पुराने समय की बात है, सोनापुर गाँव में एक छोटा सा लड़का रहता था। बड़ा ही चंचल और नटखट लड़का। उसका नाम था गोगना। माता-पिता ने बचपन में उसका यह नाम रख दिया। पर उसे अपने नाम से चिढ़ थी। उसने एक बार माँ से शिकायत की, ”माँ, माँ! मेरा यह अजीब सा नाम क्यों रख दिया? जो भी सुनता है, हँसने लगता है।”
”तब तो बेटा, तुम्हें खुश होना चाहिए कि तुम्हारा नाम सुनकर लोगों के चेहरे पर मुसकान आ जाती है।” गोगना की माँ ने हँसते हुए कहा।
”पर माँ, गोगना का कुछ मतलब भी तो नहीं होता। यह तो बस यों ही फिजूल का नाम है।”
”बेटा, नाम तो पुकारने के लिए होता है। मैं तुझे प्यार से गोगना कहकर बुलाती हूँ तो तू दौड़ा चला आता है। बस, नाम का तो यही मतलब होता है।” माँ ने प्यार से समझाते हुए कहा।
”नहीं माँ, मुझे तो यह नाम बिल्कुल पसंद नहीं है।” गोगना ठुनकते हुए बोला।
”तो ठीक है बेटा जो नाम तुझे अच्छा लगे, वह रख ले।” गोगना की माँ ने हार मानते हुए कहा।
और बस गोगना ठुनकते-ठिनकते हुए, किसी अच्छे नाम की खोज में लग गया।
उसके दोस्तों ने बताया था, ”हमारा सोनापुर गाँव तो छोटा सा ही है, जबकि शहर बड़े होते हैं। शहर में जाओ तो वहाँ हर चीज मिल जाती है।”
बस, गोगना शहर की और ही चल दिया। चलते-चलते वह एक बड़े से बाजार में पहुँच गया।
एक जगह सिपाही एक आदमी को हथकड़ी पहनाए चले जा रहे थे। गोगना ने पूछा, तो सिपाही ने जोरों से हँसकर कहा, ”इसका नाम तो है हरिश्चंद्र, पर यह चोरी में पकड़ा गया है।”
कुछ आगे गया, तो गोगना को चीथड़े पहने एक गरीब भिखारी मिला। उसके पास खाने को कुछ न था। गोगना ने उसे दो रोटी खाने को दे दीं। फिर पूछा, ”तुम्हारा नाम क्या है भई?”
भिखारी बोला, ”नाम तो लखमीचंद है, पर…!”
गोगना ने सुना तो आँखें फाड़े सोचता रह गया। कितनी अजीब बात है, हरिश्चंद्र चोरी करते पकड़ा गया। और इसे देखो, नाम लख्मीचंद लेकिन भीख माँग रहा है।… ना जी ना, उसका अपना नाम ही भला!
घर लौटकर गोगना माँ से बोला, ”माँ, माँ! मुझे अपना गोगना नाम ही बड़ा प्यारा लग रहा है।”
माँ हँसकर बोलीं, ”हाँ रे हाँ गोगना! यही तो मैं तुझसे कहती थी।”
