surrogate mother
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

चार भाई बहन में सबसे छोटी मालिनी एक गोरी चिट्टी, तीखे नैन-नक्श वाली लम्बी-सी लड़की थी। पिता एक छोटे से किसान थे। बाकी बहनों की तरह उन्होंने मालिनी का विवाह भी पन्द्रह सोलह की कच्ची उम्र में ही कर दी थी। जिस लड़के महेश से मालिनी का विवाह हुआ वह भी उस समय इण्टर कर रहा था।

शादी के बाद माता-पिता ने महेश को बहुत समझाया की यदि आगे नहीं पढ़ना चाहते तो, कुछ तो आई. टी. आई. ही कर लो, पर महेश ने किसी की भी नहीं सुनी। मां बाप कब तक उसका खर्चा उठाते तो एक दिन उन्होंने महेश को अपने घर से बाहर निकाल दिया। उनकी यह सोच थी कि यदि इसे घर से बाहर निकाल देंगे तो वह मजबूरन कोई न कोई काम तो करेगा ही। महेश के साथ-साथ मालिनी और बच्चों को भी घर छोड़ना पड़ा।

“आपने अपने बेटे को निकाल तो दिया पर सोचा भी है कि वह कहाँ जायेगा?” पड़ोस में रहने वाले रामपाल ने कृष्ण कुमार यानी महेश के पिता से कहा।

“भाई साहब इंसान को जब तक ठोकर नहीं लगती वह कहाँ सँभलता है। इसे भी ठोकर लगना जरूरी है।” कृष्ण कुमार ने कहा।

महेश, मालिनी और तीन बच्चों को लेकर दूसरे शहर चला गया। वहाँ पर अपने एक दोस्त की मदद से एक प्राइवेट कम्पनी में नौकरी करने लगा। जीवन दाल-रोटी के सहारे ठीक-ठाक चल रहा था। तभी दुर्भाग्य ने फिर दस्तक दी और महेश की नौकरी छूट गई। महेश परेशान अब करें तो क्या करें?

उसकी पत्नी मालिनी ने समझाया भी, “देखो सब कुछ ठीक हो जाएगा, आप किसी दूसरी जगह पर काम देख लीजिए।”

“हाँ देख तो रहा हूँ पर कोई भी हाँ नहीं कर रहा है और मकान का किराया भी बढ़ता ही जा रहा है।”

“मेरा कुछ सामान है, उसी से काम चला लिया जायेगा। तब तक आपको कहीं न कहीं, कुछ काम तो मिल ही जायेगा।” मालिनी ने पति को दिलासा दिलाया।

कुछ माह इस तरह निकल गये लेकिन महेश को काम नहीं मिला। अब वह पिता के पास वापस नहीं जाना चाहता था। धीरे-धीरे वह शराब भी पीने लगा। बदकिस्मती से एक दिन शराब के नशे में वह ट्रेन के चपेट में आ गया। इतने बड़े हादसे से मालिनी बिल्कुल टूट चुकी थी। उसे समझ में नहीं आ रहा था की वह करे तो क्या करे?

उसी समय एक महिला पत्रकार से उसका परिचय हुआ। उसने उस पत्रकार को अपनी पीड़ा सुनाई।

“मैडम आप मुझे कहीं कोई भी काम दिला दो ताकि कम से कम मैं अपने बच्चों को तो पाल सकूँ।”

“ठीक है देखती हूँ कि मैं क्या कर सकती हूँ’ -महिला पत्रकार नेहा ने जवाब दिया।

मालिनी पढ़ी-लिखी तो थी नहीं कि कोई और काम मिल पाता। सो बहुत पता करने पर एक अस्पताल में लॉन्ड्री वर्क की जगह खाली मिली। मालिनी फिर नेहा के पास आयी।

“आओ मालिनी, कैसी हो?”

“ठीक हूँ मैडम जी।”

“मालिनी तुम लॉन्ड्री वर्क कर लोगी?”

“ये क्या होता है मैडम जी?”

