Hindi Best Story: घर खानदान की बात थी सो सामाजिक उलाहना से बचने के लिए दोनों ने शादी करके छुट्टी पाई।
‘मम्मी, आप वही काम करती हैं जिसको पापा मना करते है’, सुधा का स्वर तल्ख था। ‘मैंने क्या किया?’ जया बोली। ‘आपने सब्जी में इतना मिर्च क्यों डाला?’ सुधा के कथन पर उसके पापा सुरेन्द्र को मौका मिला जया के खिलाफ जहर उगलने का। वे अपनी रौ में आ गये।
‘ये डालेगी। न जाने किस जन्म का बैर निकाल रही है।’ सुरेन्द्र उखड़े। ‘आप तंबाखू खाते है इसलिए आपको जरा-सा भी मिर्च बर्दाश्य नहीं होता। अब क्या चुटकी भर भी न डालूं।’ जया ने सफाई दी। तभी जया का छोटा बेटा सोनू ऊपर के कमरे से नीचे आया। त्यौंरियां चढ़ाते हुये बोला, ‘मम्मी, आपको शर्म नहीं आती।’ ‘अब मैंने क्या किया?’ ‘नीचे का पंखा क्यों आन किया। आपको पता नहीं कि इनवर्टर चल रहा है।’ ‘रसेाई देखूं कि तुम्हारा इनवर्टर?’ जया खिसिया गई। यह रोज का किस्सा था। आये दिन
सुरेन्द्र तो कभी बच्चे कुछ-न-कुछ खामी निकाल कर जया को अंडर इस्टिमेट करते। जया कभी बर्दाश्त करती तो कभी झल्लाकर जवाब दे देती। उसका जवाब सभी को नागवार लगता। सुरेन्द्र कहते तुम्हारी बोली जहर है। जया उलट कर जवाब देती, ‘जहर था तो क्यों ब्याह कर लाये? खोज लेते
कोई जन्नत की हूर। दिन भर कोयल की तरह कू-कू करती।’
‘मिलता तो कर ही लेता।’ ‘इतना आसान होता तो मेरी जैसी को लाते ही क्यों? शादी के बाद सब पुरुष ऐसा ही कहते हैं।’ बात सच भी थी। जया 18 की चल रही थी। जब सुरेन्द्र 32 के थे। दोनो के मां-बाप मर चुके थे। लिहाजा दोनों को गरज थी। उस समय सुरेन्द्र ठेकेदारी करते थे। क्या कमाते थे क्या नहीं, किसी को पता नहीं था। न जया की चाची ने जानना उचित समझा न ही सुरेन्द्र के चाचा को
कोई गरज थी। घर खानदान की बात थी सो सामाजिक उलाहना से बचने के लिए दोनों ने शादी करके छुट्टी पाई। शादी भी ऐसी जिसमें न बारात आई न ही बाजा बजा। दोनों में रुपयों की
जरूरत होती। कौन रुपया लगायें? जया का भाई अभी इंटर में पढ़ रहा था। उसका खर्च चाचा-चाची संभालते। मंडप में बने अग्नि के बेदी के सात फेरे लगवाकर जया खूंटी की गाय की तरह सुरेन्द्र से बंध गई। शादी के बाद जया, सुरेन्द्र के किराये के मकान में आकर रहने लगी। सुरेन्द्र की कमाई उसे कभी समझ में नहीं आई। वे किसी तरह खींच-तान कर घर गृहस्थी का सामान जुटा देती।
इसके आगे की न वे सोचते न ही जया को मौका देते। जया कभी-कभार बाजार का मन बनाती तो वे मना कर देते। वजह वही, इतने रुपये नहीं है कि अतिरिक्त कुछ खर्च किया जाए। वह मन मसोस कर रह जाती। इस बीच सुधा का जन्म हुआ। दोस्तों से कर्ज लिया तब कहीं जाकर वह अस्पताल के खर्च से उबरे।
