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Subedaar movie review

Summary: “सूबेदार” में अनिल कपूर की दमदार स्क्रीन प्रेजेंस, लेकिन कहानी है कमजोर

फिल्म “सूबेदार” में अनिल कपूर रिटायर्ड सूबेदार अर्जुन मौर्य के किरदार में नजर आते हैं, जो निजी दुख के बाद अपने कस्बे लौटते हैं, लेकिन वहां फैली गुंडागर्दी और भ्रष्टाचार उन्हें फिर से संघर्ष के रास्ते पर ला खड़ा करती है।

Subedaar Film Review: फिल्म में अक्सर हमें कई तरह के हीरो देखने को मिलते हैं, कुछ शांत, कुछ विद्रोही और कुछ ऐसे जो अपने गुस्से को हथियार की तरह संभालकर रखते हैं। फिल्म “सूबेदार” का किरदार अर्जुन मौर्य यानी अनिल कपूर इसी तीसरी श्रेणी में आता है। वह ऐसा आदमी है, जो रोज सुबह चार बजे उठने का आदी है, अपनी भावनाओं और गुस्से को काबू में रखता है। इस किरदार में अनिल कपूर की मौजूदगी शानदार है, हालांकि कहानी ही कई बार रास्ते से भटकती नजर आती है।

फिल्म की कहानी एक छोटे से उत्तर भारतीय कस्बे की है, जहां रिटायर्ड सूबेदार अर्जुन मौर्य एक पर्सनल लॉस के बाद घर लौटते हैं। वह सोचते हैं कि अब उनकी जिंदगी थोड़ी शांत होगी, रोजाना का रूटीन रहेगा और शायद बेटी श्यामा यानी राधिका मदान के साथ रिश्तों में आई दूरी भी धीरे-धीरे कम हो जाएगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता है। अवैध रेत खनन, लोकल गुंडागर्दी और सत्ता के छोटे-छोटे खेलों ने यहां की हवा को पहले ही भारी बना रखा है। 

फिल्म अपने भीतर कई गंभीर मुद्दे समेटने की कोशिश करती है, जिसमें भ्रष्टाचार, पिता-पुत्री के रिश्ते में दरार, सामाजिक असमानताएं, व्यक्तिगत शोक और बदले की भावना। इन सबको एक साथ पकड़ने की कोशिश में कहानी कई बार जल्दबाजी में आगे बढ़ती दिखती है। ऐसे कई मोड़ आते हैं, जिन्हें दर्शक पहले से ही भांप लेते हैं। 

“सूबेदार” फिल्म की सबसे बड़ी ताकत अनिल कपूर की एक्टिंग है। उम्र के इस पड़ाव पर भी उनके अंदर वही ऊर्जा और स्क्रीन प्रेजेंस दिखाई देती है। अर्जुन मौर्य के किरदार में वह भले ही कम बोलते हैं, लेकिन उनकी खामोशी बहुत कुछ कह जाती है। थकी हुई आंखें, कसी हुई जबान और अनुभव से भरा उनका व्यक्तित्व इस फिल्म में शानदार लगा है। 

राधिका मदान ने श्यामा के किरदार में अच्छी पकड़ दिखाई है। उनका चरित्र गुस्से, चोट और असुरक्षा से भरा हुआ है। हालांकि स्क्रिप्ट उन्हें हर बार गहराई से उभरने का मौका नहीं देती। आदित्य रावल प्रिंस के रोल में रंगीन अंदाज लिए हुए हैं। उनकी एक्टिंग कहीं-कहीं ओवर लगती है। वहीं मोना सिंह का किरदार बबली दीदी शुरुआत में दिलचस्प लगता है, लेकिन बाद में दबा दिया गया है।

निर्देशक सुरेश त्रिवेणी ने फिल्म के वातावरण को यथार्थवादी बनाने की कोशिश की है। धूल भरी सड़कें, तेज धूप और कस्बे की धीमी लेकिन तनावपूर्ण लय, ये सब मिलकर एक ठोस माहौल रचते हैं। शुरुआती एक्शन दृश्य भी काफी प्रभावशाली हैं, जहां शोर से ज्यादा ठहराव और तनाव का इस्तेमाल किया गया है। लेकिन फिल्म के दूसरे भाग को एडिटिंग की जरूरत है। आखिर में “सूबेदार” एक ऐसी फिल्म बनकर सामने आती है जिसमें जज्बा और शानदार एक्टिंग तो है, लेकिन कहानी पुरानी सी लगती है। 

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स्पर्धा रानी ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के लेडी श्रीराम कॉलेज ने हिन्दी में एमए और वाईएमसीए से जर्नलिज़्म की पढ़ाई की है। बीते 20 वर्षों से वे लाइफस्टाइल और एंटरटेनमेंट लेखन में सक्रिय हैं। अपने करियर में कई प्रमुख सेलिब्रिटीज़ के इंटरव्यू...