googlenews
कोउला और बोउगा-21 श्रेष्ठ लोक कथाएं असम: Dog Story
Koula and Bouga

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Dog Story: बहुत साल पहले की बात है। तब एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए सीमित साधन हुआ करते थे। गरीब लोग पैदल चलकर ही एक जगह से दूसरी जगह तक जाते थे। अमीरों के लिए घोड़े, बैल गाड़ी और पालकी का प्रचलन था। ज्यादातर रास्ते जंगलों के बीच से होते हुए गुजरते थे। उसी समय जंगल के करीब कमलपुर नामक एक छोटा-सा गाँव था। वहाँ की आबादी भी बहुत कम थी। एक औरत अपनी बेटी के साथ कमलपुर गाँव में रहती थी। अपने पति के असमय देहांत के बाद परिवार के गजारे के लिए उसने खेती करनी शुरू कर दी। इस तरह माँ-बेटी का गुजारा चलने लगा। उसके खेत जंगल के करीब थे। उस जंगल में बहुत सारे खूखार जंगली जानवर रहा करते थे। औरत को जंगली जानवरों से कोई डर नहीं था। दिनभर वह अकेली खेत में काम करती रहती थी। हल चलाना, मिट्टी को समतल करना, धान के बीज बोना, सिंचाई करना, कटाई, सफाई आदि सारा काम वह खुद करती थी।

बेटी धीरे-धीरे बड़ी होने लगी और एक समय आया जब वह गाँव की सुंदर एवं सुशील युवतियों में गिनी जाने लगी। माँ की भी उम्र ढल रही थी और कड़ी मेहनत करने के कारण वह असमय बूढ़ी हो चली थी। बेटी को माँ की बड़ी चिंता होने लगी। एक दिन वह सड़क से कुत्ते के दो पिल्लों को उठा लाई।

बेटी ने माँ से कहा- “माँ, आज से ये दोनों भी हमारे साथ ही रहेंगे। इनकी माँ नहीं है। जंगल के किनारे सड़क पर पड़े हुए थे। मैं न उठा लाती तो अब तक वह बदमाश लोमड़ी आकर इन्हें हजम कर जाती। देखो न, कितने प्यारे हैं। इनकी आँखें काली, छोटी और कितनी चमकीली हैं।”

माँ को भी दोनों पिल्लों पर दया आ गई और वह दोनों की पीठ को प्यार से सहलाने लगी। ममता भरे हाथों से छूते ही दोनों माँ की गोदी में बैठने को उतावले हो गए। धीरे-धीरे दोनों माँ-बेटी के छोटे परिवार के सदस्य बन गए। दोनों को खाना खिलाए बिना माँ खुद नहीं खाती थी। एक का रंग काला था और दूसरे का सफेद। माँ काले को कोउला और सफेद रंग वाले को बोउगा कहकर बुलाती थी। धीरे-धीरे कोउला और बोउगा बड़े होने लगे। दोनों अब माँ की आँखों के तारे बन गए थे। माँ जहाँ भी जाती, दोनों उसके पीछे-पीछे चलते। माँ की एक आवाज से दोनों अपनी पूँछ हिलाते हुए उसके पास हाजिर हो जाते थे। अब बेटी ने राहत की साँस ली।

जंगल की लोमड़ियाँ बड़ी शैतान थीं। माँ जब अकेली खेत में काम करती रहती थी, दो लोमड़ियाँ हमेशा उसके इर्द-गिर्द घूमती रहती थी। एक दिन माँ ने तंग आकर अपनी दा (बड़ा चाकू) उनकी तरफ मार फेंकी। दा जाकर एक के गले में लगा और अधिक खून बहने के कारण वह उसी वक्त चल बसी। दूसरी ने किसी प्रकार भागकर अपनी जान बचाई। रात को सोते समय जब माँ ने बेटी को यह कहानी सुनाई, बेटी मन ही मन डरने लगी। अब दूसरी लोमड़ी मौके की तलाश में रहेगी कि कब माँ को नुकसान पहुँचाकर अपने साथी की मौत का बदला ले सकें। गाँव के कई लोग दुष्ट लोमड़ी के पंजे से घायल हुए या मर चुके थे। इसलिए बेटी ने माँ की सुरक्षा के लिए इन कुत्तों का इंतजाम कर दिया।

