बात सन् 1938 के आसपास की है। उस समय डॉ. सम्पूर्णानन्द उत्तर प्रदेश के प्रथम कांग्रेसी मंत्रिमण्डल के एक सदस्य थे। एक पंडित जी अपने स्वार्थवश उनसे मिलने आये। वे किसी स्कूल के हेडमास्टर या कालिज के प्रिंसिपल थे। उन्होंने आते ही ‘हुजूर’, “सरकार” की झड़ी लगा दी। सम्पूर्णानन्दजी थोड़ी देर तक तो चुपचाप सुनते रहे, फिर एकदम उन पर उबल पड़े, “आप ब्राह्मण हैं न! फिर आप एक शिक्षण संस्था के प्रधान हैं- विद्वान् हैं। हजारों विद्यार्थियों के चरित्र को बनाने बिगाड़ने के आप उत्तरदायी हैं।
मैं आपसे उम्र में छोटा हूँ। विद्वत्ता में छोटा हूँ। केवल इस कुर्सी पर बैठ जाने से ही आप मुझे ‘हुजूर’, “सरकार” कहने लगे? इस कुर्सी पर न जाने कितने बैठ चुके और कितने बैठेंगे। आप काम पड़ने पर सभी से ऐसी बातें करते होंगे, क्योंकि गुलामी आपकी नस-नस में भरी हुई है। जब आपका चरित्र ही ऐसा है, तो फिर विद्यार्थियों का चरित्र कैसे ऊँचा उठायेंगे? वास्तव में आप अपने पद के अयोग्य हैं। आपके प्रति मेरी कोई सहानुभूति नहीं।”
ये कहानी ‘ अनमोल प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं–Anmol Prerak Prasang(अनमोल प्रेरक प्रसंग)
