Hindi Kahani: मालिनी के पति महेश को शराब पीने की बुरी आदत थी| वो रोजाना शराब के नशे में मालिनी को पीटता था, और बहुत बुरा भला बोलता था। मालिनी घरों में काम करके जो भी कमाती थी, वो सारे पैसे छीनकर शराब में उड़ा देता था| ऐसे ही एक दिन महेश नशे की हालत में घर आया और लड़खड़ाते हुए मालिनी से बोला, ओ सुन मुझे उधार के पैसे चुकाने हैं, ला वो शादी का मंगलसूत्र निकालकर दे, मैं उसे बेचकर अपना उधार चुकाऊ।
मालिनी रोते हुए महेश को रोकने लगी, सुनो जी मेरे पास बस वही मंगलसूत्र हमारी शादी की निशानी है। उसे मैं कैसे आपको दे दूं? महेश ने जोर से मालिनी को धक्का दिया और गुस्से में बोला, मुझे मना करती है, अपने पति से जुबान लड़ाती है। महेश मालिनी को पीटने लगा।
उस संदूक में ही रखती है ना। रुक मैं अपने आप निकाल लेता हूं|
पिता की ऐसी हरकत देखकर बच्चे भी घबराकर रोने लगे। मालिनी की आंखों में आंसू थे, वो बच्चों को सीने से लगाए, सारी रात रोती रही| महेश मंगलसूत्र लेकर जा चुका था| रात भर मालिनी महेश का इंतजार करती रही, अगले दिन महेश घर लौटा तो उसके साथ एक लड़की भी थी| महेश मालिनी से बोला, चल सामान बांध और इन दोनों को यहां से लेकर चली जा| मैं सुप्रिया से शादी कर रहा हूं, अब ये मेरे साथ रहेगी|
महेश की बात सुनकर मालिनी रोने लगी और बोली, ये आप कैसी बातें कर रहे हो, आप ऐसे कैसे दूसरी शादी कर सकते हो, इन दोनो बच्चो को लेकर मैं कहां जाऊंगी,?
लड़की बोली, डार्लिंग अब इन सबको यहां से जल्दी दफा करो, मैं बहुत थकी हुई हूं|
महेश बोला, अरे तुम चिंता मत करो, मैं अभी के अभी इसे और इसके बच्चों को यहां से धक्के देकर निकालता हूं| चल निकल यहां से |
“मालिनी के पास अब एक ही रास्ता था कि वो इलाहाबाद अपने भाई विजय के पास चली जाए।” मालिनी अपने दोनों बच्चों, सुमित और निशा को लेकर भाई के घर पहुंचती है।
पर विजय की पत्नी शीला को मालिनी का अचानक से आ जाना पसंद नहीं आया! शीला ने विजय को रसोई में बुलाया और गुस्से से बोली, देखो जी ये तुम्हारी बहन यहां नहीं रह सकती, हमने कोई धर्मशाला नहीं खोल रखी है, इसे अभी के अभी यहां से भेजो, वरना मैं अपनी बेटी को लेकर मायके जा रही हूं।
पत्नी की बात सुनकर विजय बोला, शीला
तुम ये कैसी बातें कर रही हो। रात के अंधेरे में मैं मालिनी को कैसे जाने के लिए कह दूं। सुबह होने दो फिर मैं उससे बात करता हूं।
मालिनी सब सुन चुकी थी, वो रो पड़ती है। वो अपनी भाभी के पास जाती है, और कहती है, कुछ दिनों के लिए आप मुझे और मेरे बच्चों को यहां रहने दो जैसे ही मुझे कोई काम मिलेगा मैं अपने आप यहां से चली जाऊंगी।
मालिनी की भाभी ने मुंह बना लिया और रसोई से बाहर चली गई। मालिनी जानती थी कि वो ज्यादा दिन तक यहां नहीं रह सकती अगर वो यहां रुकी तो उसके भाई भाभी के रिश्तों में उसकी वजह से दरार आ जाएगी इसलिए वो रोजाना काम ढूंढने के लिए जाने लगी।
एक दिन मालिनी काम ढूंढने निकलती है, वो देखती है रास्ते में अचानक एक बूढ़ी महिला की तबीयत खराब है। मालिनी उनसे घर का पता पूछकर उन्हें उनके घर तक छोड़ती है।
महिला का नाम आशा देवी था। वो मालिनी से बोलीं, बेटी मैं ही ये महिला संस्थान चलाती हूं। जो बेसहारा औरतें गरीबी और दुख में होती हैं, ये मेरा छोटा सा संस्थान उन्हे आश्रय देने में सहायता करता है। वैसे बेटी तुम कहां रहती हो? तुम्हारा घर कहां है?
