mevaalaal kee mithaee Motivational story
mevaalaal kee mithaee Motivational story

अगर आप मुझसे बचपन के बारे में पूछें तो झट से मेवालाल की तसवीर आखों के आगे साकार हो जाती है। और मेवालाल को याद करते ही याद आती है, मेवालाल की मिठाई। बड़े होकर न जाने कहाँ-कहाँ घूमा-भटका, न जाने कहाँ-कहाँ के पकवान और मिठाइयाँ खाईं, जिनके नाम याद रख पाना ही मुश्किल है।

इडली, डोसा – साँभर, ढोकला, ‘बाजरे दी रोटी ते मक्की दा साग’ से लेकर चमचम, ढोढा बरफी, कराची हलवा और राजभोग तक। मगर इनमें वह बात कहाँ, जो बचपन की मेवालाल की मिठाई में थी! ओह, वे दिन! शाम को मेवालाल आता तो हमारे पूरे मोहल्ले में जैसे हलचल मच जाती। कुछ भारी-भरकम शरीर वाला हँसमुख मेवालाल। खासा खुश मिजाज। हँसता तो उसका पूरा शरीर भी हिलता था, देर तलक। सफेद पाजामे पर नीली कमीज और बंडी पहने वह किसी आसमानी फरिश्ते की तरह प्रकट होता और अपनी बैठी हुई आवाज में “ले लो दाल – सेव… मुरमुरे, तिल के लड्डू…!” पुकारकर दूर से ही अपने आने की सूचना दे देता था। पर अकसर तो उसे आवाज देने की जरूरत ही न होती। शाम के समय हमारे मोहल्ले में भला कौन था, जो उसका इंतजार न कर रहा होता? हम सब बच्चे उसके फैन थे। और वह बे – नागा आता। आता जरूर, चाहे भीषण गरमियों की तपिश हो या जाड़े की ठिठुरन … या बारिशों के दिन। हर मौसम को चिढ़ाता उसका ठेला ठीक समय पर नमूदार होता और हम सब अपने बस्ते, कॉपी-किताबें, या फिर अपने-अपने कील – काँटे, कबड्डी, गेंदतड़ी और न जाने कौन-कौन से अटरम-पटरम खेलों को जहाँ का तहाँ छोड़कर उसकी ओर भाग लेते और उसके ठेले को घेरकर खड़े हो जाते।

वह हमारा हीरो था और उसकी मौजूदगी में बाकी की तमाम – तमाम चीजों को भला कौन पूछे? यों भी बच्चों से उसकी दोस्ती बड़ी जल्दी हो जाती थी। झटपट। वह बच्चे की शक्ल देखकर ही बता सकता था कि इसे दाल – सेव चाहिए, मूँगफली …या फिर मूँगफली की पट्टी, या गुड़धानी… या फिर रामदाने के लड्डू, बेसन की बरफी, रेवड़ी, गजक या मूँगफली का गट्टा? लाई – चने से लेकर खोये के पेड़े या बूँदी के ताजा लड्डू तक सब कुछ उसके पास था। और यह सब रखा रहता था बड़े – बड़े कनस्तरों को काटकर बनाए गए उन टीन के डब्बों में, जिन पर नीले ढक्कन चढ़े होते थे। ढक्कन खुलते ही हम उत्सुक हो उठते थे कि देखें, इस करिश्माई खुल जा सिमसिम में से कौन सा खजाना बाहर निकलकर आता है। मेवालाल का ठेला शाम को पूरे मोहल्ले के बच्चों का संगमस्थल होता। जैसे सारी नदियाँ समुद्र में मिलती हैं, ऐसे ही सारे बच्चे मेवालाल के ठेले पर आ जुड़ते। यही हमारे मोहल्ले के बच्चों का उत्सव था।

