Mulla Nasruddin ki kahaniya: नसरुद्दीन को आख़िरकार हरम में जाने का मौका मिल ही गया । वह इतने दिनों से इसी मौके की तलाश में था।
.पहरेदार अदब से झुककर एक ओर हट गए। पत्थरों की सीढ़ियाँ चढ़कर अमीर के पीछे-पीछे उसने लकड़ी का एक फाटक पार किया और एक खूबसूरत बगीचे में पहुँच गया।
नसरुद्दीन पर एक रंग आता था, एक जाता था। हिजड़े ने अखरोट की लकड़ी का नक्काशीदार दरवाज़ा खोला। अंदर अँधेरा था । वहाँ से कपूर, मुश्क और गुलाब की गहरी खुशबू आ रही थी। यही वह हरम था, जहाँ अमीर की खूबसूरत रखैलें क़ैद थीं।
नसरुद्दीन ने बड़ी होशियारी से कोनों, नुक्कड़ों और गलियों का हिसाब लगा लिया था कि अंतिम अवसर पर रास्ता न भूल जाए और अपने और गुलजान के ऊपर मुसीबत न बुला ले। वह मन-ही-मन याद करता जा रहा था – दाएँ-फिर बाएँ – यह रहा ज़ीना – जिस पर बुढ़िया का पहरा है- अब फिर दाएँ । ‘
एक महराबी दरवाज़े के सामने पहुँचकर हिजड़ा रुक गया ।
ऐ मेरे आका, ‘यही है वह । ‘
अमीर के पीछे-पीछे नसरुद्दीन ने भी उस दरवाज़े को पार किया, जिसके अंदर उसकी क़िस्मत क़ैद थी।
कमरा छोटा था। उसका फ़र्श और दीवारें कालीनों से ढकी हुई थीं। ताकों पर सींक की टोकरियों में तरह-तरह के ज़ेवर रखे थे। चाँदी का एक बड़ा आईना दीवार से लटक रहा था । बेचारी गुलजान ने इतनी दौलत सपने में भी नहीं देखी थी। नसरुद्दीन ने उसकी मोती जड़ी जूतियाँ देखीं तो सिहर उठा। जूतियों की एड़ियाँ घिसने का समय गुलजान ने यहीं बिताया था।
कमरे के एक कोने में रेशमी परदे की ओर इशारा करते हुए हिजड़े ने कहा, ‘वह वहाँ सो रही है। ‘
नसरुद्दीन को फुरफुरी आ गई। इतने पास थी उसकी प्रेमिका । उसने मन-ही-मन अपने आपको डाँटकर कहा, ख़बरदार नसरुद्दीन सब्र कर । फ़ौलाद बन जा।’
वह परदे के पास पहुँचा तो नींद में बेसुध गुलजान की साँसें सुनाई दीं। उसने मसहरी पर रेशम को उठाते- गिराते देखा । उसका गला भर आया। आवाज़ रुँध गई। आँखों से आँसू बहने लगे।
मौलाना हुसैन, ‘क्या बात है ! इतनी सुस्ती क्यों दिखा रहे हो?’ अमीर ने कहा।
‘बादशाह सलामत, ‘मैं उसकी साँसें सुन रहा हूँ। उसके दिल की धड़कनों को सुनने की कोशिश कर रहा हूँ। इसका नाम क्या है हुजूर?”
‘इसका नाम है गुलजान।’
‘नसरुद्दीन ने हौले से पुकारा, ‘गुलजान । ‘
मसहरी के ऊपरी हिस्से पर उठता- गिरता रेशम रुक गया। गुलजान जाग गई थी। वह साँस रोके पड़ी थी। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि वह सचमुच अपने प्रेमी की आवाज़ सुन रही है। वह सोच रही थी – शायद यह सपना है।
नसरुद्दीन ने फिर पुकारा, ‘गुलजान!’
