Mahakumbh Story: तथाकथित साध्वी हर्षा रिछारिया आज कुंभ की सुर्खियों में छाई है। कोई उनके समर्थन में है तो कोई उनका विरोध कर रहा है। किसी का कहना है की कुंभ हमारी आस्था का प्रतीक है। अध्यात्म का ज्ञान ही कुंभ है ,जहां हृदय को निर्मल और पवित्र करने का प्रयास किया जाता है। शाही स्नान का मतलब यह नहीं कि सिर्फ एक त्रिवेणी में हम एक डुबकी लगा ले। शाही स्नान अर्थात मन से अंतरात्मा तक विकृतियों का नाश हो। शारीरिक सुंदरता को छोड़कर मन की, हृदय की, मस्तिष्क की सुंदरता का ज्ञान हो।
अंधकार से प्रकाश की ओर आना ही महाकुंभ का विस्तृत अर्थ है।
साधु संतों और अध्यात्म का ज्ञान रखने वालों के अनुसार यहां आकर भी यदि व्यक्ति शारीरिक सुंदरता को देखता या मंत्रमुग्ध होता है, तो वह अभी अपरिपक्व है,अभी वह साधु संत या साध्वी कहलाने योग्य नहीं है। हृदय की मालीनता को दूर कर पवित्र हृदय में पवित्र विचार रखना ही महाकुंभ आने का मुख्य ध्येय होना चाहिए।
यहां मेरा आप सभी से एक प्रश्न है क्या हर्षा रिछारिया या अन्य किसी भी स्त्री जो कुंभ में आना चाहती है उसे इन मानको पर खरा उतरना होगा।
उधर दूसरी और कुंभ में मालाओं को बेचती वो स्त्रीयां भी वायरल हो रही है, प्रसिद्ध हो रही हैं जो शायद सिर्फ रोजगार की दृष्टि से इस महाकुंभ में आई है। एक गहन विचार हृदय में आता है कि यदि कोई स्त्री किसी ऐसे स्थान पर आती है तो क्यों पुरुष प्रधान समाज उसे ही दोषी ठहरता है ,उन पुरुषों का क्या जो कुंभ में आए तो मन पवित्र करने हैं लेकिन उनकी दृष्टि स्वत: ही उन महिलाओं की तरफ जाती है,वे आकर्षित होते हैं और बात का बतंगड़ बनता जाता हैं।
इसलिए अध्यात्म जैसी जगह पर आने के लिए यदि कुछ मानक तय होते हैं तो वे स्त्री और पुरुष दोनों के लिए होने चाहिए,ये नही कि केवल स्त्री ही हर जगह कठघरे में खड़ी की जाये। हमारी मीडिया को भी हर उस चीज को कवरेज करते समय ध्यान रखना चाहिए जोकि हमारी आस्था, भक्ति,सनातन धर्म , संस्कृति और अध्यात्म से जुड़े विषयों से सम्बन्धित है , इसलिए इनका दुरुपयोग कतई नहीं होना चाहिए।
महाकुंभ हमारे लिए गर्व का विषय है, और देश विदेश आस पड़ोसी देशो में भी हमारे महाकुंभ के प्रयासों की निरंतर प्रशंसा हो रही है, गर्व साथ ही इसका आगाज़ हुआ है। इसलिए युगों युगों तक जब भी कभी महाकुंभ की बात आए तो 2025 में प्रयागराज में लगा महाकुंभ आने वाले इतिहास में सुनहरे अक्षरों में अंकित हो।
