Mulla Nasruddin
Mulla Nasruddin

Mulla Nasruddin ki kahaniya: सूदखोर जाफ़र को बेवकूफ़ बनाकर नसरुद्दीन महल की ओर चल दिया। बाज़ार में उसे अपने दोस्त अली के कहवाखाने में रोशनी दिखाई दी।

अली ने उसके लिए दरवाज़ा खोल दिया। दोनों गले मिले और अँधेरे कमरे में चले गए। पतली दीवार के दूसरी ओर से बोलने, हँसने और चीनी के बर्तनों के खड़कने की आवाज़ आ रही थी।
अली ने दरवाज़ा बंद करके चिराग जला दिया।
‘सब चीजें तैयार हैं। गुलजान के लिए मैं कहवाखाने में इंतज़ार करूँगा। यूसुफ लुहार ने उसे हिफ़ाजत से छिपाने के लिए एक अच्छी जगह तलाश कर ली है। तुम्हारे गधे पर हर वक्त ज़ीन कसी रहती है। वह मज़े में है। खूब खाता है और बहुत मोटा हो गया है। ‘
‘शुक्रिया अली । मैं नहीं जानता कि कभी तुम्हारे अहसानों का बदला चुका सकूँगा।’ ‘नसरुद्दीन, हमें
शुक्रिया के बारे में बहस नहीं करनी चाहिए। क्या तुम थोड़ा सा कहवा पियोगे ?’

वह बाहर चला गया और कहवा लेकर लौट आया।

दोनों धीरे-धीरे बातें करने लगे।

कुछ देर बाद नसरुद्दीन जाने ही वाला था कि दीवार के दूसरी ओर से उसे एक पहचानी हुई आवाज़ सुनाई दी। उसने कहवाख़ाने में खुलने वाला दरवाज़ा ज़रा सा खोला और कान खड़े कर लिए।

वह आवाज़ चेचक के दागों से भरे चेहरे वाले जासूस की थी।
क़ीमती लबादा पहने, पगड़ी और नकली दाढ़ी लगाए वह कुछ आदमियों से घिरा बैठा था और गुस्से से कह रहा था-
‘यहाँ जो आदमी नसरुद्दीन के नाम से घूमता फिरता है, जालिया है। असली नसरुद्दीन तो मैं हूँ। काफी अरसा हुआ मैंने अपनी गलतियों से तौबा कर ली है। इसलिए मैं असली नसरुद्दीन तुम्हें नसीहत करता हूँ कि मेरे नक्शे-कदम पर चलो। मेरी तरह कहो कि हमारा अमीर सचमुच अल्लाह का नायब है। वह निहायत अक्लमंद और समझदार है। मैं असली नसरुद्दीन तुमको भली सलाह देता हूँ । ‘
‘ओ हो,’ नसरुद्दीन ने धीरे से कहा और अली को कोहनी मारी। इसका ख़याल है कि मैंने यह शहर छोड़ दिया है। मुझे इन्हें अपनी याद दिलानी पड़ेगी। अली, मैं अपनी दाढ़ी, जरबख्त खिलअत और अमामा यहाँ छोड़ दूँगा। मुझे फटे-पुराने कपड़े दे दो। ‘
अली ने एक फटा-पुराना लबादा दे दिया, जिसे दीमक जगह-जगह से चाट चुकी थी, जिसकी ज़िंदगी पूरी हो चुकी थी।
नसरुद्दीन ने लबादा पहना और गली में चला गया। कहवाख़ाने का मालिक अपने ग्राहकों के पास लौट आया और होनेवाली घटना की प्रतीक्षा करने लगा।