इस बार गुलजान के होठों से हल्की सी चीख निकल गई। नसरुद्दीन ने जल्दी से कहा, ‘मेरा नाम मौलाना हुसैन है। मैं नया हकीम, नजूमी और आलिम हूँ। अमीर की खिदमत के लिए बगदाद से आया हूँ। तुम समझ रही हो ना गुलजान ! ‘ फिर वह अमीर की ओर पलटकर बोला, ‘किसी वजह से वह मेरी आवाज़ सुनकर डर गई है। मुमकिन है शहंशाह की गैरमौजूदगी में यह हिजड़ा उससे बेरहमी से पेश आया हो। ‘
अमीर ने जलती हुई आँखों से हिजड़े को घूरा। वह काँपकर ज़मीन पर झुक गया। बोलने तक की हिम्मत नहीं कर पाया।
नसरुद्दीन ने कहा, ‘ऐ गुलजान, तुम्हारे सिर पर मौत मँडरा रही है। लेकिन मैं तुम्हें बचा
लूँगा। तुम्हें मुझ पर पूरा यकीन करना चाहिए। मैं हर मुश्किल और मुसीबत पर काबू पा सकता हूँ।’
‘बगदाद के आलिम मौलाना हुसैन, मैं आपकी बातें सुन रहीं हूँ।’ गुलजान ने धीमी और महीन आवाज़ में कहा, ‘मैं आपको जानती हूँ। मुझे आप पर यक़ीन है। मैं यह बात शहंशाह की मौजूदगी में कह रही
हूँ, जिनके क़दम मुझे परदे के बीच की दरार से दिखाई दे रहे हैं।’
रेशम का पर्दा हिला और एक ओर सरक गया। नसरुद्दीन ने आहिस्ता से गुलजान का हाथ थाम लिया। वह सिर्फ उसका हाथ दबाकर ही अपने दिल की बात कह सकता था। उत्तर में गुलजान ने भी हौले से उसका हाथ दबा दिया।
नसरुद्दीन देर तक उसकी हथेली देखता रहा । वह मन ही मन सोच रहा था, गुलजान कितनी कमज़ोर हो गई है।
अमीर उसके कंधे पर से देख रहा था। उसकी गहरी साँसें नसरुद्दीन को अपने कानों पर सुनाई दे रही थीं।
उसने गुलजान की छोटी उँगली का नाखून अमीर को दिखाया और अपशकुन प्रदर्शित करनेवाली मुद्रा में सिर हिलाया ।
‘कहाँ दर्द होता है?’ मुल्ला नसरुद्दीन ने पूछा।
‘दिल में,’ लंबी साँस लेकर गुलजान बोली, ‘मेरा दिल ग़म और चाहत के
दर्द से भरा है। ‘
‘ तुम्हारे गम की वजह ?’
‘ वजह यह है कि मैं जिससे मुहब्बत करती हूँ, वह मुझसे दूर है। ‘
‘क्योंकि यह आपसे जुदा है, इसलिए बीमार है। ‘
खुशी से अमीर का चेहरा खिल उठा।
‘मैं जिससे मुहब्बत करती हूँ वह मुझसे जुदा है।’ गुलजान ने कहा,
कहा, ‘मुझे लग रहा है कि मेरा प्यारा इस वक़्त मेरे बिल्कुल पास है। लेकिन मैं न तो उसे गले लगा सकती हूँ, न उससे प्यार कर सकती हूँ। हाय, वह दिन कब आएगा, जब वह मुझे दिल से लगाएगा और अपने पास रखेगा।’
‘या अल्लाह !’ नसरुद्दीन ने बनावटी आश्चर्य से कहा, ‘इतने थोड़े से दिनों में ही बादशाह सलामत ने इसके दिल में कितनी मुहब्बत पैदा कर दी है। अल्लाह ! अल्लाह ! ‘
खुशी के मारे अमीर बाहर हो गए। वह एक स्थान पर खड़े नहीं हो पा रहे थे। आस्तीन में मुँह छिपाए, बेवकूफ़ों की तरह ही – ही करते हुए उछल-कूद कर रहे थे।
