी तरह वयस्क हो चुकी थी, उम्र के लिहाज़ से मुझसे दस वर्ष छोटी, पर भावनाओं के लिहाज़ से शायद मुझसे कहीं अधिक परिपक्व। उसके भीतर अब भी वही स्नेह था – साफ़, सहज और निर्विभ्रम – जैसे समय ने उसे छुआ तो हो, पर बदला न हो।
उसने धीरे से कहा, “देब्येंदु दादा… आपसे मिलकर लगता है जैसे भीतर कुछ फिर से ज़िंदा हो गया हो।”
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और मुस्करा दिया।
“कुछ भाव उम्र नहीं देखते, चारु… वे बस अपनेपन से पहचाने जाते हैं।”
हम कुछ क्षण यूँ ही खड़े रहे – दोनों के बीच की पुरानी दूरी पिघलकर बारिश की बूंदों की तरह कहीं बह चुकी थी।
इसके बाद हम एक साथ प्रदर्शनी देखने लगे। मेरी आत्मीय तन्मयता, रंगों की तहों में छुपे संगीत, प्रकाश की सूक्ष्म तरलता और कैनवास पर फैले अनकहे तनाव – सब कुछ मैं उसे समझाता गया। वह सुनती नहीं थी, मानो पीती थी। जैसे शब्द नहीं, भाव बोल रहे हों। उसकी आँखों में अचानक पेंटिंग्स के कई नए अर्थ खुलने लगे।
इन वर्षों में हम दोनों के बीच कुछ ऐसा बुना गया था जिसे शब्दों में साधना मुश्किल था, एक गुरु-शिष्य नहीं, एक आत्मा दूसरी आत्मा को छू ले ऐसी नमी।
पेरिस की उस शाम, प्रदर्शनी के अंतिम चित्र के सामने रुककर चारुलता बहुत देर तक चुप खड़ी रही। वह मेरी सबसे नई पेंटिंग थी – एक धुंधला-सा नीला आकाश, उसके भीतर कहीं डूबता सूरज  और एक अकेला पुल जिसे पार करने वाला कोई नहीं।
मैंने कहा, “यह शायद मेरी सबसे उदास पेंटिंग है।”
चारुलता ने धीमे से पूछा,  “देब्येंदु दादा… यह किसकी प्रतीक्षा में है?”
मैं कुछ पल चुप रहा। फिर कहा,  “शायद… किसी ऐसे स्पर्श की प्रतीक्षा में, जो रंगों को फिर से जीवित कर दे।”
वह मेरी ओर मुड़ी। उसकी आँखों में वर्षों का अनकहा, अनभिव्यक्त स्नेह चमक रहा था – न बालसुलभ, न शाही, बस बिल्कुल मानवीय।
उसने धीरे से कहा,  “कभी-कभी व्यक्ति नहीं, उसकी यादें रंगों को जीवित करती हैं। मैं शायद उसी तरह आई हूँ।”
उस क्षण मुझे लगा कि पेंटिंग का अकेला पुल पार हो चुका है – वह भी और मैं भी।  
बाहर बूंदाबांदी फिर शुरू हो चुकी थी। हम दोनों चुपचाप खिड़की के पास खड़े रहे। बारिश की महीन परतें काँच पर उभरती रहीं  और भीतर हमारे बीच की दूरी पिघलकर कहीं बह गई।
उस शाम पेरिस में, कला अपने अर्थ से आगे बढ़कर एक रिश्ता बन गई – बिन माँगे, बिन परिभाषा के – सिर्फ जीने लायक एक सुंदर क्षण, जो शायद दोनों के जीवन में पहली बार इतने पूर्ण रूप में उतरा था।
रात को होटल में मेरी आँखों में नींद नहीं थी।
कमरे की खिड़की के बाहर पेरिस का आकाश गहरा, ठहरा हुआ था और भीतर मेरे मन के पन्ने एक-एक करके फड़फड़ाने लगे।
चारुलता का चेहरा, उसकी आवाज़, उसके बचपन से लेकर आज तक की हर छोटी-बड़ी स्मृति एक अदृश्य रील की तरह चलती रही।
मैंने पहली बार उसे देखा था – सिर्फ नौ बरस की थी तब।
पहला संबोधन था –  “देब्येंदु दादा।” और वह नाम मेरे भीतर किसी पुराने रबीन्द्र-गीत की तरह गूँजता रहा, वर्षों तक।
