नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में तबला वादक उस्ताद छोटे खां का महत्वपूर्ण स्थान था। उनके तबले की थाप पर लोग झूम उठते थे और मंत्र-मुग्ध होकर नाचने लगते थे। हर ओर उनकी ख्याति थी। किन्तु उन्हें आत्मिक शांति न थी। वे एक ऐसे योग्य शिष्य की तलाश में थे।
जिसे वे तबला वादन में निपुण कर सकें। वे अपनी इस कला को युगों तक जीवित रखना चाहते थे और यह कला जीवित तभी रह सकती थी जब वह तबले के गुर किसी योग्य व्यक्ति को सिखा देते। इसके लिए उन्होंने अनेक व्यक्तियों की तलाश की। अंततः कुछ समय बाद उनकी तलाश पूरी हुई और उन्हें एक योग्य शिष्य मिल गया। पूरी तन्मयता से वे उसे तबला सिखाने लगे। उस्ताद के इस कार्य का सांप्रदायिक मानसिकता वाले कुछ लोगों ने विरोध किया। वे उनके द्वारा चुने गये शिष्य का बहिष्कार करने पर तुले हुए थे। क्योंकि वह हिन्दू था। पर छोटे खां ने किसी की परवाह नहीं की और शिष्य का प्रशिक्षण जारी रखा।
वर्षों कठिन परिश्रम करने के बाद एक दिन उन्होंने दरबार में अपने शिष्य का तबला वादन रखा। शिष्य के वादन से वहाँ उपस्थित सभी कर्मचारियों को यह एहसास हुआ कि तबला स्वयं उस्ताद छोटे खां बजा रहे हों। शिष्य का तबला वादन समाप्त होने पर छोटे खां अपने स्थान पर खड़े होकर बोले, अब कोई बताये कि यह वादन हिन्दू का था या मुसलमान का? सबने सिर झुका लिया और बोले, कला जब सच्चे मन से निकलती है तो वह सारे दायरों से बाहर हो जाती है। उसे किसी दायरे में बांधकर देखना ठीक नहीं है।
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