भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
मोबाइल फोन के अलार्म से बजते सुरीले गीत मेरे कानों तक पहुंचने में असमर्थ रहे, क्योंकि मैं देर रात दोस्त की बर्थडे पार्टी एंजॉय करके जो आया था। पार्टी में खूब मस्ती की, दोस्त के लिए सुन्दर, महंगा गिफ्ट खरीदा। ताकि मैं दोस्त पर अपना प्रभाव डाल सकू।
मोबाइल फोन का अलार्म तो पार्टी की थकावट से आयी गहरी नींद न उचाट सका। पर जब माँ की आवाज आई कि- “बेटा उठ जाओ, नहीं तो कॉलेज जाने में देरी हो जाएगी” तब मुझे बिस्तर छोड़ना ही पड़ा। मैं उठ कर सीधे बाथरूम की तरफ बढ़ गया।
नहा कर बाहर आया तो माँ ने गरमा-गरम नाश्ता मेरे लिए तैयार किया हुआ था।
लेकिन मैं तो हमेशा की तरह लेट था, यदि और देरी की तो कॉलेज का पहला लेक्चर छूट जाएगा। यह सोच कर मैंने जूते पहनते हुए कहा “मम्मी मैं नाश्ता कॉलेज में ही खा लूंगा”
मैंने देखा मम्मी मेरे अस्त-व्यस्त कमरे में मेरी चादर, तकिया समेट रही थी। मेरे गीले तौलिये को मम्मी ने कंधे पर डाला हुआ था और उसे बाहर तनी पर सुखाने जा रही थी।
शाम को कॉलेज से घर आने के बाद मैं अपने मोबाइल में दोस्तों को मैसेजेस करने में व्यस्त था। तभी अचानक टीवी पर ध्यान गया, “कोरोना वायरस के चलते देश में बहुत नाजुक हालात बन चुके हैं। विदेशों में लाखों लोगों की जान भी जा चुकी है इसलिए सरकार ने यह फैसला किया है कि अब हमारे देश में लॉकडाउन लगाया जाएगा, ताकि कोरोना की महामारी से बचा जाए।”
मैं सोच में पड़ गया था कि अब क्या होगा? कॉलेज भी शायद बंद करने पड़ेंगे तो पूरा सत्र खराब न हो जाए।
कॉलेज की तरफ से भी मैसेज आ गया कि- “अब से कॉलेज एक अवधि के लिए नहीं खुलेगा, तब तक ऑनलाइन क्लासेज के जरिए पढ़ाई चालू रखी जाएगी”
पापा ने हाल ही में नौकरी छोड़ कर अपना नया व्यापार शुरू किया था, लेकिन कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन के कारण हमारी दुकान भी बंद रखनी पड़ी। पापा की नई दुकान शुरू करने के लिए मम्मी ने भी अपने विवाह के गहने बेचकर अपना सहयोग दिया था। क्योंकि ना तो रिश्तेदारों ने मदद की और ना ही पापा के दोस्तों से आर्थिक मदद मिलने की उम्मीद थी। पापा काफी बड़ा लोन भी ले चुके थे।
दुकान बंद होने से घर में टेंशन का माहौल बन रहा था क्यूंकि हर दिन खर्चे तो चालू थे, पर आय बंद। पापा अकसर उदास ही नजर आते, माँ उन्हें ढाढस बंधाती। फिर भी कई बार जब पापा ज्यादा परेशान होते तो माँ को बेवजह ही झिड़क देते। पर माँ किसी भी तरह का तनाव और उदासी हम तक पहुंचने न देती। माँ अपनी मुस्कान एवं चुटीली बातों से घर का माहौल हमेशा की तरह खुशनुमा रखने की पूरी कोशिश करती और परेशानी में भी हमारे खाने के लिए नित-नए व्यंजन बनाती। हम सब टी. वी. के सामने पसर कर ठीक नौ बजे रामायण देखने का आनंद लेते तो माँ साथ में कभी सब्जी साफ करना तो कभी कपड़े तह करने जैसे काम करती। पिछले महीने भरा गया राशन धीरे-धीरे खत्म हो रहा था और घर में पैसे आने का एक ही माध्यम था, पापा की दुकान और वह भी लॉकडाउन के चलते बंद थी। न जाने मम्मी ऐसे में भी कैसे सामान्य व्यवहार कर रही थी जैसे कोई तकलीफ आई ही नहीं हो।