एक दिन महाजन (गाँव के मुखिया) ने अपने रिश्तेदार के बेटे के लिए बेटी का हाथ माँगा तो माँ की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। लड़का पढ़ा-लिखा, होशियार एवं स्वस्थ था। जमीन-जायदाद से भरपूर घर-परिवार पाकर माँ का सीना चौड़ा हो गया। भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि उस गरीब दुखियारी की बेटी ऐसे खाते-पीते घर की बहू बनेगी। बड़े धूमधाम से उसने एकलौती बेटी का विवाह सम्पन्न किया। बेटी भी कोउला और बोउगा के भरोसे माँ को छोड़कर रोती हुई ससुराल चली गई। अब माँ बिल्कुल अकेली रह गई। फिर भी बिना डरे वह अपने पालतू कुत्तों के साथ सुख से रहने लगी। कई बार लोमड़ी रात के समय माँ पर पंजा मारने की नाकाम कोशिश कर चुकी थी। जैसे ही वह कुटिया की तरफ बढ़ती, पता नहीं कहाँ से कोउला और बोउगा हाजिर हो जाते और उसे उल्टे पाँव भागना पड़ता है। वैसे भी लोमड़ी कुत्तों से बहुत डरती हैं।

इस प्रकार कई महीने बीत गए। धीरे-धीरे माँ को बेटी की याद सताने लगी। इतने दिनों उसकी कोई खबर नहीं मिली। इसलिए एक दिन माँ कोउला और बोउगा पर कुटिया की जिम्मेदारी सौंपकर बेटी से मिलने निकल पड़ी। बेटी के लिए खाने के ढेर सारा सामान एक पोटली में बाँधकर पौ फटते ही माँ ने यात्रा शुरू की।

माँ को देखकर दूर छिपी लोमड़ी की बाँछे खिल उठी।

“अब कैसे बचेगी तू बुढ़िया? तुम्हें मुझसे अब कोई नहीं बचा सकता। वे मुए कुत्ते तो दूर घर की पहरेदारी करते होंगे।” लोमड़ी मन ही मन मुस्कुरा उठी। बूढी को मारकर कई महीनों तक वह खा सकेगी। ऐसी कल्पना करके उसके मुँह में पानी आ गया।

जैसे ही माँ गाँव की सीमा पार करके जंगल से गुजरने लगी, लोमड़ी उछलकर उसके सामने आ धमकी। अचानक आँखों के सामने भूखी लोमड़ी को देखकर माँ समझ नहीं पाई कि अब करें तो क्या करे? कैसे खुद का बचाव करें? मन का डर मन में ही छुपाकर हँसते हुए उसने कहा- “कैसी हो लोमड़ी रानी? बहुत दिनों के बाद दर्शन दिए। सब ठीक तो है न?”

लोमड़ी हँस पड़ी। उसने अकड़ दिखाते हुए कहा-

“मेरी चिंता छोड़ बुढ़िया और अपनी खैर मना। अब तुझे बचाने न तो तेरी बेटी आएगी और न ही वे जाँबाज कुत्ते। आज तुझे खाने की मेरी पुरानी ख्वाहिश पूरी करूँगी। अपने भगवान को याद कर ले ताकि मरते वक्त ज्यादा तकलीफ न पहुँचे।”

माँ जोर से हँस पड़ी। और कहने लगी-

“बेटी के गम से मैं मरी जा रही थी। खाना-पीना जैसे छोड़ ही दिया था। इसलिए पतली और कमजोर हो गई हूँ। पर तुझे इससे क्या? तुझे मांस मिले या सूखी हड्डियाँ, कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर तू मुझे बेटी के घर से वापस आते समय खाएगी, तब उँगली चाटती रह जाओगी।”

“वह कैसे?” लोमड़ी जानना चाहती थी।

माँ को लगा कि उसकी चाल काम कर गई। फिर गंभीर होकर कहने लगी, “तुझे इतना भी नहीं मालूम है क्या? इतने दिनों बाद माँ पहली बार बेटी के घर जा रही है। तो जाहिर है कि बेटी रोज जोहा चावल, मांस-मछली, ताजी सब्जियाँ, पीठा, नारियल के लड्डू, घी, माखन, मिठाई, दही, क्रीम, गुड़ आदि से मेरा आवभगत करेगी। मेरे दुबले-पतले शरीर में जान आ जाएगी। हड्डियों के साथ मांस भी जमेगा। तब खाने का मजा कुछ और ही होगा।”

लोमड़ी बोली- “अगर तू वापस इसी रास्ते नहीं आई तो?”