“अरे मशीन से कपड़े धोने का काम, तुम्हें वहाँ अस्पताल के कपड़े यानी चादर, पर्दे आदि धोने सुखाने की नौकरी करनी है।”

“ठीक है मैडम जी, मैं कर लूंगी।”

अब मालिनी अस्पताल में लॉन्ड्री वर्क की नौकरी करने लगी। इसके बदले में उसे तनख्वाह छः हजार रुपए मिलते। वहाँ काम करते-करते उसका वहाँ के कई लोगों से परिचय भी बढ़ा। अपनी व्यवहार कुशलता से वह सबका दिल जीत लेती थी। लेकिन वह दिमाग से भी बहुत तेज थी। धीरे-धीरे उसने एक दो अस्पतालों से और भी सम्पर्क किया और दो-दो शिफ्ट में लॉन्ड्री वर्क यानी कपड़े धोने का काम करने लगी। इसके साथ ही उसे घर का काम भी करना पड़ता था। वह अब सन्तुष्ट थी कि वह अपने छोटे-छोटे बच्चों का पेटभर सकने में सक्षम हो गयी थी।

धीरे-धीरे शहर के अन्य बड़े-बड़े प्राइवेट अस्पतालों तक उसकी जान पहचान हो गई और वेतन भी अधिक मिलने लगा। बच्चे भी अब धीरे-धीरे बड़े हो रहे थे। अब खाना खाने के साथ-साथ उन्हें पढ़ाने का भी खर्च चाहिए था। उसकी दयनीय आर्थिक स्थिति के बारे में अस्पताल की डॉक्टर अभिलाषा बहुत अच्छे ढंग से जानती थीं।

कुछ समय बाद उनके अस्पताल में एक करोड़पति दम्पत्ति आया। उन्हें सरोगेट मदर की खोज थी। वे यह भी चाहते थे की जो सरोगेट मदर मिले वह स्वस्थ, सुंदर और चारित्रिक रूप से भी अच्छी हो। डॉ. अभिलाषा को जाने क्यों ऐसा लगा की अगर मालिनी को समझाया जाये तो वह इस काम को करने के लिए तैयार हो सकती है। और एक दिन डॉक्टर अभिलाषा ने उसे बड़े प्यार से अपने चेम्बर में बुलाया। मालिनी डरते डरते वहाँ पहुंची उसे डर लग रहा था कि आखिर डॉ. मैडम ने उसे क्यों बुलाया है? मालिनी को देखते ही उन्होंने उसे पास में बैठाया और बोलीं,

“मालिनी तुम्हारे चार बच्चे हैं?”

“जी मैम जी।” मालिनी ने कहा

“इतने कम पैसों में तुम्हारा गुजारा चल जाता है” -डा. अभिलाषा ने पाँसा फेंका।”

“चलता तो नहीं पर चलाना पड़ता है। करें तो करें भी क्या?” आपको तो पता ही है कि मैं पढ़ी-लिखी भी नहीं हूं मैम जी कि कुछ और भी काम कर सकूँ।” मालिनी की आँखों में आँसू थे।

डॉ. अभिलाषा को महसूस होने लगा था कि यहाँ काम बन सकता है।

“मैं तुम्हें एक काम बताती हूँ। यदि करोगी तो तुम्हारे पास पैसों की भरमार हो जायेगी।” डॉ. अभिलाषा ने कहा।

“बताइए मैम ऐसा क्या काम करना होगा मुझे।” कहने के साथ-साथ उसके मन में एक उत्सुकता भी जागृत हो उठी की ऐसा क्या काम डॉ. मैडम बताने वाली हैं जो कि उसको मालामाल कर सकता है।

“अरे कुछ खास नहीं, इस दुनिया में ऐसी बहुत सी ऐसी अभागिन और दुखी महिलाएँ हैं जो माँ नहीं बन सकती हैं। ऐसी ही एक महिला हमारे पास आई है। तुम अगर चाहो तो उनका भला कर सकती हो।” डॉ. अभिलाषा ने बड़ी ही चतुराई से कहा।

“वो कैसे मैडम जी?” – मालिनी ने पूछा।

“इसके लिए तुमको सरोगेट मदर बनना है। तुम्हें इसके लिए बहुत सारा पैसा मिलेगा। बहुत सारा मतलब लाखों रुपए। उन पैसों से तुम अपना मकान बना सकती हो। बच्चों को एक अच्छी शिक्षा दे सकती हो।” – डॉ. अभिलाषा ने अब अपनी बातों में मालिनी को पूरी तरह से लपेट लिया था।

अपने छोटे-छोटे बच्चों के भविष्य के लिए मालिनी ने डॉ. अभिलाषा की बात मान ली। अब वह दो-दो मकान तथा अच्छे बैंक बैलेंस की मालकिन है और अब धन दौलत का लालच उसपर इस कदर हावी हो चुका है कि सरोगेट मदर बनने को उसने अपना पेशा ही बना रखा है। मँहगे कपड़े व गहने की आदी हो रही मालिनी अब करोड़पति बनना चाहती है।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’