नसरुद्दीन ने कहा, ‘ऐ गुलजान, फ़िक्र मत करो। तुम जिससे मुहब्बत करती हो, वह तुम्हारी बात सुन रहा है । ‘
अपने आप पर काबू न रख पाकर अमीर बीच ही में बोल उठे, ‘मैं सब सुन रहा हूँ गुलजान, तेरी प्यार भरी बात सुन रहा हूँ।’
परदे के पीछे से नदी की कलकल जैसी हँसी सुनाई दी।
लेकिन नसरुद्दीन कहता गया, ‘ऐ गुलजान, तुम्हारे सिर पर ख़तरा मँडरा रहा है। लेकिन डरो मत। मैं मशहूर आलिम, नजूमी और हकीम मौलाना हुसैन तुम्हें बचा लूँगा।’
अमीर ने भी ये शब्द दोहराए, ‘हाँ-हाँ हम तुम्हें बचा लेंगे। ज़रूर बचा लेंगे। ‘
‘सुना तुमने?’ नसरुद्दीन ने कहा, ‘शहंशाह क्या फरमा रहे हैं? मुझ पर यक़ीन रखो, मैं तुम्हें ख़तरे से
बचा लूँगा। तुम्हारी खुशी का दिन बहुत नज़दीक है। फिलहाल बादशाह सलामत तुम्हारे पास नहीं आ
सकेंगे। क्योंकि मैंने उन्हें आगाह कर दिया है कि सितारों का हुक्म है कि वह किसी औरत का नक़ाब न छुएँ। लेकिन सितारे अपनी चाल बदल रहे हैं, जल्दी ही मुबारिक होंगे और तुम अपने प्यारे की बाहों में होगी।
जिस दिन मैं तुम्हारे लिए दवा भेजूँगा, उसका अगला दिन तुम्हारी खुशी का दिन होगा। मेरी बात समझ रही हो ना।’ दवा पाने के अगले दिन तुम तैयार रहना । ‘
खुशी से हँसती- रोती गुलजान ने कहा, ‘शुक्रिया मौलाना हुसैन, लाख-लाख शुक्रिया । बीमारियों का अचूक इलाज करने वाले हकीम, आपका शुक्रिया । मेरा प्यारा मेरे पास है, मुझे लग रहा है। जैसे मेरे और उसके दिल की धड़कनें एक हो गई हैं। ‘
अमीर और नसरुद्दीन वापस चल पड़े।
ख़्वाजा सरा दौड़कर फाटक पर आ गया और घुटनों के बल गिरकर गिड़गिड़ाया, ‘मेरे आका । ऐसा होशियार हकीम दुनिया में दूसरा नहीं है। तीन दिन से वह बिना हिले-डुले पड़ी थी। लेकिन अब बिस्तर छोड़कर उठ बैठी है। वह गा रही है। हँस-हँसकर नाच रही है। मैं उसके पास गया तो उसने मेरे कान पर घूँसा जड़ने की मेहरबानी की । ‘
‘ सचमुच वह मेरी ही गुलजान है, ‘ मुल्ला नसरुद्दीन सोचने लगा, अपने घूँसों का इस्तेमाल करने में वह हमेशा फुर्ती दिखाती है।
सुबह के खाने के समय अमीर ने सभी दरबारियों को बख्शीश दी। नसरुद्दीन को उन्होंने दो थैलियाँ दीं। एक बड़ी थैली चाँदी के सिक्कों से भरी थी और दूसरी छोटी थैली में सोने के सिक्के थे।
अमीर ने हँसते हुए कहा, हा हा हा हा हमने भी कैसी ज़ोरदार चाहत जगा दी है उसमें। तुम्हें भी मानना पड़ेगा मौलाना हुसैन, ऐसी बात तुमने अक्सर नहीं देखी होगी। कैसी काँप रही थी उसकी आवाज़ । जैसे वह एक साथ हँस भी रही हो और रो भी रही हो। लेकिन उस नज़ारे के मुक़ाबिले यह कुछ भी नहीं है, जो तुम ख़्वाजा सरा के ओहदे पर पहुँचकर देखोगे।’
