मेरे विवाह के दूसरे दिन ससुराल में महिला संगीत का आयोजन था। कमरे में ढोलक व मंजीरे की मधुर ध्वनि गूंज रही थी। मैं लंबा घूंघट किए बैठी थी। हालांकि मेरी सास ने स्नेहपूर्वक मना किया था पर मैंने अपने मन से ऐसा किया था। नई नवेली दुल्हन सबको प्रभावित कर लेती है कि कितनी संस्कारी लड़की है, साथ ही झीने घूंघट में अपना चेहरा छिपाए लोगों के चेहरे और गतिविधियों को चुपचाप देखना भी रोचक होता है। मुझको गीता मामी ने सबसे अधिक प्रभावित किया था। पैंतालीस वर्ष से अधिक आयु, लंबा कद, संतुलित देह, दमकता गौर वर्ण, तीखे नैन-नक्श, सलीके से पहनी सुरुचिपूर्ण साड़ी, देह में अद्भुत कमनीयता पर सबसे बढ़कर व्यक्तित्व की गरिमापूर्ण सौम्यता। अप्सरा सा सौंदर्य, लावण्य व ओज से परिपूर्ण चेहरे पर गरिमामय गांभीर्य, तेजस्विता व अपनेपन का भाव। उनका व्यक्तित्व किसी राजघराने की महारानी जैसा था। जब मामी ने गाना आरंभ किया तो कहना ही क्या सब मंत्रमुग्ध हो गए।

महिला संगीत के पश्चात पुरुष रिश्तेदारों के चरण स्पर्श का कार्यक्रम था एकाएक गीता मामी के चेहरे का रंग उड़ गया। कुछ बेचारगी का भाव लिए मुझसे धीरे से बोलीं, ‘बेटा मामाजी की बातों का बुरा मत मानना।’ मामी की चिंता और दुविधा ने मुझे आश्चर्य के साथ ही असमंजस में डाल दिया। दूसरे कमरे में बनारस वाले मंझले मौसाजी, इलाहाबाद वाले छोटे फूफाजी वगैरह बैठे थे। मैंने दिल्ली वाले मौसाजी के चरण स्पर्श कर चांदी के सिक्के को लिया ही था कि एकाएक मेरी छठी इंद्रिय ने मुझे सजग रहने का संकेत किया। प्रकृति ने नारियों को छठी इंद्रिय की संवेदनशीलता कुछ अधिक उदारता से प्रदान की है। मैंने ठिठक कर घूंघट की आड़ से देखा। लगभग साठ की आयु, लंबा कद और दोहरा स्थूल शरीर, जो भोगी जीवन की गाथा कह रहा था। वस्त्रों का चयन बता रहा था कि ये अभी भूतकाल के मोह से मुक्त नहीं हो पाए हैं। रही सही कसर हेयरडाई लगाकर आयु छिपाने का असफल प्रयास करते बालों, ऐंठी हुई बड़ी मूंछों ने पूरी कर दी थी। पान खाए होठ और नशे की छाप लिए लाल डोरे वाली किसी शिकारी सी बड़ी-बड़ी आंखें सामने वाले को असहज करने को पर्याप्त थीं।

‘अरे वाह आज तो और भी निखर गई हो।’ कहते हुए उनकी मूंछों के पीछे छिपी मुस्कराहट से मेरा रोम-रोम सुलग उठा। पर क्या करती? हम लोग किशोरावस्था से ही जाने क्या-क्या सुनने और सहने की आदी हो जाती हैं इसलिए खून का घूंट पीकर रह गई। उस समय मेरे मन में कुछ ऐसा भाव उठा जो कॉक्रोच या छिपकली को देखकर होता है, जिसमें भय तो नहीं पर घृणा, वितृष्णा, जुगुह्रश्वसा, उपेक्षा न जाने क्या-क्या होता है। यही होंगे गीता मामी वाले मामा? कहां सीता जैसी मामी और कहां रावण के प्रतिरूप मामाजी। मन बोझिल हो गया। सायंकाल गीता मामी मेरे कमरे में आईं। विवशता, संकोच और आत्मीयता से भरे स्वर में पूछा, ‘सब ठीक तो रहा?’

‘जी मामी जी।’ मुझे लगा और क्या बोलूं। ‘बेटा, तुमने उनकी बात का बुरा तो नहीं माना?’ मैं आश्चर्यचकित हो उठी। मामाजी तो मामी को कुछ बताने से रहे, अर्थात मामी यह मान चुकी थीं कि मामाजी ने अवश्य ही कुछ कहा होगा। इतना सुनिश्चित कोई कैसे हो सकता है? ‘मामी जी, आप इतना सुनिश्चित कैसे हैं कि मामाजी ने कुछ गलत कहा ही होगा?’ ‘बेटा, जिसके साथ सारा जीवन बीत गया उसे क्या अब भी नहीं समझूंगी?’ मामी फीकी हंसी दीं।’क्या बताऊं, सबसे अपने ढंग से मजाक करना, न उम्र का संकोच न रिश्ते का लिहाज।’ मामी की
आंखें नम सी हो गईं।