गृहस्थी की गाड़ी आहिस्ता-आहिस्ता सरकती रही। इस बीच जया तीन बच्चों की और मां बनी। इच्छा तो नहीं थी मगर शुरू के तीनों लड़कियां ही थी सो लड़के के आस ने उन्हें चार संतानों के लिए विवश किया। सुरेन्द्र के स्वभाव में रत्ती मात्र भी फर्क नहीं आया। कुछ उम्र का फासला तो कुछ सुरेन्द्र की कुंठा दोनों के बीच हमेशा किचकिच होती रही। सुरेन्द्र चाहते कि जया हमेशा उनके मन की करे। उनकी उक्ति थी कि मैं कमाता हूं इसलिए सब कुछ मेरी तरह होना चाहिए। यह एक तरह की तानाशाही थी। अच्छा खाना बनाना, घर को साफ-सुथरा रखना जया की आदतों में था। तिस पर सुरेन्द्र कोई न कोई खोट निकाल कर नीचा दिखाने की कोशिश करते। बच्चे बड़े हुए तो अपने
पिता को आदर्श माना। वजह थी कि उन्होंने परिवार चलाने के लिए छोटासा-छोटा काम करने से गुरेज नहीं किया। ठेकेदारी बंद होने के बाद उन्होंने ग्रिल का काम करना शुरू किया। जो काफी मेहनत का था। मेहनत से उन्होंने कभी जी नहीं चुराया। मगर वह यह भूल गए कि जब भूखों मरने की नौबत आई तब जया के भाई-बहन ने ही मदद की थी। हर स्थिति में सुरेन्द्र का साथ देने वाली जया के योगदान को नकारा नहीं जा सकता था।
जया ने घर संभाला। कम हो या अधिक हर हाल में खुश रहने की कोशिश की। सुरेन्द्र से अनाप शनाप फरमाईशें नहीं की। तिस पर सुरेन्द्र का रवैया या उसके मन को आहत करता। एक दिन सुरेन्द्र शाम का काम करके लौटे। आते ही जया से पानी मांगा। जया ने पानी का गिलास जैसे ही थमाया उन्होंने उसे जमीन पर पटक दिया। जया हतप्रभ जमीन पर बिखरे पानी को देखने लगी। ‘क्या घर में कुछ मीठा नहीं है’ सुरेन्द्र बमके। जया सहम गई। ‘एक गुड़ का टुकड़ा नहीं दे सकती?’ बच्चे भी पिता के समर्थन में खड़े हो गए।
‘मम्मी, पापा को गुड़ देने में आपका क्या जाता है?’
‘ध्यान नहीं आया।’ जया को आत्मग्लानि महसूस हुई। ‘इनसे पूछो इनका ध्यान कहां रहता है?’ सुरेन्द्र
अपने बेटे सोनू की तरफ मुंह करके बोले।
‘मम्मी आपकी वजह से घर में झगड़ा होता है’, सोनू का कथन जया के सीने में शूल की भांति चुभ गया। वह रूआंसी हो गई। ‘मेरी वजह से? नहीं दिया तो मांग नहीं सकते थे। गिलास पटकने का क्या मतलब है?’ जया ने तेवर कड़े किए। ‘थके-मांदे पापा आते हैं। एक आप हैं कि उनका कुछ ख्याल नहीं रखतीं?’
सुधा की भी भृकुटि तन गई। ‘दिन-भर तुम लोगों के लिए खटती हूं क्या तुम लोगों का फर्ज नहीं बनता कि मेरी मद्द करो।’ ‘पढ़ाई से फुर्सत मिले तब ना’ सुधा
बोली। ‘पढ़ाई करने वाले क्या घर का काम नहीं करते?’ ‘मम्मी, अब अगर मैं आटा गुंथू, सब्जी काटूं तब तो हो चुकी पढ़ाई। आप अच्छी तरह जानती हैं कि इस घर की आर्थिक विपन्नता दूर करने के लिए हम सबको अपने पैरो पर खड़ा होना कितना जरूरी है।’
जया ने घर संभाला। कम हो या अधिक हर हाल में खुश रहने की कोशिश की। सुरेन्द्र से अनाप-शनाप फरमाईशें नहीं की। तिस पर सुरेन्द्र का रवैया या उसके मन को आहत करता। एक दिन सुरेन्द्र शाम का काम करके लौटे। आते ही जया से पानी मांगा।
‘सब कहने की बात है। थोड़ा बहुत हाथ लगाने से पढ़ाई रूक नहीं जाएगी। यह सब तुम्हारे पापा का किया धरा है। उन्होंने तुम लोगों को सिर पर चढ़ा रखा है।’ सुरेन्द्र ने सुना तो उनका पारा
और गरम हो गया।
‘एक काम नहीं करेगी। तुम दिन भर करती क्या हो? उनका काम है पढ़ना, तुम्हारा काम है घर-गृहस्थी देखना।’ ‘आपको एक गिलास पानी तक भी नहीं दे सकती है?’