एक दिन की बात है, मैं दोपहर में सोने जा रहा था। तब माँ ने मुझे बुलाया और कहा- “बेटा एक छोटा-सा काम है अलमारी के ऊपर एक तेल की छोटी-सी बोतल रखी है, ऊपर चढ़कर उतार दो।” मैं कुर्सी के ऊपर चढ़ा, कुछ सामान ऊपर-नीचे किया और बोतल उतार कर माँ को दी। मैंने आश्चर्य से देखा और कहा “मम्मी यह तो सिलाई मशीन के तेल की बोतल है।” माँ ने कहा- “हाँ, बेटा यही चाहिए मुझे।”
हमारे घर में एक पुरानी सिलाई मशीन रखी थी। माँ ने मशीन को साफ किया, उसके कल-पुर्जी में तेल डाला और पुरानी मशीन को दुरुस्त कर सिलाई का काम करना शुरू किया। आस-पड़ोस से सिलाई के कुछ कपड़े जैसे महिलाओं के ब्लाउज, साड़ी में फॉल-पीकू, सलवार-कुरते सिलाई करने को आते और माँ उन्हें सिल देती ताकि कुछ पैसे कमा कर घर को सुचारू रूप से चलाया जा सके।
पूरे दिन कॉलेज की ऑनलाइन कक्षाएं, एक ही कमरे में बैठ कर शरीर अकड़ जाता और आँखों में परेशानी हो रही थी। माँ ब्रेक के समय कभी ठंडा खीरा ला कर देती और कहती “आँखों को बंद कर और खीरा पलकों पर रख ले, आराम मिलेगा। कभी विटामिन सी के लिए शिकंजी बनाती और ठंडी-ठंडी शिकंजी पापा और मुझे ला कर देती।” मैं मन ही मन सोचता रह जाता कि माँ इतना सब कुछ कैसे कर लेती है, ये थकती नहीं क्या?
आज मैं और पापा सुबह का नाश्ता खा रहे थे, माँ चाय लेकर आयी और पापा से बोली- “सुनिए मोबाइल पर सारे दिन क्लास करता है, थोड़ा रुपयों का इंतजाम कर इसे लैपटॉप ले दो न”
पापा एक और खर्च सुन कर जैसे एक बार तो चुप पड़ गए लेकिन माँ ने फिर से कहा- “मैं समझती हूँ मुसीबत का समय है, पर इसकी आँखों का ख्याल आता है तो चिंतित होती हूँ, इसीलिए कहा”।
माँ ने अपने पास रखे बचत के कुछ रुपये पापा को लाकर दिए।
“ये कहाँ से आये तुम्हारे पास” पापा की आँखें खुली-सी रह गयी थीं।
मेरे भाई जब कभी उपहार स्वरुप नकद रुपये देते हैं, मैं बचा लेती हूँ, कि कभी आड़े वक्त पर काम आयेंगे।
माँ ने पापा को जोर दे कर मेरे लिए लैपटॉप मंगवा कर ही दम लिया ताकि मैं आराम से पढ़ सकू।
सिर्फ इतना ही नहीं, घर में दो कमरे थे, माँ ने एक कमरा सिर्फ मुझे दे कर रखा था, ताकि मुझे पढ़ाई के लिए किसी तरह का व्यवधान न हो।
लॉकडाउन के चलते दोस्तों एवं रिश्तेदारों से मिलना-जुलना तो बंद ही था लेकिन माँ जब कभी खाली होती तो पास आकर बैठ जाती। मेरे बालों में तेल लगाती और साथ ही साथ अपने बचपन एवं विवाह के मजेदार किस्से सुनाती रहती।
कई बार दोस्तों की मस्ती और कॉलेज कैंटीन के पराठे याद आते, पर माँ द्वारा सुनाये किस्से एवं उसके हाथों से बने पराठे के सामने सब फीका-सा महसूस हो रहा था।
एक दिन वाशिंग मशीन खराब हो गई। पापा ने वाशिंग मशीन के सर्विस सेंटर में भी फोन किया पर लॉकडाउन के चलते कंपनी सेवा पहुंचाने में असमर्थ रही। माँ का काम और भी ज्यादा बढ़ गया था। सुबह के लिए नाश्ता तैयार करना, कपड़े धोना, खाना बनाना, सिलाई करना आदि। लॉकडाउन के चलते किसी कामवाली को घर पर बुलाने को माँ तैयार नहीं थी। माँ रोज सुबह स्नान के पहले हम सब के कपड़े भी हाथ से धोने लगी थी।