चारुलता एक धनाढ्य बंगाली परिवार की लड़की थी – तेज़ दिमाग़, पर मन से बेहद कोमल।
वह मेरे प्रिय मित्र नीलोत्त्पल की छोटी बहन थी। उनकी बड़ी हवेली में मैं अक्सर आता-जाता था। मैं तब कलकत्ता में एक छोटे-से कमरे में रहता था, दिन भर चित्रकारी में डूबा हुआ। चारुलता मेरे आसपास फुदकती रहती। मैं कैनवास पर कुछ भी बनाता, वह चुपचाप पास आकर देखने लग जाती। धीरे-धीरे उसने रंगों की भाषा समझनी शुरू की, रेखाओं की लय पहचाननी शुरू की।
वक्त किसी रेखा की तरह आगे बढ़ता गया।
जब वह अठारह की हुई, तो मैंने पहली बार महसूस किया कि उसके भीतर कोई नई हलचल जन्म ले रही है। यह मासूम बचपन की लाड़ भरी निकटता नहीं थी; यह एक युवती का भावों की दहलीज़ पर खड़ा होना था – कमज़ोर नहीं, पर उलझा हुआ।
वह कई बार मुझसे बीते दिनों की तरह सहजता चाहती, पर हमारे बीच वर्षों का रिश्ता अब एक नई जटिलता में बदल रहा था, जिसे मैं समझते हुए भी अनदेखा करता। वह मुझसे प्रेम करने लगी थी। कई बार वह अकेली मेरे कमरे में आकर मेरे से चिपक जाती थी। मैं उसे अब भी एक जिम्मेदारी, एक संरक्षक-सी दूरी से देखता था, क्योंकि मेरे लिए वह हमेशा नीलोत्त्पल की छोटी बहन ही थी, मेरी शिष्या थी, मेरे रंगों की दुनिया में एक खिलती हुई कली।
मैं चारुलता से कैनवास, रंग, अमूर्तता और भावनाओं पर ही बात करता था। मैंने ही चारुलता की चित्रकारी को देखकर उसे उसकी ही पेंटिंग्स को नए नज़रिए से देखना सिखाया।
एक दिन चारुलता मेरा हाथ पकड़ कर बोली – “देब्येंदु दादा, आप तो रंगों की भाषा बहुत अच्छी तरह से समझते हैं। मुझे समझाओगे ना !”
मैंने चित्रों की भाषा पर बातें शुरू कीं।
“देखो, हर रंग कुछ कहता है। लाल सिर्फ़ लाल नहीं है – यह प्रेम भी है, पीड़ा भी, जुनून भी। नीला आसमान भी है, अकेलापन भी।”
मैंने आगे कहा – “एक रंग के पास कौन-सा रंग रखना है – यही कला है, यही ज़िंदगी भी।  हर एक पेंटिंग को रचते वक्त मैंने जिया है उसको। हर एक पेंटिंग के साथ गहरा लगाव महसूस करता हूँ मैं।”
चारुलता चुपचाप सुनती रही।
उधर चारुलता बड़ी हो रही थी – दिखने में भी, सोचने में भी। उसकी आँखें बड़ी थी। आँखों में चमक थी। वह दिखने में बहुत सुन्दर थी। वह 18 साल की होने के बाद मॉडलिंग करने लगी थी।
उसमें एक प्राकृतिक आकर्षण था  और मॉडलिंग की दुनिया में वह तेजी से खिलने लगी।
वह मेरे पास अपने पोर्ट्रेट बनवाती, घंटों एक ही मुद्रा में शांत बैठी रहती।
मैं उसे देखता तो हमेशा वही पुरानी बच्ची दिख जाती – हँसमुख, जिद्दी, सवालों से भरी – लेकिन चारुलता के मन में जैसे कोई अदृश्य उत्सुकता हर समय हलचल मचाए रहती थी।
वह न जाने क्यों मेरे सामने हमेशा नई-नई पोशाकें पहनकर आ जाती—कभी हल्की नीली साड़ी, कभी गहरे लाल सलवार-कमीज़, तो कभी कोई आधुनिक ड्रेस जो उसकी नयी उम्र की आत्मविश्वास भरी चमक को और उभार देती।
वह मेरे सामने खड़ी होकर बालों को कान के पीछे सरकाती और हल्की-सी मुस्कान के साथ पूछती –  “देब्येंदु दादा… आज मैं कैसी लग रही हूँ?”