कुछ देर बाद नसरुद्दीन एक गली में से आता दिखाई दिया। वह ऐसे आदमी की तरह पैर घसीट रहा था, जिसने दिन-भर सफ़र किया हो। उसने सीढ़ियाँ पार कीं और एक अँधेरे कोने में जा बैठा। किसी ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया।
जासूस कह रहा था, ‘मेरी गलतियों की कोई गिनती नहीं थी। लेकिन अब मैं उन पर शर्मिंदा हूँ। मैंने नेक बनने और अमीर, उनके वज़ीर, हाकिमों और सिपाहियों का हुक्म मानने का फ़ैसला कर लिया है। पहले मैं एक ऐसा आवारा था, जिससे लोग नफ़रत करते थे लेकिन अब मैं एक दीनदार मुसलमान की तरह ज़िंदगी बसर कर रहा हूँ।’
एक गाड़ीवान ने बड़ी सज्जनता के साथ कहवे का प्याला उसके सामने पेश करते हुए कहा, ‘ऐ बेमिसाल नसरुद्दीन, मैं कोकन से यहाँ आया हूँ। मैंने आपके इल्म की बहुत तारीफ़ सुनी है। लेकिन मैंने यह कभी नहीं सोचा था कि मुलाक़ात तो दूर एक दिन आपसे बातचीत का भी मौका मिल जाएगा। अब मैं हर एक से इस मुलाक़ात की चर्चा करूँगा और आपकी नसीहत दोहराऊँगा । ‘

‘बिल्कुल ठीक,’ जासूस ने कहा, कहा, ‘हर एक को बताओ कि नसरुद्दीन सुधर गया है। तोबा करके दीवान, मुसलमान और अमीरे-आज़म का वफ़ादार गुलाम बन गया है। जिससे भी मिलो, उसे यह खुशख़बरी सुनाओ। ‘
गाड़ीवान ने कहा, ‘मुझे आपसे एक सवाल पूछना है नसरुद्दीन । मैं एक दीनदार मुसलमान हूँ। कम अकल की वजह से कोई ऐसी हरकत नहीं करना चाहता, जो मजहब के ख़िलाफ़ हो । मैं जानना चाहता हूँ कि अगर मैं नहा रहा होऊँ और मुअज्जिन की आवाज़ सुन लूँ तो किस ओर मुइँ ?’


जासूस ने मेहरबानी से मुस्कुराते हुए कहा, ‘बेशक मक्का की ओर। ‘

‘अपने कपड़ों की ओर ।’ अँधेरे कोने से एक आवाज़ सुनाई दी, ‘घर तक नंगे जाने से बचने का यही सबसे अच्छा तरीका है। ‘
जासूस के बनावटी सम्मान के वातावरण की अपेक्षा न कर लोगों ने मुस्कराहट छिपाने के लिए अपने मुँह फेर लिए।
‘कौन बड़बड़ा रहा है उस कोने से ? ऐ भिखमंगे !’ घमंड से जासूस ने पूछा, ‘क्या तू नसरुद्दीन की काबलियत से टक्कर लेने की कोशिश कर रहा है?’
कोने में बैठे नसरुद्दीन ने कहवे का घूँट भरते हुए कहा, ‘उसके मुकाबिले में मैं बहुत नाचीज़ हूँ।’
किसान ने जासूस से पूछा, ‘ऐ पाक नसरुद्दीन, मुझे यह बताइए कि इस्लाम के मुताबिक जनाजे में शामिल होते वक्त सबसे अच्छी जगह कौनसी है? ताबूत के आगे या पीछे?’
जासूस ने जवाब देने के लिए प्रभावशाली मुद्रा में उँगली उठाई ही थी कि उससे पहले ही कोने में से आवाज़ आई-
‘अगर तुम ताबूत के अंदर नहीं हो तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम आगे हो या पीछे।’

कहवाख़ाने का मालिक अपनी तोंद सम्भालते कहकहा लगाने लगा। दूसरे लोग भी हँसी न रोक सके। कोने वाला आदमी हाजिरजवाब था और नसरुद्दीन का मुकाबिला कर रहा था।

जासूस का गुस्सा निरंतर बढ़ता जा रहा था। उसने धीरे से अपना सिर घुमाया, ‘अबे, तेरा नाम क्या है? मैं तेरी जबान काटने जा रहा हूँ। कहीं तुझे अपनी जुबान से हाथ न धोने पड़ें।’