हम भाई-बहन भी सबके देखते-देखते अपनी तख्ती, स्लेट या किताब – कॉपियाँ परे फेंक, झट से दौड़ पड़ते थे मेवालाल की मिठाई खाने के लिए। जेब में मुश्किल से अधन्नी या इकन्नी होती थी। मगर उत्साह ऐसा, जैसे एवरेस्ट फतह करने जा रहे हों। … यों भी जेब में चाहे कुछ भी हो, चाहे एक छुटकू सा निक्का पैसा ही, मगर मेवालाल के ठेले से कोई खाली हाथ नहीं लौटता था। कभी खोए का पेड़ा, कभी बेसन का लड्डू, कभी गुड़ के सेव, कभी मुरमुरे और मूँगफली की पट्टी। और कुछ नहीं तो दो-चार संतरे की गोलियाँ, खटमिट्टी लेमनचूस या अनारदाने का चूरन तो मेवालाल हथेली पर धर ही देता था। मगर कभी-कभी तो पैसे भी नहीं होते थे। जेब में हाथ डालने पर अचानक याद आता, ओहो जी, हम तो अभी थोड़ी देर पहले ही कुलफी या ठंडी मलाई वाली बरफ खा चुके हैं। या कि गोलगप्पे उड़ा चुके हैं! या कि नई वाली तिरंगी पतंग और मंझा आज ही खरीदा गया है। मगर मेवालाल के ठेले का स्वागत भला कैसे न किया जाए। तो अब क्या हो? एक क्षण के लिए चेहरे पर हताशा आती, पर अगले ही पल हम उत्साह से अपनी पुरानी कॉपियाँ टटोलने लगते थे। दो-चार पतली-पुरानी कॉपियाँ मेवालाल के ठेले पर ले जाने पर और कुछ नहीं तो चार-छह लेमनचूस या फिर गुड़ के सेव तो मिल ही जाते थे। या फिर थोड़ा सा मूँगफली का गट्टा, जिसे खाना नहीं, देर तक चबाना होता था और मुँह भले ही थक जाए, पर वह खत्म होने में नहीं आता था। हालाँकि पुरानी कॉपियों के चक्कर में कभी-कभी कुछ गड़बड़झाला भी हो जाता था। उनके साथ बहुत सारी काम की चीजें भी चली जातीं। बड़ी आफत हो जाती, जो देर तक दिल में करकती रहती। और एक बार तो मेरे साथ भी यही हुआ। * मुझे याद है, वह कड़की का समय था। जेब खाली, एकदम खाली थी और मेवाराम की मिठाइयाँ दूर से दिल ललचा रही थीं।