मैं अपनी कूची रोक देता, उसे ऊपर से नीचे तक देखता – न किसी अर्थगर्भित निगाह से, बल्कि उसी पुराने स्नेह और सहजता के साथ जिसके साथ मैंने उसे वर्षों से जाना था और धीमे से कहता,  “बहुत सुन्दर।”
मेरे लिए यह एक सरल-सा उत्तर था, पर उसके चेहरे पर खिलने वाली संतुष्टि किसी अनकही चाहत का रूप ले लेती।
जिस उम्र में लड़की अपनी पहचान खोजती है,  उसी उम्र में चारुलता मेरी हर छोटी-सी प्रतिक्रिया को जैसे अपने लिये कोई गुप्त संकेत मान बैठी थी।
और मैं… मैं उसे समझता भी था और अनदेखा भी करता था –
क्योंकि कुछ रिश्ते फूलों की तरह होते हैं – छूने भर से उनकी दिशा बदल जाती है। उसके चेहरे पर उभरती युवा गंभीरता अब अनदेखी नहीं थी।
मेरे चित्रों को देखकर चारुलता कहती – “देब्येंदु दादा, आपकी चित्रकारी लाजवाब, कमाल का कॉम्बिनेशन रंगों का।” मेरी आँखों से फूटता आत्मविश्वास का उजास उसकी मन-चेतना को अनायास ही प्रसन्नता से भर देता था।
मैं चारुलता से कहता – “मुझे हर वक्त रंग घेरे रहते हैं। ये रंग मेरे से संवाद करते हैं।”    
चारुलता को पेंटिंग में रंगों का चुनाव समझ में आने लगा था। एक रंग के पड़ोस में दूसरा कौन-सा रंग आएगा, यह वह बहुत बेहतर समझने लगी थी।  
धीरे-धीरे चारुलता का व्यवहार बदलने लगा था।  वह अपने प्रेम को अब छुपा नहीं पा रही थी। एक दिन अचानक उसने सीधे कहा – “देब्येंदु दादा, अगर कोई आपसे 10 साल छोटी हो और आपको दिल दे बैठे — तो क्या करें?” — एक दिन चारुलता ने सीधा सवाल किया।
“देब्येंदु दादा, मैं आपके बिना भविष्य की कल्पना नहीं कर सकती। आप ही से शादी करना चाहती हूँ।”
मैं अवाक रह गया।
यह मांग नहीं थी। यह उसके भीतर जन्मे भय और उम्मीद का मिश्रित स्वर था।
मैं उसे समझाना चाहता था, पर वह सुनने की अवस्था में नहीं थी।
“तुम्हें समझाना चाहिए कि ये सही नहीं है।”
“और अगर मैं सब समझती हूँ, फिर भी दिल न माने?”