माँ बोली- तो क्या मैं बेटी के घर पूरी जिंदगी रहूँगी? ऐसा करके बिरादरी में नाक कटवानी है क्या? तू मानती है तो मान, वरना मैं चली।”

बेवकूफ लोमड़ी मान गई। माँ भी किसी प्रकार अपनी जान बचाकर हाँफते-हाँफते बेटी के घर पहुँची। माँ को देखकर बेटी की आँखें छलक आईं। दोनों एक दूसरे के गले मिल गए और स्वर्गिक सुख का अनुभव किया। बेटी ने कहा- “अब आई हो तो कुछ दिन यहाँ आराम से रहो और मुझे अपनी सेवा करने का अवसर दो।”

माँ बेटी का सुख देखकर खुश हुई। कई दिन आराम करने के बाद अचानक माँ को कोउला और बोउगा की याद सताने लगी। पता नहीं दोनों को खाने को कुछ मिला भी होगा या नहीं। उसका रखा हुआ खाना तो वे कबके खा चुके होंगे। बेटी को समझा-बुझाकर माँ घर वापस चलने को तैयार हुई पर जैसे ही लोमड़ी को दिए हुए वचन याद आये कि वह उसी रास्ते घर वापस आएगी और उसका भोजन बनेगी तो मन बैठ गया। बेटी के पूछने पर उसने सारी बातें बता दी। बहुत सोचने के बाद बेटी ने एक उपाय निकाला और माँ को एक बड़ी-सी सूखी लाऊ (लौकी) के भीतर डालकर उसका मुख अच्छी तरह बंद कर दिया। फिर लाऊ को लुढका दिया। माँ भी लुढ़कती हुई जंगल के बीचोबीच से गुजरने लगी। रास्ते में लोमड़ी बुढ़िया की राह देख रही थी। एक लाऊ को लुढ़कते आते देख उसका माथा ठनका। हो न हो, इसके अंदर कुछ मूल्यवान वस्तु छुपाई गई है। उसने सामने आकर लाऊ को रोक दिया और उलट-पुलट कर देखने लगी। उसे उठाते ही लाऊ का मुँह खुल गया और बुढ़िया निकल आई। लोमड़ी सारी चालाकी समझ गई।

“अब तू मुझसे कैसे बचेगी? बड़ी चालाक बनती है। अब तुम्हें मुझसे कोई बचा नहीं सकता। कोई आखिरी इच्छा हो तो बताओ।”

डरती हुई माँ बोली- “मैंने जीवन में बहुत काम किया पर कभी नाच-गान नहीं किया। मैं नाचना और गाना चाहती हूँ। यही मेरी आखिरी इच्छा है।”

लोमड़ी ने सोचा- “यह कैसी इच्छा है! जो भी हो, मुझे इससे क्या?”

फिर बोली- “ठीक है, जल्दी से करो, मुझे बहुत भूख लगी है।”

माँ ने मौके का फायदा उठाया और जोर-जोर से गाने के बहाने चिल्लाने लगी,

“कोउला आह, बोउगा आह,

मोक शियाले खाय।

कोउला-बोउगा लर मारले,

शियाल पोले जाय।।”

(भावार्थ- कोउला, बोउगा आ जाओ, मुझे लोमड़ी खाने जा रही है। कोउला-बोउगा के आते ही लोमड़ी भाग जाती हैं।)

माँ बार-बार एक ही सुर में गाते-नाचते हुए कुटिया की तरफ बढ़ने लगी और अपने बेटे समान कोउला-बोउगा को पुकारने लगी। लोमड़ी भी इन सबसे अनजान गाने की सुर में नाचती जा रही थी। इसी प्रकार नाचते-गाते माँ अपने घर के करीब आ गई। उसकी आवाज कुत्तों के कानों तक पहुँच गई। कोउला-बोउगा झट समझ गए कि उनकी मालकिन खतरे में हैं और दोनों जोर-जोर से भौंकते हुए जंगल की तरफ दौड़ने लगे। जैसे ही उन्हें लोमड़ी दिखी, वे गुस्से से लाल पीले हो गए और उसे दबोचने के लिए उसकी तरफ कूद पड़े। नाचती हुई लोमड़ी सामने मौत रूपी कोउला-बोउगा को देखकर दंग रह गई और अपनी पूँछ लटकाकर उल्टे पाँव भागने लगी। आगे-आगे लोमड़ी और पीछे-पीछे कुत्ते भागे जा रहे थे। दोनों लोमड़ी को भगाते-भगाते जंगल के दूसरे छोर पर पहुँच गए। लोमड़ी को भागते देख माँ हँसते-हँसते लोटपोट हो गई। थोड़ी देर बाद कोउला और बोउगा आकर माँ के गले लग गए। माँ ने दोनों की पीठ सहलाई और भरपूर प्यार जताया। उस दिन के बाद गाँव के किसी भी व्यक्ति ने दुबारा उस दुष्ट लोमड़ी को नहीं देखा। माँ जीवन के बाकी के दिन कोउला-बोउगा के साथ सुखपूर्वक बिताने लगी।

(विशेष-यह लोककथा असम के नलबाड़ी जिले में प्रसिद्ध है। लेखिका ने अपनी दादी से सुनी थी।)

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

Leave a comment