lakhon nanhe munne santa
lakhon nanhe munne santa

अचानक सांता ने घूमकर अपने बड़े से पिटारे की ओर देखा। वह खाली था, एकदम खाली। सांता को लगा कि वह कह रहा है, “इसे जल्दी से भरो सांता।…जल्दी, बहुत जल्दी, ताकि मैं फिर से बच्चों के पास जाकर उन्हें खुशियाँ बाँटूँ। ओह, पूरे साल में सिर्फ एक ही दिन खुशियाँ बाँटने का क्यों होना चाहिए? हर दिन क्यों नहीं…?”

“हाँ वाकई, अब ऐसा ही होगा!” कहते-कहते सांता को लगा, दूर-दूर तक उसे नन्हे-मुन्ने सांता ही सांता नजर आ रहे हैं, जो इस दुनिया को ज्यादा सुंदर बनाने के लिए निकल पड़े हैं।

ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंBachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)