तब मैंने बड़ी हिम्मत की। पिता जी की हिसाब किताब की पुरानी कॉपी अलमारी में पड़ी थी। उसके आगे-पीछे के पन्ने भी कुछ-कुछ फटे हुए थे। बेकार, एकदम बेकार…! ‘भला घर में ऐसी खराब सी पुरानी कॉपी रखने की क्या तुक है, जबकि सामने मेवालाल की मिठाइयों का छबीला ठेला खड़ा है!’ मैंने सोचा। और अगले ही पल पिता जी की हिसाब-किताब की वह पुरानी कॉपी मेवालाल के ठेले पर पड़ी थी। बदले में मुट्ठी भर गुड़ के सेव क्या बुरे थे? उस कॉपी की चोरी का पिता जी को पता चलेगा, इसका तो मुझे सपने में भी खयाल नहीं था। वैसे भी मेरे लेखे वह फिजूल थी, क्योंकि पूरी भरी हुई थी। सो भला उनके किस काम की? खाली होती तो फिर भी किसी काम आ जाती। सोचकर मैंने उसे बेझिझक रद्दी में बेचा और मजे में गुड़ के ताजे, स्वादिष्ट सेव खाए, जो मेरी पहली पसंद थी। आहा, उन गुड़ के सेवों का आनंद ही कुछ और था! चोरी का गुड़ तो मीठा लगता है, पर चोरी की कॉपी से लिए गए गुड़ के सेव तो और भी मीठे लगते हैं। मगर मेरा दुर्भाग्य! उस कॉपी के गायब होने से तो घर में हड़कंप मच गया, जैसे पता नहीं कौन सा कलंदर का खजाना लुट गया हो! पिता जी कई दिनों तक बड़ी बेकली से कभी अंदर, कभी बाहर आते घर भर में उसे ढूँढ़ते रहे थे और हर किसी से उन्होंने उस कॉपी के बारे में पूछा था। सबसे पहले तो माँ से ही। पर माँ ने कहा, “मैं तो आपकी कॉपी और बहियों को छूती ही नहीं। और बच्चों को भी क्या पड़ी है उसे इधर-उधर रखने की? बेचारों को अपनी पढ़ाई से ही फुरसत नहीं। आप कहीं और भूल आए होंगे।” पर पिता जी को ठीक-ठीक याद था कि वह पुरानी कॉपी उन्होंने यहीं अलमारी में रखी थी। एकदम लाल बहियों के ऊपर। यह तो ठीक है कि उसका बहुत सा हिसाब-किताब उन्होंने नई कॉपी में चढ़ा लिया था। फिर भी कुछ हिसाब-किताब चढ़ाना अभी बाकी था। इस बीच कॉपी ऐसे गायब हो गई, जैसे कलकत्ते वाला जादूगर सबके देखते-देखते किसी की घड़ी, पेन या नोट गायब कर देता है। “कमाल है….!” वे बार- बार अपने आप से कहते, “कमाल है, यह हुआ कैसे? … ऐसा पहले तो कभी नहीं हुआ!” पिता जी की अपने आप से बातें करने की आदत थी। पर उनकी वही आदत मुझ पर बहुत भारी पड़ रही थी। मैं उन्हें अपने आप से बोलते सुनता और मेरा जी धक से रह जाता। “बेटे, कहीं तूने तो नहीं देखी वह कॉपी?” पिता जी ने एक बार मुझसे भी पूछा, पर मैं साफ नट गया। “ना पिताजी, मुझे क्या करनी थी आपकी कॉपी! आपने रखी कहाँ थी? कहीं बाहर तो आप नहीं भूल आए।” मैंने भोलेपन से पूछ लिया तो वे चुप। एकदम हक्के-बक्के। निराश । मैं मन ही मन अपनी चालाकी पर खुश था कि उन्हें उलझा दिया। एकदम बेफिक्र। लेकिन झूठ के पाँव ही कितने होते हैं! वह कभी छिपता नहीं। और फिर मेरी चोरी भी सामने आ गई। आनी ही थी। हुआ यह एक दफे शाम के समय मेवालाल से दो पैसे के सेव लेकर मैं खा रहा था। खाता जा रहा था और अपनी ढीली खाट पर झूला झूलता हुआ मजे मजे में तेरह का पहाड़ा भी दोहराता जा रहा था। कल ही मास्टर जी को सुनाना था। पर मुझे क्या परवाह थी? पहाड़ा तो याद हो ही चुका। बस, उसे दो-चार बार दोहराकर जरा पक्का करना था। दाल-सेव खाते-खाते इसी मस्ती और विजय – गर्व में मैंने पुड़िया का कागज हवा में लहराते हुए फेंका और मजे में अपनी हिंदी की किताब खोलकर पढ़ने बैठ गया। इतने में पिताजी कहीं से आए और पास पड़ी कुरसी पर बैठे तो उनकी नजर उस कागज पर पड़ गई। “कुक्कू!” उन्होंने जोर से चिल्लाकर कहा, “यह कहाँ से आया? कहाँ से आया यह कागज? मेरी उसी हिसाब-किताब की कॉपी का पन्ना है, जो मिल नहीं रही।…जरूर तू बेचकर आया होगा मेवालाल को। बोल, अब बोलता क्यों नहीं?” और सचमुच मेरे मुँह से एक बोल तक नहीं निकल पाया। मैं इस कदर पसीने-पसीने था कि मेरी शक्ल ही सब कुछ बता रही थी। चोरी की पोल खुल चुकी थी और मेरा चेहरा सफेद, एकदम सफेद! मैं सोच रहा था, अभी पिता जी का एक चाँटा पड़ा गाल पर, अभी…! और मैं रोंआसा हो गया। लेकिन पिता जी ने कुछ नहीं कहा, सिर्फ इतना कहा, “बेटे, तुझे किस चीज की कमी है, जो तू रद्दी कॉपियाँ बेचता फिरता है? कितनी तो मिठाइयाँ तुझे लाकर देता हूँ, तेरा मन ही नहीं भरता?” मैंने सिर नीचा किए किए ही कहा, “लेकिन पिता जी, मेवालाल की मिठाई…!” जाने क्या हुआ कि उस भयंकर क्रोध की हालत में भी पिता जी एकाएक जोर से हँस पड़े। बोले, “ठीक है कुक्कू, तुझे रोज मैं एक इकन्नी दिया करूँगा। तू मेवालाल की मिठाई खा लिया कर। पर आगे से कसम खा, कभी कॉपियाँ बेचकर मिठाई नहीं लाएगा। तुझे मालूम है, कितना नुकसान कर दिया तूने? कितना जरूरी हिसाब-किताब लिखा था उस कॉपी में…!” पिता जी के हँसते ही मुझे बहाना मिल गया, मैंने झट से हथेली बढ़ाई। उन्होंने उस पर इकन्नी रखी। मैंने जल्दी से पुरानी कॉपियाँ न बेचने की कसम खाई और तीर की तरह बाहर भाग निकला। मेवालाल अभी बाहर ही खड़ा था, गया न था, और इकन्नी में तो खोए के दो ताजे-ताजे बढ़िया पेड़े आ सकते थे।”