‘नहीं देगी’ उन्होंने ‘नहीं’ पर जोर देकर कहा। वह आगे बोले, ‘मैं उनको पढ़ाई छोड़कर पानी का गिलास हाथ में थामे नहीं देख सकता।’ जया मन ही मन भुनभुनाते हुए किचन में आई। पानी का दूसरा गिलास, गुड़ के साथ सुरेन्द्र को दिया। इस बीच उसके बच्चे मूक बने रहे।
जया का मन उदास था। जिस तरीके से सुरेन्द्र जब तब बच्चों के सामने उसे जलील करते रहते हैं उससे तो और ज्यादा। पति-पत्नी के संबंध चाहे जैसे हो मगर बच्चों के सामने ऐसी हरकत शोभा नहीं देता। वे तो यही सोचेंगे कि मां एकदम से मूढ़ है। यह परिवार चल रहा है तो पिता के बल पर। पर क्या
यही सच है? क्या बिना पत्नी के सहयोग से परिवार चल सकता है? हकीकत यह थी कि सुरेन्द्र एक
खुदगर्ज इंसान थे। उन्हें अपने आगे कोई नहीं दिखता। उन्होंने हमेशा दूसरों में ऐब देखा है। सोचकर जया का मन भीग गया। एक दिन ऐसे उदास क्षण में उसकी बड़ी बहन शारदा का फोन आया।
‘कैसी हो जया?’ शारदा पूछी। इतना कहना भर था कि जया की आंखें भर आईं। रूंधे कंठ से बोली, ‘आप तो जानती हैं इनका स्वभाव। बच्चों के सामने भी मुझे नहीं बख्शते। अपने तो अपने, बच्चे तक मुझे आंख दिखाने लगे हैं। कोई मेरी सुनता ही नहीं। नौकरानी से भी बदत्तर स्थिति हो गई है मेरी।’
‘तू भी हाथ पर हाथ धर कर बैठ जा। दिमाग ठिकाने आ जाएगा।’ ‘क्या ठिकाने आएगा? गुस्से में घर
का सामान वगैरह फेंकने लगते हैं। एक दिन मेरी पूजा की साम्रगी फेंक दी।’ ‘मत कर पूजा।’
‘कैसे न करूं। ये नास्तिक हैं तो क्या मैं भी बन जाऊं।’ ‘जब उन्हे पसंद नहीं है तो मत किया
कर।’ ‘इन्हें तो बहुत कुछ पसंद नहीं है।’ ‘तब तो झगड़े होते रहेंगे।’ ‘जीजी आप भी उन्हीं का पक्ष ले रही
हैं’, जया का स्वर शिकायत भरा था।
‘क्या करोगी। आखिर निभाना तो तुम्हें उन्हीं के साथ है। इतने दिन निभा लिया तो आगे भी उन्हीं की तरह रहो।’ ‘मेरी कोई अहमियत नहीं?’ इसका शारदा के पास कोई जवाब नहीं था। ‘बांयी आंख से कुछ सूझता नहीं। कई बार कह चुकी हूं डाक्टर को दिखाने के लिए। मगर किसी के पास फुर्सत नहीं। क्या इसमें भी मेरा ही दोष है?’ ‘मैं अगले हफ्ते आ रही हूं। तुम्हारे जीजा जी से कह कर किसी अच्छे डॉक्टर से दिखला दूंगी।’ ‘तुमने हमेशा हमारी मदद की है। अब बच्चे बड़े हो चुके हैं। उन्हें भी तो अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए।’ ‘जब नहीं समझ रहे हैं तो क्या करोगी।’ शारदा का स्वर टूटा हुआ था। शारदा का ही सहयोग था वर्ना सुरेन्द्र ग्रिल का कारखाना कभी भी खोल नहीं पाते। 50 हजार दिए तब कहीं जाकर कारखाना शुरू हो सका। तो भी सुरेन्द्र के दिल में जया के लिए कोई जगह नहीं थी। माना कि दोनों के बीच उम्र का लंबा फासला था। वैचारिक मतभेद होना स्वभाविक था। मगर यह बात सुरेन्द्र को शादी के पहले सोचना चाहिए था। मत करते शादी। खोज लेते कोई उपयुक्त वधू। तब तो उन्हें भी शादी की इतनी गरज थी कि न आगा देखा न पीछा। देखते भी क्यों? कौन
लड़की वाला उन्हें पूछ ही रहा था। न मां-बाप न घर मकान। जीवकापार्जन की आकाशवृत्ति।