मालिनी रो पड़ती है, मानो कब से उसने अपने आंसुओ को समेटकर रखा हुआ हो। आशा देवी उसे संभालने लगती हैं, और हिम्मत देती हैं। वो मालिनी की सारी बात सुनकर बहुत दुखी होती हैं, और मालिनी को अपने पास उनके महिला संस्थान में रहने को कहती है।
मालिनी बेटी तुम यहां रहकर अपने बच्चो को कमाकर खिला पाओगी। उनकी परवरिश कर पाओगी। उन्हे पढ़ा लिखाकर बड़ा कर पाओगी। आज से तुम यहीं रहोगी।
आशा देवी की बात सुनकर मालिनी को थोड़ी हिम्मत मिलती है।
वो बच्चो को लेकर आशा देवी के महिला संस्थान में रहने लगती है। वहां रहकर मालिनी सभी महिलाओं के साथ मिलकर काम करती थी। आशा देवी के कहने पर अब मालिनी ने सुमित और निशा को स्कूल में डाल दिया था। दोनो बच्चे स्कूल जाने लगे। मालिनी सारा दिन मेहनत करती और बच्चो की देखभाल करती। धीरे धीरे कई साल बीत गए। आशा देवी अब इस दुनिया में नहीं थीं, पर जाते जाते वो महिला संस्थान की सारी जिम्मेदारी मालिनी को सौंप गईं। मालिनी ने अपने जैसी उन औरतों को रोजगार दिया, जिन्होंने जीवन में बहुत ठोकरे खाई थीं।
सुमित और निशा भी बड़े हो गए थे। दोनो कॉलेज पास कर चुके थे। मालिनी की बेटी निशा एक एयर होस्टेस बन चुकी थी, वो नौकरी के सिलसिले में अब बाहर रहती थी। बेटा सुमित एक बड़ा डॉक्टर बन चुका था। जीवन की ठोकरें खाते-खाते मालिनी के सिर के बाल पक गए थे पर उसे सुकून था कि उसके दोनों बच्चे अच्छी परवरिश से अपने मुकाम पर पहुंच चुके हैं। पर एक दिन फिर से मालिनी के बीते हुए कल ने उसके दरवाजे पर दस्तक दी। महेश मालिनी से मिलने आया।
मुझे माफ कर दो मालिनी, तुम्हारे जाने के बाद मुझे सुप्रिया की असलियत का पता चला । वो झूठी और मक्कार औरत थी। मेरे साथ चलो मालिनी हम फिर से एक साथ रहेंगे। मालिनी की आंखें लाल थीं। गुस्से में वो महेश से बोली, क्या कहा!? एक साथ रहेंगे। क्या तुम मेरे बच्चो का वो बचपन लौटा पाओगे, जो गरीबी और दुख में इन बच्चों ने भूखे प्यासे गुजारा। एक पति और एक पिता होने का फर्ज तुमने उसी दिन खो दिया था, जिस दिन तुमने मुझे और मेरे बच्चों को दर दर ठोकर खाने के लिए घर से निकाला था। अब मैं तुम्हें कह रही हूं यहां से चले जाओ और दोबारा कभी मुझे अपनी शक्ल मत दिखाना। सुमित इन्हें कह दे ये यहां से चले जाएं, वरना मुझे पुलिस को भी बुलाना आता है। सुमित बोला प्लीज आप यहां से चले जाइए और आज के बाद कभी भी मेरी मां को तंग करने की कोशिश मत करना वरना मैं भूल जाऊंगा कि कभी आप मेरे पिता थे।
सुमित घर का दरवाजा बंद कर लेता है। मालिनी अपने आंसू पोंछती है। ऐसा लग रहा था मानो जीवन में हर कदम पर मिली ठोकर ने उसके दिल को लोहे का बना दिया था, जो अब जीवन में किसी भी ठोकर से टूटने वाला नहीं था।