दरबारियों में काना-फूसी होने लगी । बख़्तियार काइयाँपन से मुस्कुराया । मुल्ला नसरुद्दीन समझ गया कि उसे ख़्वाजा सरा बनाने की सलाह अमीर को किसने दी है।
अमीर ने कहा, ‘अब उसकी तबियत सँभल गई है। तुम्हें इस ओहदे को सँभालने में देर नहीं करनी चाहिए, मौलाना हुसैन। तुम इसी वक्त हकीम के साथ जाओ। ‘
फिर उन्होंने हकीम से कहा, ‘जाओ, तुम अपने चाकू ले आओ। और बख़्तियार तुम वह हुक्म लिखकर मेरे पास लाओ।’
गर्म कहवे से नसरुद्दीन का हलक जल गया। वह खाँसने लगा।
लिखा हुआ हुक्म लेकर बख्तियार आगे बढ़ा। खुशी और बदले की आकांक्षा से उसका दिल बल्लियों उछल रहा था। उसने अमीर को क़लम दे दी। उन्होंने दस्तख़्त किए और हुक्मनामा बख्तियार को लौटा दिया।
‘मौलाना हुसैन, खुशी की इन्तिहा से शायद बोल भी नहीं पा रहे हैं। तो भी अदब की माँग है कि शुक्रिया अदा करें ।’ बख्तियार बोला ।
नसरुद्दीन तख़्त के सामने झुक गया।
‘आख़िर मेरी तमन्ना पूरी हो गई। मुझे सिर्फ इस बात का गम है कि अमीर की रखैल के लिए दवा तैयार करने में देर हो जाएगी। उसके इलाज के बारे में मुझे पूरी तसल्ली होनी चाहिए। वरना बीमारी फिर घर कर जाएगी । ‘
‘क्या दवा बनने में इतनी देर लगेगी?’ परेशान होकर बख्तियार ने कहा,
‘आधे घंटे में तो दवा ज़रूर तैयार हो जाएगी। ‘
‘हाँ, आधा घंटा काफ़ी होगा।’ अमीर ने समर्थन किया।
नसरुद्दीन ने अपना सबसे अधिक कारगर, अंतिम हथियार इस्तेमाल करते हुए कहा, ‘ऐ-आका – ए – नामदार, यह तो सितारे सादे (बारहवें नक्षत्र) पर मुन्हसिर हैं। उसकी वजह से दवा तैयार करने में मुझे दो से पाँच दिन तक लग सकते हैं।’
‘पाँच दिन ?’ बख़्तियार चिल्ला उठा, ‘मौलाना हुसैन, दवा तैयार करने में पाँच दिन लगते मैंने कभी नहीं सुने । ‘
नसरुद्दीन ने अमीर की ओर मुड़कर कहा, ‘अमीरे-आजम, शायद उस नई रखैल का इलाज वज़ीर बख्तियार से कराना पसंद करें। यह कोशिश करें तो शायद उसे चंगा भी कर दें। लेकिन उस हालत में उसकी ज़िंदगी की जिम्मेदारी मैं नहीं लूँगा।’
अमीर घबरा उठे, ‘क्या कहा मौलाना हुसैन ? बख़्तियार दवा-दारू के बारे कुछ भी नहीं जानता। यह बात माबदौलत तुम्हें पहले भी बता चुके हैं। जब तुम्हें वज़ीरे-आज़म का ओहदा देने की बात कही थी। ‘
बख़्तियार काँप उठा। उसने ज़हर बुझी नज़रों से नसरुद्दीन की ओर देखा, ‘तुम इससे कम वक्त में दवा तैयार नहीं कर सकते?’ अमीर ने कहा, ‘हम चाहते हैं अपने नए ओहदे को तुम जल्द से जल्द सँभाल लो। ‘