फिर उसने लोगों की ओर मुड़ते हुए कहा, ‘मैं इसे एक ही तंजिया ( व्यंग्यात्मक) और चुमते हुए लफ्ज से ख़ामोश कर सकता हूँ। लेकिन इस वक्त हम पाक और संजीदा बातें कर रहे हैं इसलिए ऐसा करना ठीक नहीं है। हर चीज़ का मौक़ा होता है, इसलिए इस वक्त इस भिखमंगे की छींटाकशी का जवाब नहीं दूँगा। हाँ तो मैं क्या कह रहा था कि मैं नसरुद्दीन तुम लोगों को सलाह देता हूँ कि सब मुसलमानो, हाकिमों का हुक्म मानो । खुशहाली तुम्हारे घरों में उतर आएगी। नसरुद्दीन होने का झूठा दावा करने वाले आवारा की तरफ़ ध्यान मत दो। इसी तरह के एक आवारा ने हाल ही में गड़बड़ी मचाई थी। यह सुनकर मैं असली नसरुद्दीन यहाँ आ गया। लेकिन वह आवारा गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो गया । ऐसे सभी जालियों को पकड़कर अमीर के सिपाहियों के हवाले कर दो। ‘
‘बिल्कुल ठीक।’ नसरुद्दीन ने लबादा उतारकर फेंक दिया और रोशनी में आ गया।

सभी लोगों ने उसे पहचान लिया। सब लोग हैरान रह गए। जासूस पीला पड़ गया।

‘तो तुम हो असली नसरुद्दीन । ‘

नसरुद्दीन उसके पास आ गया। अली चुपचाप उसके पीछे आ खड़ा हुआ ।
जासूस घबराकर इधर-उधर देखने लगा। उसके होंठ काँप रहे थे। आँखें चारों ओर कुछ ढूँढ़ रहीं थीं। हिम्मत बटोरकर बोला, ‘हाँ, मैं ही सच्चा और असली नसरुद्दीन हूँ। बाक़ी सब जालिए हैं। तुम भी सब जालिए हो । ‘
‘भाइयो, अब किस बात का इंतज़ार है?’ नसरुद्दीन चिल्लाया, ‘इसने खुद कबूल किया है। पकड़ लो इसे, वरना बहुत बड़ा इल्जाम लगेगा। ‘

और फिर उसने जासूस की नकली दाढ़ी उखाड़कर फेंक दी।

कहवाख़ाने में मौजूद लोगों ने चेचक के दागों से भरे चेहरे, चपटी नाक और मक्कार आँखों को पहचान लिया। उससे उन्हें सख्त नफरत थी ।
‘इसने खुद कबूला है।’ नसरुद्दीन ने दायीं आँख मारते हुए कहा, ‘पकड़ लो इस नसरुद्दीन को ।’ फिर उसने दायीं आँख मारी।
कहवाख़ाने के मालिक अली ने ही सबसे पहले जासूस पर हाथ छोड़ा। जासूस ने अपने आपको छुड़ाने की बहुत कोशिश की लेकिन किसान, भिश्ती और कारीगर उस पर टूट पड़े। उस पर घूँसे पड़ने लगे। नसरुद्दीन सबसे ज़्यादा जोश से घूँसे चला रहा था।
‘नहीं- नहीं, मैं-मैं मज़ाक कर रहा था।’ जासूस कराहते हुए बोला, ‘मैं तो बस मज़ाक कर रहा था, मैं नसरुद्दीन नहीं हूँ। मुझे छोड़ दो। ‘

‘तुम झूठ बोलते हो ।’ नसरुद्दीन ने कहा और इस तरह घूँसे चलाने लगा जैसे नानबाई तेज़ी से आटा गूंधता है। ‘तुमने खुद कबूल किया है कि तुम नसरुद्दीन हो। हम सभी ने सुना है। यहाँ मौजूद हम सब अमीर के बहुत ही वफ़ादार हैं। हमें उसके हुक्म पर अमल करना चाहिए । इसलिए ऐ मुसलमानो, इस नसरुद्दीन की अच्छी तरह मरम्मत करो। इसे महल तक घसीटकर ले जाओ और सिपाहियों के सुपुर्द करो। अल्लाह और अमीर के नाम पर इसे अच्छी तरह पीटो।’