और फिर वह दिन आया जिसने सबको हिला दिया।
जब उसे मालूम पड़ा कि घरवालों ने उसकी शादी दीपगढ़ के राजकुमार से तय कर दी है,
वह बदहवासी में मेरे कमरे तक चली आई – तेज साँसें, बिखरे बाल, चेहरा लाल आँसुओं से भीगा हुआ।
दरवाज़ा खुलते ही वह मेरे सीने से चिपक गई और फूट-फूटकर रोने लगी।
उसकी देह काँप रही थी – जैसे भीतर कोई गहरा तूफ़ान फंस गया हो।
“देब्येंदु दादा… ” उसकी आवाज़ टूटी हुई थी, “कहिए न… मैं किसके सहारे जिऊँ?  मैं किसी और की नहीं हो पाऊँगी… आप क्यों नहीं समझते? “
उसकी पीड़ा इतनी प्रचंड थी कि उसने मेरे कंधों को पकड़कर जोर से झिंझोड़ दिया।
“आपके बिना… मैं बिखर जाऊँगी… मैं नहीं जानती फिर मेरे साथ क्या होगा… “
उसकी बातों में भय था – थकान, अस्वीकार का दर्द  और भविष्य के प्रति एक टीस भरी असहायता।
यह किसी नादान जिद का विस्फोट नहीं था; यह एक युवा हृदय का टूटना था – एक ऐसा टूटना जिसकी प्रतिध्वनि आज भी मेरे भीतर बजती है।
उस क्षण मुझे पहली बार एहसास हुआ – चारुलता मुझसे सिर्फ प्रेम नहीं करती…
उस क्षण पहली बार मुझे पूरी स्पष्टता से एहसास हुआ – चारुलता मुझसे जितना प्रेम करती है, उतना प्रेम शायद मैंने कभी अपने लिए सोचा भी नहीं था।
वह मेरे कंधों से लगी काँप रही थी और मैं उसके सिर और पीठ पर धीरे-धीरे हाथ फेरता हुआ  उसे शांत करने की कोशिश करता रहा।
काफ़ी देर बाद उसकी सिसकियाँ धीमी हुईं।
उसके चेहरे पर अभी भी भय और असहायता की छाया थी, पर उसकी साँसों की अनियमितता थोड़ी-सी थम गई थी।
मैंने उसके दोनों कंधों को थामकर उसे धीरे से अपने सामने किया और नरम आवाज़ में कहा – “चारु… सुनो मेरी बात।  मैं कोई राजसी ठाट-बाट वाला आदमी नहीं हूँ। मैं तो एक फक्कड़-सा चित्रकार हूँ – अपनी ही दुनिया में डूबा हुआ।  तुम्हें जीवन में जो सुख, जो सुरक्षा मिलनी चाहिए… वह मैं शायद तुम्हें न दे पाऊँ।”
वह फिर से रोने को हुई, पर मैंने उसके आँसू पोंछते हुए कहा – “और एक बात और – मैंने हमेशा तुम्हें अपनी छोटी बहन की तरह ही देखा है। रिश्तों की कुछ सीमाएँ होती हैं जिन्हें पार करना हम दोनों के लिए ही भूल होगी।”
वह मेरी आँखों में देखती रही – डूबी हुई, टूटी हुई।
मैंने उसके गाल पर हल्का-सा स्पर्श रखते हुए कहा – “तुम्हारे घरवाले जो सोच रहे हैं, उसमें तुम्हारी भलाई है। दीपगढ़ का राजकुमार तुम्हें एक सुरक्षित, आदरपूर्ण जीवन देगा। तुम्हें अपनी भावनाओं को समझदारी से सँभालना होगा, चारु।”
वह कुछ कहने ही वाली थी कि मैंने धीरे से उसकी उँगलियों को थाम लिया – “और सबसे ज़्यादा ज़रूरी बात – अगर तुम सचमुच मुझसे प्रेम करती हो, तो अपने आप को नुकसान पहुँचाने जैसी कोई बात मन में कभी नहीं लाओगी। प्रेम किसी को तोड़ता नहीं है, चारु… उसे संभालता है।”
मेरे शब्द शायद उसके तूफ़ान को पूरी तरह शांत नहीं कर पाए,  लेकिन उसके भीतर कहीं कोई गहरी गाँठ ढीली ज़रूर पड़ी।
वह मेरे सीने पर सिर रखे बहुत देर तक चुप पड़ी रही – मानो अपने भीतर के दर्द को शब्दों की जगह थकान में बदल देना चाहती हो।