आहिस्ता-आहिस्ता समय सरकता रहा। सुधा के साथ-साथ उनकी दोनों लड़कियां शादी के लायक हो गईं। मगर पहले सुधा का ही करना जरूरी था। सुरेन्द्र ने एक लड़का देखा। बात दहेज पर आकर रूक गई। सुरेन्द्र के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई। अब करें तो क्या करें। अगर एक में सब खर्च कर दिया तो दूसरी और तीसरी में क्या करेंगे। सोनू अभी पढ़ रहा था। उसके लिए भी पर्याप्त रुपया चाहिए था। एक बारगी उनके मन में ख्याल आया कि क्या जरूरत है लड़कियों के ब्याह करने
‘क्या अब भी आपको भ्रम है कि आपके बच्चे आपको अपना आदर्श मानते हैं।’ सुरेन्द्र के पास इसका कोई जवाब नहीं था। तभी सुधा का फोन आया। फोन जया की दूसरी बेटी ने उठाया। ‘मम्मी को फोन देना।’ सुधा की आवाज थी।
की। सब अपने अपने पैरों पर खड़ी कमा खा रही हैं। ज्यादा से ज्यादा लोग उलाहना ही देंगे? अब जब मुझमें इतना दहेज देने की कुव्वत नहीं है तो मैं क्या करूं। यही बात उन्होंने जया से कही तो वह आपे से बाहर हो गई। ‘आपको शर्म नहीं आती ऐसी बात सोचते हुए। इतना ही बोझ था तो पैदा होते ही मार देते। क्यों तीन-तीन लड़कियों के बाप बने।’ ‘बाप तुमने बनाया।’ वह ढिटाई पर उतर आए। ‘मैने?’ ‘हां तुमने। पहले ही लड़का पैदा कर देती तो मुझे क्यों तीन-तीन लड़कियो का बाप बनना पडता।Ó अब सुधा को
समझ में आया कि पापा के भीतर कोई असाधारण पुरुष नहीं जैसा कि वह मानती थी। बल्कि वह भी एक सामान्य पुरूष ही है जो लड़कियों को बोझ मानते हैं। यही से उसका मन उनके प्रति विरक्त होने लगा। बहरहाल शारदा और उसके भाई ने सुना कि सुधा की शादी दहेज के चलते नहीं हो पा रही है तो उन्होंने जया को आर्थिक मदद देने का भरोसा दिया। इस तरह से सुधा की शादी संपन्न हो गई। विदा होकर जब सुधा अपने ससुराल चली गई तब किंचित आत्मग्लानि भाव से सुरेन्द्र, जया के पास आए। क्षमा याचना की मुद्रा में बोले, ‘मैंने तुम्हें गलत समझा।’

‘तीस साल बाद आपको समझ में आया।’ जया ने तंज कसा। ‘पत्नी की अवहेलना करके एक पुरुष कभी भी अपने बच्चों के लिए आदर्श नहीं बन सकता। अगर ऐसा सोचता भी है तो यह उसका अहंकार है।’ ‘तुम ठीक कह रही हो। मैं अहंकारी था’, सुरेन्द्र दबे स्वर में बोले। ‘क्या अब भी आपको भ्रम है कि आपके बच्चे आपको अपना आदर्श मानते हैं।’ सुरेन्द्र के पास इसका कोई जवाब नहीं था। तभी सुधा का फोन आया। फोन जया की दूसरी बेटी ने उठाया। ‘मम्मी को फोन देना।’ सुधा की आवाज थी। ‘मम्मी, आप अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखना। मैं यहां अच्छे से हूं। मेरे पति के एक दोस्त आंख के बहुत अच्छे डाक्टर हैं। कह रहे थे कि तुम्हारी मम्मी को दिखला देना।’ सुनकर जया की आंखें भर आई। ‘लो अपने पापा से बात कर लो।’ ‘मम्मी, आज नहीं बाद में कर लूंगी। आज थोड़ी जल्दी में हूं। फोन रख रही हूं।’
‘सुधा, क्या तुम्हारे पास अपने पिता से भी बात करने का वक्त नहीं?’ सुधा ने फोन काट दिया। जया को सुधा की हरकत नागवार लगी। उसने फोन मिलाया। ‘सुधा, अगर तुम समझती हो कि हम दोनों अलग हैं तो आज के बाद कभी फोन मत करना।’