भीड़ जासूस को घीसटती हुई महल तक ले गई। रास्ते भर लोग उसे मारते-पीटते रहे।

जासूस के जाने के समय नसरुद्दीन ने एक ठोकर उसे मारी और कहवाख़ाने में लौट आया।

माथे का पसीना पोंछते हुए उसने कहा, ‘हमने उसकी इतनी मरम्मत कर दी है कि ज़िंदगी-भर नहीं भूलेगा । लगता है अब भी उसकी ठुकाई हो रही है । ‘
दूर से मारपीट की आवाज़ें और जासूस की चीखें सुनाई दे रही थीं। नसरुद्दीन को उससे बदला लेना था। अमीर के हुक्म की वजह से उसे बदला लेने का शानदार मौका मिल गया था।
अली ने खुशी से अपनी तोंद थपथपाई, ‘अच्छा सबक मिला बच्चू को । अब यह दोबारा मेरे कहवाखाने में क़दम रखने की हिम्मत नहीं करेगा। ‘

नसरुद्दीन ने पीछे वाले कमरे में जाकर कपड़े बदले और वह फिर बगदाद का आलिम मौलाना हुसैन बन गया ।

वह महल में पहुँचा तो हवालात से कराहने की आवाज़ सुनाई दी। उसने झाँककर देखा। सूजा हुआ और घायल बदन लिए जासूस नमदे पर पड़ा था। अर्सला बेग लालटेन लिए उसके पास खड़ा था।

नसरुद्दीन ने बड़ी मासूमियत से पूछा, ‘किबला अर्सला बेग, क्या मामला है भाई ?’
‘बड़ी बुरी ख़बर है मौलाना हुसैन। बदमाश नसरुद्दीन फिर शहर में लौट आया है। हमारे सबसे होशियार जासूस को उसने पीट डाला है। यह जासूस उस बदमाश के बुरे असर को दूर करने के लिए मेरे हुक्म से अपने आपको नसरुद्दीन बताकर वफ़ादारी की और मजहबी बातें कर रहा था। नतीजा आपके सामने है । ‘

‘हाय-हाय।’ जासूस अपना चेहरा ऊपर को उठाते हुए कराहा, ‘अब कभी उस दोजख़ी आवारा के सामने नहीं पहूँगा । अगली बार तो वह मुझे मार ही डालेगा। मैं अब जासूसी की नौकरी नहीं करूँगा। कल ही यहाँ से बहुत दूर चला जाऊँगा । जहाँ मुझे कोई न जानता हो, वहाँ मैं कोई भली सी नौकरी ढूँढ़ लूँगा । ‘

लालटेन की रोशनी में जासूस की हालत देखते हुए मुल्ला नसरुद्दीन ने मन-ही-मन कहा, ‘मेरे दोस्तों ने वाकई अच्छे ढंग से अपना काम पूरा किया है। अगर महल दो सौ क़दम दूर होता तो यह यहाँ तक ज़िंदा न पहुँचता । अब देखना है कि इसने सबक सीखा है या नहीं। ‘

उसने अफसोस ज़ाहिर किया और वहाँ से चला आया ।

सुबह को उसने खिड़की से उस जासूस को एक छोटी सी गठरी लेकर महल से निकलते देखा। वह लँगड़ा रहा था और अपनी छाती, कंधे और बगलों पर हाथ फेरता जा रहा था। बीच-बीच में दम लेने के लिए बैठ भी जाता था। सुबह की रोशनी फैलने से पहले ही उसने बाज़ार पार किया और दीवारों के साये में गुम हो गया।

नसरुद्दीन का विश्वास था कि दुनिया में बुरे लोगों की अपेक्षा अच्छे लोगों की संख्या अधिक है। सूदखोर जाफ़र और चेचक के दागों भरे चेहरे वाले जासूस और उनकी नीच रूहें ऐसे गंदे और अपवित्र उदाहरण थीं, जो आम नहीं हैं। उसे पूरा विश्वास था कि इन्सान में नेकी भी है। गलत और अनुचित व्यवस्था उसकी जिंदगी में बुराई का ज़हर भर देती है। उसे पूरी आशा थी कि वह समय भी आएगा जब इन्सान इस व्यवस्था को बदलेगा, इसे बेहतर बनाएगा और ईमानदारी तथा मेहनत से अपनी आत्मा को पवित्र बना लेगा।

मुल्ला नसरुद्दीन की याद हमेशा नेक और पवित्र रहेगी। उस हीरे की तरह, जो हमेशा दमकता रहता है।

ये कहानी ‘मुल्ला नसरुद्दीन’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Mullah Nasruddin(मुल्ला नसरुद्दीन)