एक दिन मैं अचानक से रसोई में गया, माँ की आँखों में आँसू थे। मुझे देखते ही वह आँसू पोंछने लगी।
“क्या हुआ मम्मी मुझे बताओ न आप रो क्यूँ रही हैं?” मैंने पूछा।
“कहाँ रो रही हूँ, प्याज काट रही थी सो आँसू आ गए”
मैंने देखा वहां आस-पास न तो प्याज थे और न ही छिलके।
मुझे समझते देर न लगी कि माँ कुछ छुपा रही है।
काफी कोशिश की पर माँ ने अपने रोने को राज ही रखा, पापा को तो जाहिर ही नहीं होने दिया कि कुछ हुआ भी है।
कोरोना एवं लॉकडाउन के पहले मैं घर पर कम ही रहता, सो जरा-जरा सी बात पर माँ से नाराज हो जाता। माँ यदि कोई हिदायत देती तो पलट कर जवाब भी देता था। कभी खाना पसंद न आता तो माँ से कुछ पसंद का बनवाता वरना भूखा ही रहता पर खाता नहीं था।
लेकिन इस कोरोना ने तो जैसे मेरी आँखें खोल दी थीं। माँ भले ही ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं है, पर वह सारी व्यवस्था कितनी आसानी से कर लेती है। ऐसा महसूस होता है जैसे माँ ने एम. बी. ए किया हो या शायद उन पढ़े-लिखे लोगों को भी माँ अपने मैनेजमेंट के आगे फेल कर दे।
आज माँ के सिर में बहुत दर्द था, थोड़ा-सा बुखार भी होने लगा था। माँ ने थर्मामीटर से अपना ताप मापा। इतने समय में आज पहली बार वह चिंतित नजर आयी और पापा से बोली- “लगता है कोरोना का टेस्ट करवाना पड़ेगा”
पापा ने पास की ही डॉक्टर को फोन किया और माँ की स्थिति से वाकिफ कराया।
डॉक्टर ने सारी बात समझ कर माँ को होम-क्वारेंटाइन करने को कहा और कुछ दवाइयां लिख दी। साथ ही यह भी हिदायत दी कि हम फोलो अप करें।
अब घर के काम की जिम्मेदारी पापा और मुझ पर थी। सुबह नाश्ता, खाना, चाय, कपड़े, सफाई। “उफ्फ! कितना काम होता है घर में” पापा बोले।
मैं भी पापा की मदद कर रहा था। साथ ही माँ के लिए चिंतित भी था कि कहीं माँ “कोरोना पॉजिटिव” न हो।
नौ दिन तक माँ क्वारेंटाइन रही। मैं और पापा घर का काम करके पस्त हो चुके थे। माँ को हम कच्चा-पक्का खाना कमरे के बाहर से ही दे दिया करते थे। माँ ने कभी यह शिकायत नहीं की कि खाना बेस्वाद है। जो मिलता माथे पर लगा, ईश्वर का प्रसाद समझ खा लेती।
आज डॉक्टर से जब बात हुई तो उसने कहा- “आपकी माँ को कोई कोरोना के लक्षण नहीं, न ही बुखार ज्यादा बढ़ा है। अब तो पांच दिन से बुखार भी नहीं चढ़ा है। आपकी माँ पूरी तरह से स्वस्थ है, शायद घर का काम ज्यादा बढ़ जाने से थकान और नींद की कमी होने के कारण बुखार चढ़ गया हो”
पापा और मैं यह बात सुन कर थोड़े रिलेक्स हो गए थे। माँ मुस्कराते हुए नहा-धो कर कमरे से बाहर आयी और पुनः अपनी रसोई संभाल ली।
सब काम निपटा दोपहर में माँ फिर से सिलाई मशीन के साथ गुफ्तगू करने लगी थी। मैं देख रहा था मशीन की सुई जिस तरह ऊपर-नीचे धागे को ले जाकर कटे-फटे कपड़े को सुन्दर पोशाक में बदल देती है। वैसे ही माँ अपनी परवाह न कर पूरे घर को संवार दती है।
मेरी माँ मशीन होती जा रही है, इस बात का मुझे पहली बार एहसास हुआ था। अगले दिन से घर की साफ-सफाई का जिम्मा मैंने ले लिया था ताकि माँ को थोड़ा आराम मिल सके।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