‘शहंशाहे – आज़म, मैं तो उस ओहदे के लिए खुद ही उतावला हो रहा हूँ । मैं जल्द-से-जल्द दवा तैयार करने की कोशिश करूँगा ।’ नसरुद्दीन ने कहा और कोर्निश करके दरबार से चल पड़ा।
रास्ते में गुस्से से दाँत किटकिटाते हुए नसरुद्दीन कह रहा था – ‘बख़्तियार ।
साँप के बच्चे! दगाबाज़ लकड़बग्घे ! तेरा दाँव ख़ाली गया। अब तू मुझे नुकसान नहीं पहुँचा सकेगा। मैं जो भी जानना चाहता था, जान गया हूँ। अमीर के हरम में जाने और वापसी के रास्ते मुझे मालूम हो चुके हैं। ‘
वह मीनार के पास पहुँचा तो मीनार के नीचे पहरेदार पासे खेल रहे थे। उनमें से एक सब कुछ हार चुका था। दाँव पर लगाने के लिए अब अपने जूते उतार रहा था।
नसरुद्दीन सीढ़ियाँ चढ़कर बगदाद के आलिम के कमरे में पहुँचा ।
बूढ़े की शक्ल वहशी (जंगली) इन्सान जैसी दिखाई दे रही थी। कैद में रहते-रहते उसकी दाढ़ी और बाल बढ़ गए थे। भौंहों के नीचे आँखें चमक रही थीं।
नसरुद्दीन के देखते ही उसने गालियों की बौछार शुरू कर दी, ‘हरामजादे, तू मुझे यहाँ कब तक बंद रखेगा? खुदा करे तेरे सिर पर पत्थर पड़ें और तलवों से निकलें। बदमाश, दगाबाज़, तूने मेरा नाम, मेरी पोशाक, मेरा साफा, मेरा पटका चुरा लिया? तेरे बदन में कीड़े पड़े। तेरा जिगर और पेट सड़ जाएँ । ‘
नसरुद्दीन ऐसी गालियाँ सुनने का अभ्यस्त हो चुका था। उसने बुरा नहीं माना।
‘किबला मौलाना हुसैन, आज मैंने आपके लिए एक नई सजा तय की है। रस्सी के फंदे में लकड़ी बाँधकर आपका सिर दबाया जाएगा। पहरेदार नीचे बैठे हैं। आपको इतनी ज़ोर से चीखना चाहिए कि वे सुन लें। ‘
बूढ़ा सलाखों वाली खिड़की के पास चला गया और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा, ‘या अल्लाह, मुझे कितनी तकलीफ हो रही है। हाय-हाय मेरा सिर मत दबाओ। रस्सी के फंदे से मेरा सिर मत दबाओ । मर गया ऐसी तकलीफ़ से तो मौत अच्छी है। ‘
मुल्ला नसरुद्दीन ने बीच में टोका, ‘ठहरिए मौलाना, आप चिल्लाने में भी सुस्ती करते हैं। आपकी इन चीखों से यकीन नहीं होता कि आपका सिर सचमुच बेरहमी से दबाया जा रहा है। ऐसे मामलों में पहरेदार बहुत ही तजुर्बेकार हैं। अगर उन्हें शक हो गया कि आपकी चीख-पुकार बनावटी है तो वे अर्सलाबेग को ख़बर दे देंगे। और फिर आपको जल्लादों को सौंप दिया जाएगा। ज़ोर से चिल्लाने में ही आपकी भलाई है। देखिए, मैं चिल्लाकर बताता हूँ । ‘
वह खिड़की के पास चला गया। साँस भरी और इतनी जोर से चीखा कि बूढ़ा कान बंद करके पीछे हट गया।
‘अबे काफ़िर की औलाद !’ बूढ़े ने शिकायत भरे लहजे में कहा, ‘मैं ऐसा गला कहाँ से लाऊँ? इस तरह कैसे चिल्लाऊँ कि आवाज़ शहर के दूसरे छोर तक पहुँच जाए?’