‘क्या मामाजी शुरू से ही ऐसे हैं?’ मैं पूछ बैठी।’शुरू से? मुझे लगता है ये बचपन से ही ऐसे हैं। कौन सी आदत या शौक इनसे छूटा है? उम्र के साथ सब बढ़ता ही गया। सिगरेट, पान, तम्बाकू, शराब, मांसाहार, ताश और… कई संबंध।’ मामी का गला भर आया तो मैं भी द्रवित हो उठी। मुझे लगा मामी को मुझसे कुछ अपनापन सा लगा होगा तभी जाने कब का रोका हुआ बांध आज टूट कर बह गया। कितनी ही बार हम अपनी पीड़ा, दर्द दबाये अंदर की अंदर घुटते रहते हैं क्योंकि हमारे अपने अक्सर इतने भी अपने नहीं होते कि हम अपने दु:ख-दर्द उनसे बांट सकें। जब कोई अजनबी हमदर्द मिलता है तो सीमाएं तोड़ कर दर्द बह जाता है।

मामी की भावुक आंखों से अश्रुधारा बहती रही। मैं स्तब्ध-चुप थी कि कहने से मामीजी का मन कुछ हल्का हो जाए। कुछ देर बाद मैंने कह ही दिया, ‘मामी, आप तो कहीं से मामा के लायक ही नहीं तो फिर विवाह कैसे हो गया?’
‘अरे बेटा, आज से तीस साल पहले का समय था। मेरे पिताजी सीधे-सादे आदमी। किसी ने रिश्ता बताया कि जमींदार पिता का अकेला लड़का कलेक्टर का पेशकार है। गांव के लोग जो, लेखपाल, सिपाही तक को बड़ा समझते हों उनके लिए कलेक्टर का पेशकार मतलब साक्षात भगवान। सब कहने लगे ऐसा रिश्ता बड़े भाग्य से मिलता है। बस विवाह हो गया। यह सब बहुत बाद में पता चला।’ मामी बोलीं।

‘अगर आप शुरू में कठोर कदम उठा लेतीं तो इतने दु:ख न झेलने पड़ते।’ न चाहते हुए भी मेरे स्वर से आक्रोश झलक ही उठा। ‘क्या बताएं बेटा, इनके पिता बहुत अनुशासनप्रिय थे पर अकेले बेटे के दुर्गुणों को इनकी मां छिपाती रहीं। हालांकि वे दिल की बुरी नहीं थीं। मुझसे क्षमा मांगती कि मेरा पुत्र तुम्हारे लायक नहीं पर बुढ़ापे में मेरी बेइज्जती न होने देना। उनका प्रेम और ममता से परिपूर्ण
व्यवहार मुझे ससुराल में बांधे रहा। मुझे इस बात की खुशी है कि अब जमाना बदल रहा है। आज लड़कियां गलत बात सहन नहीं करतीं और आवाज उठाती हैं तो कानून व घरवाले भी साथ देते हैं। यह देखकर तसल्ली होती है कि खिड़की खुली है तो कल दरवाजे भी जरूर खुलेंगे।’ ‘सच में मामी आपके कंठ में सरस्वती जी का वास है। आपमें और भी गुण होंगे?’ मैं पूछ बैठी। ‘बेटा, कभी शास्त्रीय संगीत सीखती, साहित्य पढ़ती व कविताएं लिखती थी। पर अब…’ इससे आगे मामी बोल न सकीं। ‘मामी आपने कभी मामाजी को बदलने की कोशिश नहीं की?’ मैं भी जाने कैसे हिम्मत करके निजी प्रश्न पूछती जा रही
थी।

‘अरे बेटा, भला इनके घर में पत्नी की इतनी हिम्मत कि पति के सम्मुख बोलने या सलाह देने का अपराध करे? पौरुष का दंभ तो इनमें कूट-कूट कर भरा है जिसे मौके-बेमौके जताने से नहीं चूकते और पौरुष भी क्या? पौरुष का अर्थ मात्र
इतना ही है कि पत्नी तो सेविका या भोग्या मात्र है। उसकी भी संवेदना, इच्छा, आकांक्षा या मन हो सकता है, इनके जैसे लोग मान ही नहीं सकते। पत्नी को गहने कपड़े मिलते रहें, पति की दैहिक भूख के अनुसार कृपा मिलती रहे तो इससे अधिक और क्या आवश्यकता हो सकती है पत्नी की? इनके जैसे लोग मानते हैं कि मनुष्य जन्म और पुरुष की देह भोगने के लिए मिली है इसलिए
जितनी एय्याशी की जा सकती है कर लो। मुझे तो शायद किसी जन्म के पापों की सजा मिली है।

इतना जीवन कट गया है तो शेष भी कट ही जाएगा।’ इतना कहकर मामी चुप हो गईं। मैं मामी का उदास चेहरा देखकर सोच रही थी कि समाज में ऐसे झूठे रिश्ते भी होते हैं कि एक नारी का जीवन नरक बन जाता है।

लगभग साठ की आयु, लंबा कद और दोहरा स्थूल शरीर, जो भोगी जीवन की
गाथा कह रहा था। वस्त्रों का चयन बता रहा था कि ये अभी भूतकाल के मोह से
मुक्त नहीं हो पाए हैं। रही सही कसर हेयरडाई लगाकर आयु छिपाने का असफल प्रयास करते बालों, ऐंठी हुई बड़ी मूंछों ने पूरी कर दी थी।