फिर एक दिन ऐसा आया, जब दीपगढ़ के विख्यात और तेजस्वी राजकुमार रूद्र प्रताप सिंह के साथ,  चारुलता का विवाह परम वैभव और राजसी गरिमा के साथ संपन्न हुआ। समूची कोठी  सुगंधित पुष्पों, झिलमिलाते दीपों और मंगलध्वनियों से अनुप्राणित हो उठी। आकाश में उदीयमान सूर्य भी मानो इस पावन मिलन का साक्षी बनने को ठहर गया था। चारुलता, अपने मुख की सौम्यता और नेत्रों की शालीन चमक के साथ, स्वर्णाभ आभूषणों से अलंकृत, राजकुमार के संग अग्नि की पवित्र ज्वालाओं के समक्ष सप्तपदी के पावन बंधन में बंधी। समारोह में उपस्थित जनसमूह ने इस दिव्य युगल पर आशीर्वादों की धारा बहा दी। विवाह उपरांत, चारुलता विदाई के मधुर–वेदनापूर्ण क्षणों को हृदय में सँजोए, नए सपनों और नई भूमिकाओं के साथ दीपगढ़ के राजमहल की ओर प्रस्थान कर गई।


सुबह नींद की गहराई में खो जाने के कारण मैं देर से जाग पाया।
आज एग्जिबिशन का आख़िरी दिन था और रविवार भी। प्रदर्शनी को अच्छा प्रतिसाद मिल रहा था। आज चारुलता नीली साड़ी में खासी फब सी रही थी। उसके लंबे खुले बाल, चेहरे की गहरी नज़रें – आज वह खुद भी किसी पेंटिंग की तरह दिख रही थी।
आज चारुलता ने मुझसे कहा – “मैंने तुम्हारे बारे में मेरे पति रूद्र प्रताप सिंह को सब कुछ बता दिया है। तुम्हें मेरी अधूरी पेंटिंग्स को पूरा करवाने के लिए दीपगढ़ आना पड़ेगा। मैं तुम्हें दीपगढ़ आने के लिए गाड़ी भिजवा दूँगी।”
“मैं अगले महीने की दस तारीख से पहले नहीं आ सकता हूँ।”  
“ठीक है, देब्येंदु दादा, मैं अगले महीने की दस तारीख के बाद आपसे बात करके गाड़ी भिजवा दूँगी।”
12 तारीख को मैं दीपगढ़ पहुँच जाता हूँ। दीपगढ़ में मेरा स्वागत बहुत गर्मजोशी से हुआ।
दूसरे दिन रूद्र प्रताप सिंह हमें छोड़कर अपने जरुरी काम से निकल गये।
मैंने चारुलता की पेंटिंग्स को देखकर कहा – “कला सिर्फ़ रंग नहीं है – यह स्मृतियों, अधूरी कहानियों और दिल की परतों का संगम है।”  
मैं चारुलता की पेंटिंग्स देखता, सराहता, पर आलोचना भी करता रहा।  
मैंने कहा – “तुम्हारी पेंटिंग में गहराई है, पर डर भी है। डर को छोड़ो। ब्रश से मन की आवाज़ सुनो।”
धीरे-धीरे चारुलता की अमूर्त पेंटिंग्स में नए शेड्स, नई परतें आने लगी। उसने सीखा –  कैनवास पर उतारने से पहले खुद को पढ़ना ज़रूरी है।
उसकी पेंटिंग्स में अब उदासी भी थी, पर एक नई उम्मीद भी।
मैं पंद्रह दिन चारुलता के महल में रहा और उसकी सारी अधूरी पेंटिंग्स उससे पूरी करवाई। उसकी भी इच्छा है कि उसकी पेंटिंग्स की भी महानगर में एक प्रदर्शनी लगे।
चारुलता के महल में पंद्रह दिन ऐसे बीत गए कि पता ही नहीं चला। रूद्र प्रताप सिंह और चारुलता के बीच की केमिस्ट्री भी बहुत अच्छी थी। वहीं, मेरे साथ भी दोनों का व्यवहार बहुत ही अच्छा रहा।  चारुलता के विवाह को तीन वर्ष बीत चुके थे, किंतु उसके आँगन में अब तक किलकारियों की गूँज नहीं उतरी थी। समय अपनी गति से आगे बढ़ रहा था, पर उसकी सूनी गोद हर बीतते दिन के साथ और अधिक प्रश्नों से भर उठती थी।
फिर आने का वादा कर मैं उनके महल से बाहर निकला। दोनों पति-पत्नी मुझे गाड़ी में बैठाने बाहर तक आये। गाड़ी चल पड़ी। वे दोनों भी महल की ओर चल पड़े। वे दोनों जाते हुए  किसी अधूरी, पर खूबसूरत पेंटिंग की तरह लगे – शायद फिर मिलने की उम्मीद लिए हुए।