‘अगर असली जल्लादों के हाथ नहीं पड़ना चाहते तो यही एक सूरत है।’ बूढ़े ने इस बार पूरा जोर लगा दिया। वह इतनी दर्द भरी आवाज़ में चिल्ला रहा था कि मीनार के नीचे बैठे पहरेदारों ने जुआ खेलना बंद कर दिया और उसके दर्द का मज़ा लेने लगे।
चीखते- चीखते बूढ़े को खाँसी आ गई, गला घरघराने लगा। रिरियाते हुए बोला, ‘हाय-हाय, अबे नाकिस आवारा, अब तो खुश है तू । इजराइल ( मौत का फ़रिश्ता) तुझे उठाले । ‘
‘हाँ, मुझे अब इत्मीनान हो गया। अपनी कोशिश के लिए यह इनाम लीजिए।’ नसरुद्दीन ने कहा और अमीर से मिली दोनों थैलियाँ एक कश्ती में उडेलकर दो हिस्सों में बाँट दीं।
‘मौलाना, आपके नाम पर मैंने बट्टा नहीं लगाया है। आप यह रकम देख रहे हैं? अमीर ने यह रकम मशहूर नजूमी और हकीम मौलाना हुसैन को अपने हरम की एक लड़की का इलाज करने के लिए दी है। ‘
‘तूने लड़की का इलाज किया था? जाहिल, बदमाश ठग, तू बीमारियों के बारे में क्या जानता है?’
‘मैं बीमारियों के बारे में तो कुछ भी नहीं जानता। लेकिन लड़कियों के बारे में बहुत कुछ जानता हूँ। मैंने उस लड़की को यों ही अच्छा नहीं किया बल्कि सितारों की हालत समझकर अच्छा किया है। कल रात मैंने देखा कि सितारे सादस्सअद (बृहस्पति) साद – उल – अकबिरा (वृश्चिक) के केरान (योग) में थे और वृश्चिक सरतान (कर्क राशि) की ओर मुखातिब था । ‘
गुस्से से बौखलाकर बूढ़ा चिल्लाया, ‘क्या कहा जाहिल ? तू सिर्फ गधे हाँकने के काबिल है। तू नहीं जानता कि बृहस्पति वृश्चिक के केरान (योग) में जा ही नहीं सकते। ये एक ही केरान के सितारे हैं। कर्क राशि तुझे इस महीने में कैसे दिखाई दी। कल सारी रात मैंने आसमान देखते हुए बिताई है। सितारे साबदुला और अस्तिमय केरान में थे और अल जबह उतार पर सुनहरा है, काठ के उल्लू । अब इस वक्त है ही नहीं। गधे हाँकने वाले ने उन मामलों में भी दख़ल देना शुरू कर दिया है, जिनका उसे इल्म ही नहीं है। सितम अलबुतैन के जो अल हक के ख़िलाफ़ है तू अकबर समझ बैठा ।
नसरुद्दीन की मूर्खता को प्रदर्शित करने के इरादे से बूढ़ा देर तक उसे सितारों की सही स्थिति समझाता रहा। वह एक-एक शब्द को दिमाग़ में बैठाता रहा ताकि आलिमों के सामने अमीर से बात करते समय गलती न कर बैठे।
‘जाहिल ! जाहिल की औलाद ! तेरी सात पीढ़ियाँ जाहिल हैं।’ बूढ़ा अप्रसन्नता से बड़बड़ाता रहा, ‘तू यह भी नहीं जानता कि आजकल यानि चाँद की उन्नीसवीं मंज़िल में जो अश्शुला कहलाती है और जो धनुराशि में है इन्सान की किस्मत इसी राशि के सितारों के मातहत होती है। आला दानिशमंद शहाबुद्दीन महमूद अलदराजी ने अपनी किताब में यह बात साफ़-साफ़ लिखी है । ‘
नसरुद्दीन याद करता गया ।
‘शहाबुद्दीन महमूद अलदराजी ! कल मैं अमीर की मौजूदगी में उस दाढ़ीवाले आलिम का इस किताब के न जानने पर भंडाफोड़ करूँगा। उसके दिल और दिमाग़ में मेरे लिए इज़्ज़त और डर पैदा हो जाएगा। यह बहुत अच्छी बात होगी । ‘
